देश में चीनी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के बीच केंद्र सरकार ने आयातित कच्ची चीनी को लेकर नियम और सख्त कर दिए हैं। सरकार ने अब यह सुनिश्चित करने के लिए नई शर्तें लागू की हैं कि आयातित कच्ची चीनी लंबे समय तक गोदामों में न पड़ी रहे और बाजार में इसकी उपलब्धता तुरंत बढ़े। नए नियमों के तहत आयातित कच्ची चीनी को दो महीने के भीतर रिफाइंड चीनी में बदलना होगा और रिफाइंड चीनी को भी अगले दो महीने के भीतर बेच देना होगा। सरकार का उद्देश्य आयातित चीनी की जमाखोरी रोकना और उपभोक्ताओं को तत्काल राहत देना है।

एक महीने में चीनी 29 फीसदी महंगी

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सोमवार को देश में चीनी का औसत खुदरा भाव 63.05 रुपये प्रति किलो पहुंच गया। एक महीने पहले यह कीमत 48.73 रुपये प्रति किलो थी। यानी एक महीने में औसत खुदरा कीमत करीब 29 फीसदी बढ़ गई। चीनी का अधिकतम खुदरा मूल्य 75 रुपये प्रति किलो और मॉडल कीमत 65 रुपये प्रति किलो बताई गई है।
दूसरी ओर, सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए द टेलीग्राफ ने बताया कि 20 जुलाई को चीनी की कीमत 48.18 रुपये प्रति किलो थी, जो 20 अगस्त को बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलो हो गई। यानी इस अवधि में थोक/बाजार कीमत में 15 फीसदी से अधिक की वृद्धि हुई। कुछ शहरों में खुदरा कीमत 70 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की खबरें भी सामने आई हैं।
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कीमतों पर नियंत्रण और घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार पहले ही 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन चीनी के आयात की अनुमति दे चुकी है। अब आयात के साथ यह शर्त जोड़ दी गई है कि कच्ची चीनी को दो महीने के भीतर रिफाइन किया जाए और रिफाइंड चीनी को भी तय अवधि में बाजार में उतारा जाए। इससे सरकार आयातित स्टॉक को बाजार से बाहर रखकर कीमत बढ़ाने की संभावित कोशिशों पर अंकुश लगाना चाहती है।

चीनी महंगी होने के पीछे एक वजह नहीं

चीनी की कीमतों में मौजूदा उछाल को केवल एक कारण से नहीं जोड़ा जा सकता। सरकार के अनुसार घरेलू उत्पादन उम्मीद से कम रहना, गन्ने की फसल को कीट और अत्यधिक बारिश से नुकसान, वैश्विक आपूर्ति का दबाव, त्योहारों से पहले मांग बढ़ना तथा कुछ कारोबारियों द्वारा सट्टेबाजी और जमाखोरी इसके प्रमुख कारण हैं।
सरकार ने 21 अगस्त को बताया था कि मौजूदा सीजन में चीनी उत्पादन करीब 3.06 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जबकि शुरुआती अनुमान करीब 3.45 करोड़ टन का था। यानी उत्पादन का अनुमान लगभग 39 लाख टन घट गया है।

उत्पादन लगातार घट रहा है

द टेलीग्राफ के मुताबिक चीनी उत्पादन में गिरावट के संकेत पहले से दिखाई दे रहे थे। देश में चीनी उत्पादन 2021-22 में 3.59 करोड़ टन से घटकर 2023-24 में करीब 3.2 करोड़ टन रह गया था। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि उत्पादन में गिरावट के बावजूद नीतियों में समय रहते बदलाव नहीं किया गया।
कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी ने मौजूदा स्थिति को नीतिगत स्तर पर देर से जागने का परिणाम बताया है। उनका तर्क है कि जब उत्पादन और स्टॉक में गिरावट के संकेत पहले से मौजूद थे, तब सरकार को आयात और आपूर्ति से जुड़ी नीतियों में पहले ही बदलाव करना चाहिए था। उनके मुताबिक चीनी पर 100 फीसदी आयात शुल्क भी ऐसे समय में बहुत अधिक था, जब घरेलू उत्पादन और स्टॉक दोनों पर दबाव बढ़ रहा था।

गन्ने की फसल को कीट और बीमारियों से बड़ा नुकसान

चीनी उत्पादन में गिरावट के पीछे मौसम के साथ-साथ गन्ने की फसल में कीट और बीमारियों का बढ़ता प्रकोप भी महत्वपूर्ण कारण बताया जा रहा है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में 2025 के दौरान फसल पर प्रतिकूल मौसम और कीटों का असर देखा गया था।
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक गोविंद प्रताप राव के अनुसार कुछ खेतों में मास फ्लावरिंग यानी गन्ने में असामान्य रूप से फूल आने की समस्या करीब 30 फीसदी फसल को प्रभावित कर रही थी, जबकि सामान्य परिस्थितियों में यह दो फीसदी से कम रहती है। इससे गन्ने में चीनी बनने की क्षमता और निकालने योग्य रस दोनों प्रभावित होते हैं। इसके अलावा अर्ली शूट बोरर जैसे कीट तथा रेड रॉट और पोक्का बोएंग जैसी फंगल बीमारियों ने भी गन्ने की फसल को नुकसान पहुंचाया है।

