सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों पर गुरुवार 29 जनवरी को अंतरिम रोक लगा दी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि ये नियम पहली नज़र में ही अस्पष्ट हैं और इनका दुरुपयोग होने की संभावना है। अदालत ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी करते हुए कहा कि नियमों की भाषा इतनी अस्पष्ट है कि ये समाज को विभाजित करने की क्षमता रखते हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का विरोध उसी समय हो गया जब चीफ जस्टिस सूर्यकांत आदेश को पढ़ रहे थे।

मशहूर वकील इंदिरा जयसिंह ने चीफ जस्टिस को टोकते हुए कहा- हमारी बात सुने बिना नियमों पर रोक लगाना उचित नहीं है। ऐसा नहीं हो सकता कि आप कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा करें और फिर रोक लगाने के लिए अदालत में आए।"

इंदिरा जयसिंह ने तर्क दिया कि ये नियम उच्च शिक्षा में समानता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक थे और बिना सभी पक्षों को सुनकर रोक लगाना अनुचित है। अदालत ने उनकी बात सुनी, लेकिन अंतरिम रोक का फैसला बरकरार रखा।

VBA अध्यक्ष प्रकाश आंबेडकर

न्यायपालिका का न्यायिक आत्मसमर्पणः प्रकाश आंबेडकर

इस फैसले के बाद विभिन्न संगठनों और प्रमुख व्यक्तियों की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। जहां सवर्ण समुदाय के लोग इस रोक को अपनी जीत मान रहे हैं, वहीं दलित, एससी-एसटी, ओबीसी और अन्य पिछड़े वर्ग के संगठन इसकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं। वंचित बहुजन अघाड़ी पार्टी के अध्यक्ष और बाबा साहब आंबेडकर के प्रपौत्र प्रकाश आंबेडकर ने कहा है कि यदि यूजीसी के उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी नए विनियम, 2026 के संबंध में चल रही चर्चा का स्तर निंदनीय था, तो इन नियमों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक उसी चर्चा के प्रति न्यायिक आत्मसमर्पण का एक चिंताजनक उदाहरण है!

प्रकाश आंबेडकर ने कहा- यह रोक संवैधानिक सिद्धांतों और वास्तविक समानता, सामाजिक न्याय और शिक्षा तक लोकतांत्रिक पहुंच के वादे के विरुद्ध है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नए विनियम "समाज को विभाजित करेंगे"! लेकिन क्या समाज पहले से ही विभाजित नहीं है? जाति के आधार पर!? और ये विनियम तो जातिगत भेदभाव से बचाव के लिए ही तो बनाए गए थे!  मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि कोई बुनियादी समानता के उपायों का विरोध कैसे कर सकता है; विरोध प्रदर्शन स्वयं रोहित वेमुला, पायल ताडवी और उन हजारों लोगों की यादों पर चोट थे, जिन्होंने शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव का सामना किया है और आज भी कर रहे हैं। यह एक दुखद दिन है!

अखिलेश यादव का विरोध

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया अलग तरह से दी। जिसका मतलब कुल मिलाकर आलोचना था लेकिन आलोचना सीधी नहीं है। अखिलेश ने लिखा है- सच्चा न्याय किसी के साथ अन्याय नहीं होता है, माननीय न्यायालय यही सुनिश्चित करता है। क़ानून की भाषा भी साफ़ होनी चाहिए और भाव भी। बात सिर्फ़ नियम नहीं, नीयत की भी होती है। न किसी का उत्पीड़न हो, न किसी के साथ अन्याय  
न किसी पर जुल्म-ज्यादती हो, न किसी के साथ नाइंसाफ़ी।
लेखक और विचारक लक्ष्मण यादव ने इस फैसले पर अपनी राय रखते हुए लिखा है, "मैंने पहले दिन से कहा था कि #UGCRegulations एक साज़िश और झोल है। घालमेल करके पहले दलितों पिछड़ों को ख़ुशफ़हमी में डाला, उधर सवर्णों से विरोध करवाया; इधर कोर्ट से रुकवा दिया। इससे बड़ा मज़ाक़ और क्या हो सकता है।"

आरजेडी सांसद मनोज झा ने एक्स पर लिखा, "इतिहास हमें याद दिलाता है कि 'न्यायिक निष्पक्षता' अक्सर एक मिथक होती है; मायने यह रखता है कि कानून किस 'यथास्थिति' की रक्षा करना चुनता है।"

सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा- 'सुप्रीम कोर्ट ने जातीय भेदभाव को legalized कर दिया। कोर्ट में सरकार मजबूती से पक्ष नहीं रख पाई।'
पूर्व सांसद उदितराज ने एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा- अभी अभी भारत के कुछ मनुवादी पाकिस्तान से युद्ध जितने जैसी ख़ुशी मना रहे हैं । सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा फ़ैसला आया कि यूजीसी के निमय को 19 मार्च तक रोका जाये । कुछ लोग ऐसे जश्न मना रहे हैं जैसे कोई बड़ी जंग की जीत हुई हो। जातीय नफ़रत से अधिक दुनिया में कोई हलाहल विष न होगा। इसका एक चौथाई ताक़त पेपर लीक, निजीकरण के कारण नौकरियों का ख़ात्मा और महँगी शिक्षा के विरोध में लगाया होता तो कितनों का भला हो गया होता। इतनी नफ़रत दलित, पिछड़े और आदिवासी से, इन्हें कुछ न मिले चाहे देश पिछड़ा रहे या ख़ुद भिखारी बन जायें।

बसपा सुप्रीमो मायावती

मायावती की इस प्रतिक्रिया पर आप क्या कहेंगे

बसपा प्रमुख मायावती ने एक्स पर लिखा- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, यूजीसी द्वारा देश के सरकारी व निजी विश्वविद्यालयों मे जातिवादी घटनाओं को रोकने के लिए जो नये नियम लागू किये गये है, जिससे सामाजिक तनाव का वातावरण पैदा हो गया है। ऐसे वर्तमान हालात के मद्देनजर रखते हुये माननीय सुप्रीम कोर्ट का यूजीसी के नये नियम पर रोक लगाने का आज का फैसला उचित। जबकि देश में, इस मामले में सामाजिक तनाव आदि का वातावरण पैदा ही नहीं होता अगर यूजीसी नये नियम को लागू करने से पहले सभी पक्ष को विश्वास में ले लेती और जाॅच कमेटी आदि में भी अपरकास्ट समाज को नेचुरल जस्टिस के अन्तर्गत उचित प्रतिनिधित्व दे देती।