एसआईआर के दो चरणों में जबर्दस्त विवाद के बीच अब तीसरे चरण की घोषणा कर दी गई है। चुनाव आयोग ने गुरुवार को 16 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों के लिए मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी यानी एसआईआर के तीसरे चरण का पूरा कार्यक्रम जारी कर दिया। यह अभियान 30 मई से शुरू होगा। हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को फ़िलहाल इसमें शामिल नहीं किया गया है।

चुनाव आयोग ने कहा कि एसआईआर फेज-3 की समय सारणी राष्ट्रीय जनगणना की सूची बनाने के काम के साथ जोड़कर बनाई गई है, ताकि दोनों काम एक साथ आसानी से हो सकें। हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को छोड़कर पूरे देश में मतदाता सूची का पुनरीक्षण अब फेज-3 में लगभग पूरा हो जाएगा। इन तीनों जगहों पर जनगणना के दूसरे चरण के पूरा होने और ऊंचाई वाले बर्फीले इलाकों के मौसम को देखते हुए बाद में अलग से तारीख़ घोषित की जाएगी।
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कहां-कहां और कब शुरू होगा SIR फेज-3?

  • 30 मई से: ओडिशा, मिज़ोरम, सिक्किम, मणिपुर
  • 4 जून से: दादरा और नगर हवेली, दमन और दीव
  • 8 जून से: उत्तराखंड
  • 15 जून से: आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा, चंडीगढ़
  • 25 जून से: तेलंगाना, पंजाब
  • 30 जून से: कर्नाटक, मेघालय, महाराष्ट्र, झारखंड, दिल्ली
  • 16 अगस्त से: नागालैंड
  • 15 सितंबर से: त्रिपुरा
इस चरण में अंतिम मतदाता सूची 7 अक्टूबर को प्रकाशित की जाएगी।

कितने अधिकारी करेंगे काम?

इस पूरे अभियान में 3.94 लाख से ज़्यादा बूथ लेवल अधिकारी यानी बीएलओ घर-घर जाकर लगभग 36.73 करोड़ मतदाताओं की जाँच करेंगे। राजनीतिक पार्टियाँ भी 3.42 लाख बूथ लेवल एजेंट यानी बीएलए नियुक्त करेंगी, जो इस काम में मदद करेंगे। चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक पार्टियों से अपील की है कि वे हर बूथ पर बीएलए ज़रूर नियुक्त करें, ताकि पूरा काम पारदर्शी तरीके से और सभी की भागीदारी के साथ हो।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा, 'मैं सभी मतदाताओं से अपील करता हूँ कि वे SIR फेज-3 में उत्साह से भाग लें और अपना एनुमरेशन फॉर्म जमा करें।' उन्होंने बताया कि SIR का मक़सद यह सुनिश्चित करना है कि केवल योग्य मतदाता ही मतदाता सूची में रहें और अयोग्य नामों को हटाया जाए। हालाँकि, विपक्षी दल लगातार आरोप लगा रहे हैं कि बड़े पैमाने पर असली मतदाताओं के नाम भी काटे जा रहे हैं।
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पहले चरण में क्या हुआ?

पहला चरण पिछले साल जून-सितंबर में मुख्य रूप से बिहार में हुआ। यहाँ लगभग 47 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए, जो कुल मतदाताओं का 5-6% था। इस पर काफ़ी विवाद हुआ। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा, लेकिन इस एसआईआर प्रक्रिया के आधार पर ही विधानसभा का चुनाव हुआ।

दूसरे फेज-2 में और ज़्यादा विवाद

पिछले साल अक्टूबर में 9 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में चला। सभी राज्यों में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम कटे। उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा 2.04 करोड़ नाम हटाए गए। पश्चिम बंगाल में क़रीब 90 लाख नाम हटाए गए। बंगाल में काफ़ी ज़्यादा विवाद हुआ।

बंगाल में क्यों बना सबसे बड़ा मुद्दा?

चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले वोटर लिस्ट का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR किया। इसमें करीब 91 लाख नाम काट दिए गए, जो कुल वोटरों का लगभग 12% है। SIR शुरू होने से पहले राज्य में कुल 7.66 करोड़ वोटर थे। दिसंबर में ड्राफ्ट लिस्ट में क़रीब 60 लाख नाम हटाए गए। ड्राफ्ट सूची के बाद लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी को लेकर 60 लाख से ज्यादा मामलों को अदालती जांच के लिए भेजा गया। इनमें 27 लाख से ज्यादा को 'एक्सक्लूडेबल' माना गया।
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विपक्ष कह रहा है कि SIR एक तरफा था और उनके वोटरों को निशाना बनाया गया। बीजेपी इसे चुनावी लिस्ट साफ करने का ज़रूरी क़दम बता रही है। चाहे कोई इसे वोटरों की छँटनी कहे या चुनावी सफाई, SIR 2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव का सबसे बड़ा और सबसे विवादित मुद्दा रहा। वोटर डिलीशन का सीधा असर तृणमूल कांग्रेस की हार पर पड़ा। जहां नाम ज्यादा कटे, वहां पार्टी की सीटें तेजी से घटीं। बीजेपी ने इन इलाकों में अच्छी तैयारी की और वोटों का ध्रुवीकरण अपने फेवर में किया।

बहरहाल, चुनाव आयोग का कहना है कि SIR एक सहभागी अभियान है, जिसमें मतदाता, राजनीतिक दल और चुनाव अधिकारी सब मिलकर काम करते हैं। इससे मतदाता सूची साफ़-सुथरी, सही और विश्वसनीय बनेगी। सभी मतदाताओं से अनुरोध है कि जब बीएलओ उनके घर आएं तो ज़रूर सहयोग करें और सही जानकारी दें।