इथेनॉल के लिए गन्ने का इस्तेमाल भी जिम्मेदार हैः चीनी की कमी और कीमतों में बढ़ोतरी के बीच इथेनॉल नीति भी बहस का हिस्सा बन गई है। अशोक गुलाटी का कहना है कि घरेलू चीनी आपूर्ति पर दबाव कम करने के लिए सरकार इथेनॉल का आयात कर सकती थी या गन्ने के बजाय अधिक चावल से इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दे सकती थी। हालांकि चीनी क्षेत्र से जुड़े एक बिजनेसमैन का कहना है कि उत्पादन में बड़ी गिरावट की स्थिति में गन्ने का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा भी इथेनॉल के लिए इस्तेमाल किया जाना बाजार में उपलब्ध चीनी पर असर डाल सकता है।

हालांकि केंद्र सरकार ने चीनी की मौजूदा महंगाई के लिए इथेनॉल में चीनी के इस्तेमाल को जिम्मेदार मानने से इनकार किया है। सरकार के मुताबिक इथेनॉल के लिए डायवर्ट की जाने वाली चीनी का हिस्सा 2022-23 में करीब 12 फीसदी से घटकर 2025-26 में लगभग 9 फीसदी रह गया है। सरकार का यह भी कहना है कि भारत में बनने वाले इथेनॉल का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अनाज, खासकर मक्का, से आता है।

उद्योग का दावा- चीनी की वास्तविक कमी नहीं

चीनी उद्योग की संस्था इंडियन शुगर एंड बायोएनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने कहा है कि देश में चीनी की वास्तविक कमी नहीं है। उसके अनुसार करीब 35 लाख टन का क्लोजिंग स्टॉक मौजूद है। उद्योग संगठन का कहना है कि कुछ कारोबारियों द्वारा जमाखोरी और अग्रिम खरीद के कारण बड़े थोक खरीदारों ने अपनी एक से दो महीने की जरूरत के बराबर चीनी जमा कर ली है। इससे बाजार में उपलब्ध चीनी की मात्रा कम हुई और कृत्रिम कमी का माहौल बना। संगठन के मुताबिक हाल की कीमत वृद्धि का मुख्य कारण मौसम से प्रभावित कम उत्पादन और सट्टेबाजी के लिए की गई स्टॉकिंग है। उद्योग को उम्मीद है कि जैसे-जैसे जमाखोरी कम होगी और नया गन्ना पेराई सीजन शुरू होगा, बाजार में चीनी की आपूर्ति बढ़ेगी और कीमतों पर दबाव घटेगा।

सरकार ने स्टॉक लिमिट भी लगाईः जमाखोरी रोकने के लिए केंद्र ने चीनी कारोबारियों पर 30 नवंबर तक 400 टन की स्टॉक सीमा लागू की है। इसके अलावा 1 सितंबर से थोक उपभोक्ताओं को अपनी खपत के अधिकतम 15 दिनों के बराबर स्टॉक रखने की अनुमति होगी।

सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को भी मंजूरी दी है। साथ ही राज्यों से नए गन्ने की पेराई 15 अक्टूबर से शुरू करने को कहा गया है। अनुमान है कि इससे अक्टूबर में चीनी उत्पादन सामान्य 3-4 लाख टन की तुलना में बढ़कर 10 लाख टन से अधिक हो सकता है।

सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती

चीनी की कीमतों में मौजूदा उछाल सरकार के सामने एक जटिल चुनौती खड़ी करता है। एक तरफ किसानों और चीनी मिलों के हितों को ध्यान में रखते हुए गन्ने की अर्थव्यवस्था को बनाए रखना है, तो दूसरी तरफ उपभोक्ताओं के लिए चीनी की कीमतों को नियंत्रित रखना है।
मौजूदा संकट यह भी दिखाता है कि उत्पादन के अनुमान, आयात नीति, स्टॉक प्रबंधन, इथेनॉल नीति और बाजार में उपलब्धता के बीच संतुलन बिगड़ने पर नियंत्रित कृषि जिंस की कीमतों पर कितना तेज असर पड़ सकता है। सरकार का नया आयात नियम, स्टॉक सीमा और शुल्क-मुक्त आयात तत्काल आपूर्ति बढ़ाने के प्रयास हैं, लेकिन कीमतों में स्थायी राहत काफी हद तक नए पेराई सीजन की शुरुआत और वास्तविक उत्पादन पर निर्भर करेगी।