12वीं कक्षा के छात्र सार्थक सिद्धांत ने CBSE द्वारा जारी 576 टेंडरों का डेटा जमा किया। इसके बाद उन्होंने बताया कि टेंडरों में किस तरह नियमों को बदल कर मनचाही कंपनी को ठेका दिया गया। हालांकि सीबीएसई ने दावों का खंडन किया है।
CBSE की ऑन-स्क्रीन मूल्यांकन प्रणाली पर बड़ा सवाल 17 साल के सार्थक सिद्धांत ने खड़ा किया है। उन्होंने अपनी रिसर्च से बताया कि नियम बदलकर एक विवादित कंपनी को 17 लाख छात्रों की आंसरशीट मूल्यांकन का ठेका मिला। सार्थक 2025-26 बैच के उन्हीं 17 लाख छात्रों में शामिल हैं, जिनकी आंसरशीट का मूल्यांकन CBSE की नई ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली के तहत किया गया।
सार्थक ने कई दिनों तक CBSE के टेंडर्स का अध्ययन किया। उन्होंने CBSE द्वारा जारी की गई कुल 576 निविदाओं का डेटा एकत्र किया और यह पता लगाने की कोशिश की कि एक ही परियोजना के लिए जारी किए गए तीन अलग-अलग टेंडरों में नियमों को किस तरह बदला गया।
सार्थक ने अपनी जो जांच की, उसका मुख्य निष्कर्ष यह है कि 17 लाख छात्रों की आंसरशीट स्कैनिंग और डिजिटल मूल्यांकन का ठेका जिस कंपनी को मिला, उसका नाम कोएम्प्ट एडुटेक (Coempt Eduteck) है।
ग्लोबरेना से कोएम्प्ट तक का सफर
सार्थक की जांच से पता चला कि कोएम्प्ट एडुटेक का पुराना नाम ग्लोबरेना टेक्नोलॉजीज़ (Globarena Technologies) था। ग्लोबरेना वही कंपनी थी जो 2019 के तेलंगाना इंटरमीडिएट परीक्षा घोटाले के केंद्र में थी। उस समय सॉफ्टवेयर संबंधी गंभीर गड़बड़ियों के कारण लगभग 3.8 लाख छात्रों को गलत अंक मिले थे या उनके अंक दर्ज ही नहीं हुए थे। इस घटना के बाद 23 छात्रों द्वारा आत्महत्या किए जाने की खबरें सामने आई थीं।सरकार की जांच समिति ने इस पूरे मामले में सिस्टम की विफलता और लापरवाही की बात कही थी। इसके लगभग छह महीने बाद ग्लोबरेना ने अपना नाम बदलकर कोएम्प्ट एडुटेक कर लिया। सवाल यह उठता है कि ऐसे विवादित रिकॉर्ड वाली कंपनी को CBSE जैसी संस्था की महत्वपूर्ण परियोजना का ठेका कैसे मिला?
तीन बार जारी हुआ टेंडर, पहला टेंडर फरवरी 2025ः फरवरी 2025 में पहला टेंडर जारी किया गया था। लेकिन बाद में यह सार्वजनिक GeM पोर्टल से गायब हो गया। सार्थक सिद्धांत का दावा है कि उन्होंने CBSE की सभी 576 निविदाओं का रिकॉर्ड निकाला, लेकिन यह पहला टेंडर कहीं उपलब्ध नहीं था।
दूसरा टेंडर मई 2025ः मई 2025 में दूसरा टेंडर जारी हुआ। इसमें चार कंपनियों ने आवेदन किया, जिनमें TCS और Coempt भी शामिल थीं। तकनीकी मूल्यांकन में चारों कंपनियां असफल घोषित कर दी गईं और टेंडर रद्द कर दिया गया।
- तीसरा टेंडर अगस्त 2025ः अगस्त 2025 में तीसरा टेंडर जारी हुआ और इस बार Coempt Eduteck विजेता बन गई। सार्थक के अनुसार दूसरे और तीसरे टेंडर के बीच नियमों में कई बदलाव किए गए और लगभग हर बदलाव से Coempt को लाभ मिला।
टेंडर नियमों में किए गए प्रमुख बदलाव
