देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर तीन अलग-अलग तरह के सवाल सामने आए हैं। दिल्ली में मतदाताओं के नाम हटाने के लिए दर्ज हजारों आपत्तियां मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर प्रकाशित सूची में नहीं दिखीं। उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में निर्वाचन कार्यालय की जांच में कुछ मतदाताओं के EPIC नंबर के सामने दूसरे लोगों का विवरण दिखाई देने की शिकायत की पुष्टि हुई, जिसके बाद अधिकारियों पर कार्रवाई के निर्देश दिए गए। वहीं, तेलंगाना में एन्यूमरेशन फॉर्म के प्रारूप और SIR की कानूनी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे हैं। ये सारे मामले ऐसे समय सामने आये हैं, जब देश में कल शुक्रवार 23 अक्टूबर को एसआईआर के खिलाफ बड़ा प्रदर्शन होने जा रहा है। इसमें किसान भी शामिल होंगे। विपक्षी दल और सिविल सोसायटी के लोग एसआईआर को खत्म करने की मांग कर रहे हैं।

दिल्ली: 13,462 आपत्तियां दर्ज, वेबसाइट पर 9,199 ही प्रकाशित

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में SIR के दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया के शुरुआती 45 दिनों में मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए कुल 13,462 आपत्तियां दर्ज की गईं। लेकिन मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर इनमें से केवल 9,199 आपत्तियां सूचीबद्ध थीं। इस तरह 4,263 आपत्तियां सार्वजनिक सूची में दिखाई नहीं दे रही हैं।

आपत्ति दर्ज करने और उसे सार्वजनिक करने के नियम क्या हैं?

मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटाने की मांग के लिए फॉर्म-7 इस्तेमाल किया जाता है। ऐसी आपत्तियों की विधानसभा क्षेत्रवार सार्वजनिक सूची फॉर्म-10 के रूप में प्रकाशित की जाती है। निर्वाचन आयोग के 2023 के Electoral Roll Manual के अनुसार, आपत्ति पर कार्रवाई करने से पहले उसे फॉर्म-10 में सात दिन तक सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जाना चाहिए। मृत्यु के अलावा किसी दूसरे कारण से नाम हटाने की मांग होने पर संबंधित मतदाता को व्यक्तिगत नोटिस और जवाब देने के लिए 15 दिन का समय देने का प्रावधान भी रिपोर्ट में बताया गया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि किसी मतदाता को अपने खिलाफ दर्ज आपत्ति की जानकारी मिले और वह समय रहते अपना पक्ष रख सके। यदि कोई आपत्ति सार्वजनिक सूची में नहीं है, तो संबंधित मतदाता और राजनीतिक दल उसके आधार, आपत्तिकर्ता और संबंधित विवरणों की जांच नहीं कर सकते। इसलिए निर्वाचन कार्यालय को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वेबसाइट पर न दिखने वाले 4,263 आवेदन किस स्थिति में हैं और क्या उनके प्रकाशन में कोई प्रशासनिक या तकनीकी समस्या आई है।
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15 अक्टूबर के आंकड़ों में भी अंतर

रिपोर्ट के अनुसार, 15 अक्टूबर को वेबसाइट पर 1,402 आपत्तियां सूचीबद्ध थीं, जबकि मुख्य निर्वाचन अधिकारी के दैनिक बुलेटिन में उस दिन 2,046 फॉर्म-7 प्राप्त होने की जानकारी दी गई थी। रिपोर्ट प्रकाशित होने तक कार्यालय की ओर से इस अंतर पर जवाब नहीं दिया गया था। दिल्ली में सबसे अधिक सूचीबद्ध आपत्तियां ओखला विधानसभा क्षेत्र में दर्ज की गईं। इसके बाद तिमारपुर, नजफगढ़ और विकासपुरी का स्थान था।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि दर्ज आपत्तियों और वेबसाइट पर प्रकाशित सूची के बीच अंतर क्यों है। निर्वाचन आयोग को आवेदन प्राप्त होने, डिजिटलीकरण, प्रकाशन और निस्तारण के आंकड़ों का मिलान सार्वजनिक करना चाहिए, ताकि मतदाताओं को पता चल सके कि उनके नाम के खिलाफ कोई आपत्ति लंबित तो नहीं है।

