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0 से 10 पहुँचीं मायावती, वोट शेयर बराबर, फिर भी बहाने?

लोकसभा चुनाव में बीजेपी को शिकस्त देने के मक़सद से बना महागठबंधन आख़िरकार ढह गया। महागठबंधन में शामिल बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) सुप्रीमो मायावती ने इससे बाहर आने के पीछे जो कारण बताए हैं, वे किसी के गले नहीं उतर रहे हैं। मायावती ने चुनाव में हार के लिए समाजवादी पार्टी (एसपी) को ज़िम्मेदार ठहराते हुए कहा है कि चुनाव में यादव मतदाताओं ने उत्तर प्रदेश में महागठबंधन का साथ नहीं दिया। हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव और उनकी पत्नी डिंपल यादव से उनका कोई मनमुटाव नहीं है।

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मायावती ने कहा है कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश में 11 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव को लड़ेगी और अकेले लड़ेगी। जबकि बीएसपी हमेशा से ही उपचुनावों से किनारा करती आई है। मायावती के बाद महागठबंधन में शामिल एक और पार्टी राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) ने भी कहा है कि वह महागठबंधन में रहने के बारे में जल्द फ़ैसला लेगी।
उत्तर प्रदेश की जिन 11 सीटों पर उपचुनाव होना है, वे सीटें हैं - गंगोह, टूंडला, रामपुर, गोविंदनगर, लखनऊ कैंट, प्रतापगढ़, मानिकपुर चित्रकूट, जैदपुर, बलहा, बहराइच, इगलास और जलालपुर।

चुनाव से पहले भी यह चर्चा जोरों पर थी कि चुनाव के बाद मायावती या तो एसपी से गठबंधन तोड़ लेंगी या बीजेपी का दामन थाम सकती हैं। बता दें कि मायावती पहले भी तीन बार - 1995, 1997 और 2002 में बीजेपी के साथ मिलकर यूपी में सरकार बना चुकी हैं।
बहरहाल, मायावती ने गठबंधन से अगल होने के कारण बताते हुए कहा कि बदायूँ, फ़िरोज़ाबाद और कन्नौज की सीटें तक एसपी हार गई जबकि यहाँ से यादव परिवार के लोग ही चुनाव लड़ रहे थे। हालाँकि एसपी के नेताओं का भी मानना है कि यादव इलाक़ों वाली सीटों पर भी उनके उम्मीदवार हार गए लेकिन इसे कहीं से भी गठबंधन तोड़ने का कारण नहीं माना जाना चाहिए।
मायावती ने महागठबंधन से अलग होने के पीछे जो कारण बताए हैं, क्या वह सही हैं या बीएसपी सुप्रीमो झूठ बोल रही हैं, उसके लिए हमें बीएसपी को 2014 और 2019 में मिले वोट शेयर की तुलना करनी होगी।
2019 में बीएसपी ने 38 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इंडियन एक्सप्रेस में छपी ख़बर के मुताबिक़, बीएसपी को सिर्फ़ फतेहपुर सीकरी सीट को छोड़कर बाक़ी सभी सीटों पर 2014 के मुक़ाबले ज़्यादा वोट मिले हैं। तब बीएसपी अकेले चुनाव लड़ी थी और ऐसे में यह संभव नहीं हो सकता कि एसपी के समर्थन के बिना बीएसपी के उम्मीदवारों को पिछली बार से ज़्यादा मत मिल जाएँ। इसके अलावा उत्तर प्रदेश की 11 सीटें ऐसी हैं, जहाँ पर बीएसपी का वोट शेयर 2014 में एसपी और बीएसपी को मिले कुल वोट शेयर से ज़्यादा है। ये 11 सीटें - सहारनपुर, बिजनौर, नगीना, अमरोहा, मेरठ, बुलंदशहर, अंबेडकर नगर, घोसी, सलेमपुर, जौनपुर और मछलीशहर हैं। इन 10 में से 7 सीटों पर बीएसपी को जीत मिली है। एसपी नेताओं का दावा है कि बीएसपी जौनपुर, ग़ाज़ीपुर और लालगंज सीटों को उनकी पार्टी के समर्थन के बिना नहीं जीत सकती थी। 
उत्तर प्रदेश में बीएसपी को इन सीटों पर जीत मिली और 2014 के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा वोट मिले। 
2014 में एसपी को 22.35%, बीएसपी को 19.77% वोट मिले थे जबकि 2019 में एसपी को 17.96% और बीएसपी को 19.26% वोट मिले। यानी एसपी का वोट शेयर तो गिरा लेकिन बीएसपी का लगभग वही रहा। ऐसे में माया कैसे कह सकती हैं कि उन्हें एसपी का वोट नहीं मिला।
मायावती ने महागठबंधन से निकलते वक़्त बेहद सावधानी से शब्द चुने हैं और उतनी ही सावधानी से कारणों को गिनाया है। मायावती ने यह नहीं कहा कि एसपी के समर्थक माने जाने वाले मुसलिम-यादव मतदाताओं ने उन्हें वोट नहीं दिया। मायावती ने सिर्फ़ यादव मतदाताओं का नाम लिया है। दूसरी बात यह कि, उन्होंने अखिलेश यादव पर सीधा वार नहीं किया है जिससे भविष्य में फिर से गठबंधन करने की संभावनाएँ ख़त्म न हों।
यह बात भी ध्यान रखने वाली है कि 2014 में 0 सीटों के मुक़ाबले इस बार बीएसपी को 10 सीटें मिली हैं, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि मायावती को एसपी और आरएलडी के मतदाताओं का वोट ट्रांसफ़र नहीं हुआ।
लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद बीएसपी राज्य के मुसलिम मतदाताओं को यह संदेश दे सकती है कि वह एसपी से ज़्यादा दमदार और बड़ी पार्टी है। मायावती ने अपने बयान से यह भी बताने की कोशिश की है कि यादव मतदाता पूरी तरह एसपी के साथ नहीं हैं जबकि दलित मतदाता बीएसपी के पीछे खड़े हैं। मायावती यह साबित करना चाहती हैं कि बीजेपी ने एसपी के यादव वोट बैंक में सेंध लगा दी है और सिर्फ़ वही (मायावती) बीजेपी से लड़ने में सक्षम हैं।
मायावती एक बार फिर मुसलिमों के बीच आधार बनाने की कोशिशों में जुटी हैं। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने सबसे ज़्यादा मुसलिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था, हालाँकि इसका उन्हें कोई फ़ायदा नहीं मिला था।

