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राजद्रोह कानून: केंद्र के मांगने पर सुप्रीम कोर्ट ने दिया वक्त

केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट से राजद्रोह कानून के मामले में जवाब दाखिल करने के लिए और वक्त मांगा। 

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस बात की जांच करेगा कि क्या राजद्रोह कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को सात जजों की संवैधानिक बेंच के पास भेजा जाना चाहिए। 

सीजेआई एनवी रमना की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वह अपना जवाब शनिवार तक जमा कर दें। कोर्ट ने केंद्र सरकार से भी कहा कि वह भी अपना हलफनामा सोमवार सुबह तक अदालत के पास सामने रखे।

इस मामले में अगली सुनवाई 10 मई को दिन में 2 बजे होगी। बता दें कि राजद्रोह के कानून को कई लोगों व संस्थाओं के द्वारा सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। इनमें एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और टीएमसी की सांसद महुआ मोइत्रा भी शामिल हैं।

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राजद्रोह कानून की यह कहकर आलोचना की जाती है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ ही प्रेस की स्वतंत्रता के अधिकार को भी बाधित करता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हुई सुनवाईयों के दौरान यह सवाल उठाया था कि अंग्रेजी हुकूमत में अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने के लिए बनाए गए इस कानून की क्या आज कोई जरूरत है? 

गुरुवार को सुनवाई के दौरान भारत सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपना जवाब दाखिल करने के लिए और वक्त मांगा। उन्होंने कहा कि जवाब का ड्राफ्ट पूरी तरह तैयार है और इसे स्वीकृति मिलने का इंतजार किया जा रहा है। इस पर सीजेआई ने कहा कि हमने 9 से 10 महीने पहले इस मामले में नोटिस जारी किया था और इस मामले की सुनवाई में कहीं कोई दिक्कत नहीं है। 

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तुषार मेहता ने कहा कि बिना केंद्र सरकार की इजाजत के उनके लिए इस मामले में बहस करना ठीक नहीं होगा। इस दौरान अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने अदालत से कहा कि आप देख सकते हैं कि देश में क्या हो रहा है। कल ही कुछ लोग हनुमान चालीसा पढ़ना चाहते थे लेकिन उन्हें राजद्रोह के कानून के तहत हिरासत में ले लिया गया इसलिए इस कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए गाइडलाइन होनी चाहिए। 

उन्होंने केदारनाथ सिंह वाले फैसले का जिक्र किया और कहा कि बड़ी बेंच की इस मामले में जरूरत नहीं है और वह फैसला काफी है।

सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कहा कि इस मामले में बड़ी बेंच का संदर्भ दिया जाना जरूरी नहीं है। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि कई याचिकाओं में केदारनाथ सिंह वाले मामले में दिए गए फैसले को खारिज करने या उस पर पुनर्विचार करने की मांग की गई है। लेकिन अटॉर्नी जनरल ने केदारनाथ सिंह वाले फैसले का पक्ष लिया और कहा कि यह एक बेहतर फैसला था और अभिव्यक्ति की आजादी और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच बेहतर संतुलन बनाता है।

सीजेआई ने इस मामले में सुनवाई के दौरान कहा था कि इस क़ानून को लेकर विवाद यह है कि यह औपनिवेशिक है और इसी तरह के क़ानून का इस्तेमाल अंग्रेजों ने महात्मा गांधी को चुप कराने के लिए किया था।
अदालत ने बेहद अहम टिप्पणी करते हुए कहा था कि यह क़ानून संस्थानों के काम करने के रास्ते में गंभीर ख़तरा है और इसमें ऐसी असीम ताक़त है जिनका ग़लत इस्तेमाल किया जा सकता है। 

क्या है राजद्रोह का क़ानून?

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 124ए यानी राजद्रोह का क़ानून अंग्रेज़ों के ज़माने में बना था ताकि भारतीयों की आवाज़ को दबाया जा सके और इसीलिए उसमें लिखा गया था कि 'सरकार के प्रति नफ़रत पैदा करने वाली’ किसी भी बात या हरक़त के लिए राजद्रोह का मामला दायर किया जा सकता है।

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देश की आज़ादी के बाद भी इस क़ानून को नहीं हटाया गया। जबकि केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य (1962) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया है कि 124 (ए) के तहत किसी के ख़िलाफ़ राजद्रोह का मामला तभी बनता है जबकि किसी ने सरकार के ख़िलाफ़ हिंसा की हो या हिंसा के लिए उकसाया हो (फ़ैसला पढ़ें)। 

नारे लगाने से राजद्रोह का केस नहीं बनता 

1995 में देश विरोधी और अलगाववादी नारों के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया था कि केवल नारे लगाने से राजद्रोह का मामला नहीं बनता क्योंकि उससे सरकार को कोई ख़तरा पैदा नहीं होता (फ़ैसला पढ़ें)। इस मामले में दो लोगों पर आरोप था कि उन्होंने 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद खालिस्तान ज़िंदाबाद और हिंदुस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाए थे।

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क़मर वहीद नक़वी
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