यूपी: पीलीभीत में एक वोटर आईडी के सामने दूसरे का नाम

उत्तर प्रदेश में SIR को लेकर विवाद उस समय और गंभीर हो गया, जब पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र में कुछ मतदाताओं के EPIC नंबर ऑनलाइन खोजने पर दूसरे मतदाताओं का विवरण दिखाई देने की शिकायत सामने आई। द हिंदू, द टाइम्स ऑफ इंडिया और द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिनवा के कार्यालय ने शिकायत की जांच कराई। जांच में कुछ EPIC नंबरों के सामने दूसरे मतदाताओं का विवरण प्रदर्शित होने की विसंगतियां सामने आईं। इसके बाद संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) और मतदाता पंजीकरण केंद्र के ऑपरेटर को चुनाव संबंधी कार्य से हटाने तथा कानूनी कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए गए। हालांकि कुछ मीडिया रिपोर्टों में इन्हें सस्पेंड किये जाने की बात भी सामने आ रही है।

‘फैजान खान’ की जगह ‘रईस अली’ नाम दर्ज होने का आरोप

इस मामले का खुलासा अधिवक्ता फैजान अली खान की शिकायत के बाद हुआ। पीलीभीत की आवास विकास कॉलोनी के निवासी फैजान खान ने 14 अक्टूबर को जिला प्रशासन को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि SIR के बाद प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में नाम होने के बावजूद उनके और उनके छोटे भाई फरहान के मतदाता रिकॉर्ड में गड़बड़ी हो गई है। फैजान खान के अनुसार, उन्होंने और उनके भाई ने निर्वाचन अधिकारियों के आधिकारिक नोटिस पर उपस्थित होकर अपने दस्तावेज भी प्रस्तुत किए थे। उनके मुताबिक, दस्तावेजों का सत्यापन भी किया गया था।
लेकिन बाद में मतदाता पहचान पत्र नंबर की जांच करने पर अलग-अलग नाम सामने आए।
  • - फैजान अली खान का मामला: उनके EPIC नंबर पर ‘रईस अली’ नाम दिखाई दे रहा था, जिसे हुजैब अली का बेटा या रिश्तेदार बताया गया था। जबकि फैजान के अनुसार, उनके पिता का नाम मुशफिक अली खान है।
  • - उनके भाई फरहान का मामला: फरहान के रिकॉर्ड में ‘गुफरान असलम’ नाम दिखाई दिया, जिसे हमीद असलम का बेटा बताया गया।
फैजान खान ने दावा किया कि उनके मोहल्ले में इन नामों के कोई व्यक्ति नहीं हैं। उन्होंने आशंका जताई कि इस तरह के बदलावों से वास्तविक मतदाताओं को मतदान के अधिकार से वंचित किया जा सकता है। यह शिकायतकर्ता के आरोप हैं; संबंधित प्रविष्टियों में बदलाव किसने और किस उद्देश्य से किए, इसकी जांच की जा रही है।
फैजान खान के मुताबिक, शुरुआत में प्रशासन ने इन विसंगतियों को तकनीकी त्रुटि बताकर टाल दिया था। इसके बाद उन्होंने मांग की कि उनके और उनके भाई के सही विवरण बहाल किए जाएं तथा यह पता लगाया जाए कि अंतिम मतदाता सूची जारी होने और दस्तावेजों के सत्यापन के बाद बदलाव कैसे किए गए। उन्होंने पीलीभीत जिले की अन्य तीन विधानसभा सीटों—बरखेड़ा, पूरनपुर और बीसलपुर- की मतदाता सूचियों की भी जांच कराने की मांग की।
उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने 21 अक्टूबर को लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके पीलीभीत सदर की मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों का आरोप लगाया। पार्टी का दावा था कि अप्रैल में अंतिम सूची प्रकाशित होने के बाद जुलाई से सितंबर के बीच मतदाताओं के विवरण बदले गए, जबकि उनके EPIC नंबर और क्रम संख्या कथित तौर पर वही रहे। कांग्रेस ने तीन श्रेणियों में कुल 16,554 मामलों का दावा किया।

एक ही EPIC नंबर पर दो अलग-अलग नाम होने का आरोपः कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने एक उदाहरण देते हुए आरोप लगाया कि एक EPIC नंबर पहले 35 वर्षीय मोहम्मद यूसुफ के नाम पर दर्ज था, जबकि बाद में उसी नंबर के सामने रमजान अली के बेटे हसरत का नाम दिखाई देने लगा। कांग्रेस के मुताबिक, दोनों रिकॉर्ड में उम्र समान बताई गई थी। पार्टी का कहना है कि यदि मतदाता पहचान संख्या के सामने किसी दूसरे व्यक्ति का नाम दर्ज हो जाए, तो संबंधित मतदाता को अपनी पहचान साबित करने और मतदान के समय परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

निर्वाचन आयोग ने क्या कार्रवाई की?

उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिनवा के कार्यालय की कार्रवाई में चार महत्वपूर्ण कदम सामने आए:
  • - पीलीभीत सदर के संबंधित ERO और मतदाता पंजीकरण केंद्र के ऑपरेटर को चुनाव संबंधी कार्य से हटाने के निर्देश।
  • - संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 और भारतीय न्याय संहिता के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत कानूनी कार्रवाई शुरू करने के निर्देश।
  • - संबंधित सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों की जवाबदेही पर विस्तृत रिपोर्ट मांगना।
  • - पीलीभीत जिले की सभी विधानसभा सीटों की मतदाता सूचियों की जांच करके दो दिन के भीतर रिपोर्ट देने का निर्देश।
  • मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों के निर्वाचन अधिकारियों को भी अपने क्षेत्रों की मतदाता सूचियों में इसी तरह की विसंगतियों की जांच करके दो दिन में रिपोर्ट देने को कहा।

यूपी के दूसरे जिलों में भी तमाम गड़बड़ियों के मामले में सामने आये

मुरादाबाद में पिंकी के नाम पर 3 एंट्रीः उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, मुरादाबाद नगर में पिंकी नाम की महिला के नाम पर तीन प्रविष्टियां दिखाई गईं। तीनों में पति का नाम कुलदीप, उम्र 30 वर्ष और लिंग महिला दर्ज होने का दावा किया गया, जबकि पते अलग-अलग बताए गए। 6 जनवरी 2026 को प्रकाशित ड्राफ्ट सूची में महिला का नाम नहीं था। इसके बाद तीन फॉर्म-6 आवेदन दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई। 10 अप्रैल 2026 को प्रकाशित अंतिम सूची में क्रम संख्या 1015, 1028 और 1062 पर तीनों प्रविष्टियां दिखाई गईं। यदि ये प्रविष्टियां एक ही महिला की हैं और तीनों सक्रिय बनी हुई हैं, तो यह जांचना जरूरी होगा कि एक ही व्यक्ति के नाम पर कई रिकॉर्ड कैसे कायम रहे। 

साहिबाबाद: एक दंपती के नाम पर पांच प्रविष्टियां होने का दावा

गाजियाबाद के साहिबाबाद क्षेत्र से संबंधित ग्राफिक में एक दंपती के नाम पर पांच प्रविष्टियां दिखाई गईं- पत्नी के नाम पर तीन और पति के नाम पर दो।
बताए गए विवरण के मुताबिक:
  • - पत्नी के नाम पर क्रम संख्या 684, 708 और 714 थीं।
  • - पति के नाम पर क्रम संख्या 674 और 715 थीं।
  • - दोनों के नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं होने और नाम जुड़वाने के लिए एक-एक फॉर्म-6 आवेदन दिए जाने का दावा किया गया।
  • - पत्नी की प्रविष्टियों में पति का नाम धर्मेंद्र सिंह और पति के रिकॉर्ड में पिता का नाम महेंद्र सिंह बताया गया।
यदि एक-एक आवेदन के बाद वास्तव में पांच सक्रिय प्रविष्टियां बनीं, तो यह पता लगाना जरूरी है कि रिकॉर्ड एक ही दंपती के हैं या नहीं, क्या कोई प्रविष्टि बाद में निष्क्रिय की गई और क्या डेटा या सत्यापन में गलती हुई।