पुराने विवादों से जुड़ी अयोग्यता हटाई गईः सार्थक ने टेंडर नियमों को बदले जाने पर अपनी रिसर्च फोकस की। उन्होंने पाया कि पहले नियमों में ऐसी कंपनियों को अयोग्य माना जाता था जिनका काम अधूरा छोड़ने, अनुबंध पूरा न करने या वित्तीय कमजोरी का इतिहास हो। नए नियमों में यह प्रावधान पूरी तरह हटा दिया गया। इससे तेलंगाना विवाद का रिकॉर्ड बाधा नहीं रहा।
ब्लैकलिस्ट करने का नियम बदलने से फायदाः पुराने नियमों के तहत कोई भी कंपनी जो पहले कभी ब्लैकलिस्ट हुई हो, अयोग्य थी। नए नियमों में सिर्फ वर्तमान में ब्लैकलिस्ट कंपनियों को अयोग्य माना गया। सार्थक का कहना है कि ग्लोबरेना का नाम बदलकर कोएम्प्ट किए जाने के बाद यह बदलाव उसके लिए लाभकारी साबित हुआ।
50 करोड़ रुपये टर्नओवर की शर्तः नियमों में तीन वर्षों का औसत टर्नओवर 50 करोड़ रुपये रखा गया। कोएम्प्ट का औसत टर्नओवर 50.86 करोड़ रुपये था, यानी वह बेहद मामूली अंतर से पात्रता प्राप्त कर सकी। बताया गया कि एक छोटी कंपनी ने पात्रता सीमा 30 करोड़ रुपये करने का अनुरोध किया था, लेकिन CBSE ने उसे अस्वीकार कर दिया।
CMMI का लेवल घटाया गयाः सॉफ्टवेयर की गुणवत्ता और परिपक्वता मापने के लिए CMMI स्तर का इस्तेमाल होता है। पुराने नियमों में लेवल-5 अनिवार्य था। नए नियमों में इसे लेवल-3 कर दिया गया। कोएम्प्ट के पास लेवल-3 सर्टिफिकेशन था।
रिटायर्ड CBSE अधिकारियों पर 'कूलिंग ऑफ' अवधि कम की गईः पहले रिटायर्ड CBSE अधिकारियों को नियुक्त करने के लिए दो वर्ष का अंतर आवश्यक था। नए नियमों में इसे घटाकर एक वर्ष कर दिया गया।
बड़े प्रोजेक्ट अनुभव की शर्त बदली गईः पहले हर परियोजना में कम से कम 5 लाख छात्रों का अनुभव आवश्यक था। नए नियमों में छात्र संख्या की शर्त हटाकर कुल आंसरशीट संख्या को आधार बना दिया गया। इससे कई छोटे विश्वविद्यालयी प्रोजेक्ट करने वाली कंपनियों को लाभ मिला।
डेटा सेंटर की अनिवार्यता समाप्तः पहले बोलीदाता के पास भारत में अपना डेटा सेंटर और डिजास्टर रिकवरी सेंटर होना जरूरी था। नए नियमों में थर्ड-पार्टी क्लाउड होस्टिंग की अनुमति दे दी गई। सार्थक का कहना है कि कोएम्प्ट AWS और Azure जैसी सेवाओं का उपयोग करती है।
सोर्स कोड स्वामित्व की शर्त हटाई गईः पहले कंपनी के पास अपने सॉफ्टवेयर के पूर्ण सोर्स कोड का स्वामित्व या नियंत्रण होना जरूरी था। यह शर्त हटा दी गई। यानी वो थर्ड पार्टी के सोर्स कोड को इस्तेमाल कर सकती है।
ब्लैकलिस्ट करने की पावर कमजोर की गईः टेंडर जमा होने से ठीक पहले जारी संशोधन में CBSE की यह पावर हटा दी गई कि सॉफ्टवेयर नाकाम होने पर कंपनी को भविष्य के टेंडरों से बाहर किया जा सके।
दंड व्यवस्था बदली गईः पहले गलत स्कैनिंग, पेज मर्ज होने या उत्तरपुस्तिका छूट जाने पर जुर्माना लगाया जाता था। नए नियमों में इन त्रुटियों पर ध्यान कम कर दिया गया और देरी पर 50,000 रुपये प्रतिदिन का जुर्माना रखा गया। आलोचकों का कहना है कि इससे गुणवत्ता की बजाय गति को बढ़ावा मिलता है।
त्रुटि सीमा समाप्तः पहले त्रुटि दर 0.5 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती थी। नए नियमों में यह सीमा हटा दी गई।