क्या फिर साथ आएँगे दोनों दल?

उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव 2022 में हैं, ऐसे में तब तक एसपी और बीएसपी अगर फिर से वापस आना चाहें तो इसके लिए उनके पास काफ़ी वक्त है। अगर 2022 से पहले तक बीजेपी मजबूत स्थिति में ही रही तो ये दोनों दल एक बार फिर गठबंधन कर सकते हैं। इसीलिए मायावती ने अखिलेश के ख़िलाफ़ व्यक्तिगत रूप से एक भी शब्द बोलने से परहेज किया है।
मायावती ने बार-बार ‘आधार वोटों’ का जिक्र किया है। मायावती ने चुनाव प्रचार के दौरान यही कहा था कि ‘एक भी वोट न घटने पाये, एक भी वोट न बँटने पाये’, इसका मतलब यही था कि तीनों दलों के आधार वोट यानी मुसलिम-यादव-दलित-जाट वोट महागठबंधन को मिलें।

बीजेपी ने फ़ेल की गणित

लेकिन चुनाव नतीजे साफ़ करते हैं कि बीजेपी की ओर से बिछाई गई चुनावी बिसात के सामने महागठबंधन की यह गणित पूरी तरह से फ़ेल हो गई। बीजेपी ने 2014 के लोकसभा चुनाव के मुक़ाबले अपने वोट शेयर में अच्छा-ख़ासा इज़ाफ़ा किया। 2014 में उसे 42.63% वोट मिले थे जबकि 2019 में उसे 49.56% वोट मिले हैं। जबकि बीएसपी-एसपी-आरएलडी गठबंधन को 2014 में 42.98% वोट मिले थे जबकि इस बार उसे 38.89% वोट मिले हैं।
बिहार में 2015 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के ख़िलाफ़ जिस तरह का महागठबंधन बनाया गया था, वैसा उत्तर प्रदेश में इस चुनाव में नहीं बन सका। बिहार विधानसभा के चुनाव में आरजेडी-जेडीयू-कांग्रेस महागठबंधन ने भी जातीय आधार पर वोटों की चुनावी बिसात बिछाई थी, साथ ही नीतीश कुमार की सुशासन बाबू की छवि को मुद्दा बनाया था। ऐसा करके महागठबंधन बीजेपी को मात देने में सफल रहा था।
लेकिन उत्तर प्रदेश में बना गठबंधन सिर्फ़ ‘जातीय आधार’ के वोटों तक सिमटकर रह गया। कर्नाटक में बीजेपी के ख़िलाफ़ बने कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन और झारखंड में भी बीजेपी के ख़िलाफ़ ही बने कांग्रेस-जेएमएम गठबंधन भी बीजेपी को मात नहीं दे सका। 
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बता दें कि एसपी को ओबीसी और उसमें से भी यादवों की समर्थक पार्टी माना जाता है, बीएसपी को दलितों उसमें भी जाटवों की नुमाइंदगी वाली पार्टी माना जाता है और आरएलडी को जाटों के वोट बैंक वाली पार्टी माना जाता है। लेकिन बीजेपी इन दलों का गठबंधन होने के बाद से ही ख़ासी सतर्क थी और उसका पूरा फ़ोकस ग़ैर यादव ओबीसी और ग़ैर जाटव दलितों पर था। जाट पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों के अलावा कहीं प्रभावी नहीं हैं। इसलिए बीजेपी ने ग़ैर यादव ओबीसी और ग़ैर जाटव दलितों में सेंधमारी करके अपना वोट बैंक बढ़ाने पर ध्यान दिया।
2014 में जब अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया था तब भी उन्होंने इसी रणनीति पर काम किया था और बीजेपी को अपने दम पर 80 में से 71 सीटें मिली थीं। महागठबंधन अपने ‘आधार वोट’ के बाहर की जातियों को अपने पाले में लाने में नाकाम रहा और बीजेपी इन जातियों का पूरा समर्थन जुटाने में सफल रही। ख़ैर, कुल मिलाकर यह कहीं से नहीं लगता कि बीएसपी को यादव या जाट वोट ट्रांसफ़र नहीं हुए और इस कारण पार्टी की सुप्रीमो मायावती गठबंधन तोड़ लें। 
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