मुगलसराय: एक बूथ पर 30 मतदाताओं को मृत घोषित करने का दावा

मुगलसराय के बूथ नंबर 53 पर क्रम संख्या 1 से 30 तक के मतदाताओं को मृत चिह्नित किए जाने का दावा किया गया। इसी रिकॉर्ड के मुताबिक, इन 30 में से 22 मतदाताओं की उम्र 20 से 39 वर्ष के बीच बताई गई है। यह कुल संख्या का लगभग 73.3 प्रतिशत है। यहां तीन सवाल महत्वपूर्ण हैं:
  • 1. क्या प्रत्येक मतदाता की मृत्यु की पुष्टि के लिए पर्याप्त सत्यापन किया गया? 
  • 2. क्या बूथ स्तर पर संबंधित परिवारों या अन्य उपलब्ध रिकॉर्ड से जानकारी मिलाई गई?
  • 3. मृत घोषित करने का आधार और उससे संबंधित दस्तावेज क्या हैं?
कम उम्र होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि किसी व्यक्ति को गलत तरीके से मृत चिह्नित किया गया। लेकिन यदि लगातार 30 प्रविष्टियों को मृत बताया गया है, तो सत्यापन प्रक्रिया की जांच जरूरी है। इन तीनों मामलों में रिकॉर्ड के आधार पर सवाल उठते हैं।

अधिकारियों के तबादले के लिए अब पूर्व अनुमति जरूरी

इन विवादों के बीच चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश में SIR से जुड़े अधिकारियों के तबादले के लिए आयोग की पूर्व अनुमति अनिवार्य कर दी है। इसका उद्देश्य पुनरीक्षण के दौरान प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखना है। लेकिन अधिकारियों का तबादला रोकना और मतदाता सूची की गलतियां सुधारना दो अलग-अलग विषय हैं। सूची की विश्वसनीयता के लिए रिकॉर्ड का सत्यापन, बदलावों का ऑडिट और जिम्मेदारी तय करना भी उतना ही जरूरी है।

तेलंगाना: एन्यूमरेशन फॉर्म के प्रारूप पर कानूनी सवाल

तेलंगाना से जुड़ी द हिंदू की रिपोर्ट का मुख्य विषय SIR के एन्यूमरेशन फॉर्म का प्रारूप और उससे जुड़े कानूनी सवाल हैं। मूल लेख का पूरा पाठ उपलब्ध नहीं हो सका, इसलिए उसके सभी विशिष्ट तर्कों को हूबहू प्रस्तुत करना संभव नहीं है। हालांकि, इस विवाद से संबंधित दो महत्वपूर्ण कानूनी पहलू अन्य प्रकाशित रिपोर्टों में सामने आए हैं।
क्या फॉर्म में बदलाव के लिए कानूनी संशोधन जरूरी हैः द इंडियन एक्सप्रेस की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग के ECINET पोर्टल पर नए मतदाता के पंजीकरण के लिए फॉर्म-6 में ऐसी जानकारी मांगी जाने लगी थी कि आवेदक के माता-पिता पिछली SIR सूची में दर्ज थे या नहीं। इसके साथ संबंधित मतदान केंद्र और क्रम संख्या जैसी जानकारी भी मांगी गई थी।
रिपोर्ट में कानूनी सवाल उठाया गया कि फॉर्म-6, Registration of Electors Rules, 1960 का हिस्सा है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 28 के तहत नियम बनाने की शक्ति केंद्र सरकार के पास है। इसलिए नियमों का हिस्सा बने फॉर्म में बदलाव के लिए आवश्यक संशोधन और राजपत्र अधिसूचना की जरूरत हो सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, उस समय संबंधित संशोधन की अधिसूचना उपलब्ध नहीं थी।

तेलंगाना हाईकोर्ट में ऑटोमैटिक डेटा मिलान प्रक्रिया को चुनौती

तेलंगाना में SIR के दौरान एन्यूमरेशन फॉर्म में छोटी विसंगतियों के आधार पर मतदाताओं को नोटिस जारी करने के लिए ECINET नामक स्वचालित डेटा-मिलान प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल पर भी सवाल उठे हैं। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, 5 अक्टूबर को तेलंगाना हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा कि SIR प्रक्रिया में एक मतदाता का नाम बिना नोटिस दिए मतदाता सूची से क्यों हटाया गया। अदालत ने दूसरे मतदाता के मामले में भी यह जानना चाहा कि नोटिस का जवाब दिए जाने के बाद क्या कार्रवाई की गई। याचिका में आरोप लगाया गया था कि स्वचालित प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल की कानूनी अनुमति स्पष्ट नहीं है, संबंधित भौतिक रिकॉर्ड का पर्याप्त सत्यापन नहीं किया गया और निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों ने स्वतंत्र रूप से उचित विचार नहीं किया। याचिकाकर्ता ने प्लेटफॉर्म की कार्यप्रणाली और डेटा मिलान के तरीके की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग भी उठाई। ये याचिकाकर्ता के आरोप हैं। अदालत द्वारा जवाब मांगना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पूरी प्रक्रिया अवैध घोषित कर दी गई है।