स्कैनर की गुणवत्ता संबंधी शर्तें हटाई गईंः पहले विशेष पुस्तक स्कैनर और रोबोटिक स्कैनिंग प्रणाली का उल्लेख था। नए नियमों में केवल "पर्याप्त स्कैनर" शब्द रखा गया।
सुरक्षा परीक्षण पर सवालः अनुबंध में CERT-In प्रमाणित VAPT (Vulnerability Assessment and Penetration Testing) अनिवार्य था। साथ ही सार्वजनिक उपयोग से पहले सीमित बीटा परीक्षण की भी शर्त थी। लेकिन साइबर शोधकर्ता निसर्गा द्वारा लॉन्च से कुछ दिन पहले ही कथित सुरक्षा खामियां खोज लेने के बाद इस प्रक्रिया पर सवाल उठे।
क्या सीबीएसई और सरकार सार्थक के इन सवालों का जवाब देंगे
- टेंडर प्रक्रिया का तत्काल CAG ऑडिट।
- संसद में इस विषय पर विस्तृत चर्चा।
- स्वतंत्र जांच कराकर पता लगाया जाए कि पहला टेंडर गायब क्यों हुआ?
- अयोग्यता संबंधी प्रावधान क्यों हटाए गए?
- टर्नओवर सीमा उसी स्तर पर क्यों रखी गई?
- सुरक्षा मानकों को क्यों कम किया गया?
- अंतिम समय में ब्लैकलिस्टिंग का प्रावधान क्यों हटाया गया?
यह मामला केवल एक कंपनी या एक टेंडर का नहीं है, बल्कि भारत की परीक्षा प्रणाली के डिजिटलीकरण, डेटा सुरक्षा और सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया (Public Procurement) की पारदर्शिता से जुड़ा हुआ है। यदि सार्थक द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज़ और तुलना तथ्यात्मक रूप से सही साबित होती है, तो यह दर्शा सकता है कि टेंडर की पात्रता शर्तों में व्यापक बदलाव किए गए थे। हालांकि केवल नियमों का बदलना अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं होता। सरकारी संस्थाएं समय-समय पर प्रतिस्पर्धा बढ़ाने, लागत कम करने या तकनीकी आवश्यकताओं को अद्यतन करने के लिए नियम बदलती हैं। इसलिए यह जांच का विषय है कि इन परिवर्तनों के पीछे वास्तविक प्रशासनिक और तकनीकी कारण क्या थे।
2026 में भारत की प्रमुख परीक्षा संस्थाएं CBSE, NEET, SSC, CUET, UPSC और विभिन्न राज्य शिक्षा बोर्ड तेजी से डिजिटल मूल्यांकन और क्लाउड-आधारित प्रणालियों की ओर बढ़ रही हैं। ऐसे में साइबर सुरक्षा, डेटा संप्रभुता (Data Sovereignty), एल्गोरिदमिक जवाबदेही और ऑडिट ट्रेल जैसे मुद्दे पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं।
अगर वास्तव में सुरक्षा ऑडिट, गुणवत्ता नियंत्रण या डेटा प्रबंधन संबंधी शर्तों को कमजोर किया गया है, तो इसका असर केवल 17 लाख छात्रों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य की सभी डिजिटल परीक्षा प्रणालियों पर लोगों के भरोसे को प्रभावित कर सकता है। इसलिए आवश्यकता है कि CBSE, शिक्षा मंत्रालय, CAG तथा संसदीय समितियां इस मामले पर पारदर्शी स्पष्टीकरण दें। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि ऑन-स्क्रीन मूल्यांकन प्रणाली में छात्रों के डेटा की सुरक्षा, उत्तरपुस्तिकाओं की शुद्धता और मूल्यांकन की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए कौन-कौन से स्वतंत्र ऑडिट और निगरानी तंत्र लागू किए गए हैं।