तेलंगाना में फॉर्म की भाषा और उपलब्धता का सवाल

तेलंगाना में एन्यूमरेशन फॉर्म की भाषा को लेकर भी पहले विवाद सामने आया था। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की 26 जून 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, हैदराबाद की पांच विधानसभा सीटों—जुबली हिल्स, कारवां, याकूतपुरा, बहादुरपुरा और मुशीराबाद—में अंग्रेजी फॉर्म उपलब्ध कराने में देरी हुई थी। अधिकारियों ने इसकी वजह अंग्रेजी फॉर्म की छपाई में देरी बताई थी। इसी तरह, एक याचिका में सवाल उठाया गया था कि ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम क्षेत्र के बाहर केवल तेलुगु में फॉर्म बांटने से गैर-तेलुगु भाषी मतदाताओं को कठिनाई हो सकती है। भाषा और प्रारूप का मुद्दा महज सुविधा का नहीं है। मतदाता को यदि फॉर्म की भाषा समझ में नहीं आती, तो गलत जानकारी दर्ज होने या आवश्यक प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाने का जोखिम बढ़ सकता है।

चुनाव आयोग से किन सवालों के जवाब जरूरी हैं?

इन घटनाक्रमों के बाद निर्वाचन आयोग और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल हैं:
  • - दिल्ली में दर्ज सभी आपत्तियों की सूची सार्वजनिक क्यों नहीं है और 4,263 मामलों की स्थिति क्या है?
  • - क्या किसी मतदाता का नाम हटाने से पहले नोटिस, सार्वजनिक सूचना और जवाब देने का अवसर सुनिश्चित किया जा रहा है?
  • - पीलीभीत में EPIC नंबरों के सामने दूसरे मतदाताओं का विवरण क्यों दिखाई दिया और कितने रिकॉर्ड प्रभावित हुए?
  • - कांग्रेस के बताए गए 13,150 नाम बदलने, नाम हटाने और नए नाम जोड़ने के मामलों में कितनी विसंगतियां जांच में सही पाई जाती हैं?
  • - मुरादाबाद, साहिबाबाद और मुगलसराय के दावों की आधिकारिक पुष्टि के लिए संबंधित रिकॉर्ड की जांच की गई है या नहीं?
  • - तेलंगाना में एन्यूमरेशन फॉर्म के प्रारूप और ECINET की स्वचालित जांच प्रक्रिया का कानूनी आधार क्या है?
  • - जिन मतदाताओं के रिकॉर्ड में गलती पाई जाती है, उनके नाम और विवरण समय रहते ठीक करने के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी?

SIR की विश्वसनीयता पारदर्शिता और जवाबदेही से तय होगी

दिल्ली में 4,263 आपत्तियों का वेबसाइट पर उपलब्ध न होना, पीलीभीत में EPIC नंबरों के सामने गलत विवरण दिखाई देने की शिकायत पर कार्रवाई और तेलंगाना में फॉर्म के प्रारूप व डेटा-मिलान प्रक्रिया पर कानूनी सवाल- ये सभी घटनाएं मतदाता सूची की शुद्धता को लेकर गंभीर पड़ताल की मांग करती हैं।
उत्तर प्रदेश में निर्वाचन कार्यालय की कार्रवाई महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे कांग्रेस के सभी आरोपों या दूसरे जिलों के दावों की पुष्टि नहीं होती। दिल्ली में वेबसाइट पर सूचीबद्ध नहीं होने और आधिकारिक रिकॉर्ड से गायब होने के बीच अंतर स्पष्ट करना जरूरी है। तेलंगाना में कानूनी सवालों का फैसला संबंधित नियमों, दस्तावेजों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए। मतदाता सूची में गलती केवल डेटा की समस्या नहीं है। वह किसी नागरिक की लोकतांत्रिक भागीदारी को प्रभावित कर सकती है। इसलिए निर्वाचन आयोग को हर आवेदन, हर बदलाव और हर आपत्ति की स्थिति पारदर्शी बनानी चाहिए। गलत प्रविष्टियों को सुधारने, प्रभावित मतदाताओं को सुनवाई का अवसर देने और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने से ही SIR पर जनता का भरोसा मजबूत हो सकता है।