सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार 10 को 14 वर्षीय एक छात्रा और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) से जुड़े प्रदर्शनकारी को कथित तौर पर धमकाए जाने और उसके घर पर पत्थरबाजी किए जाने के आरोपों को गंभीरता से लिया। अदालत ने कहा कि किसी को भी नाबालिग को डराने-धमकाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। अगर इस मामले में किसी पर आपराधिक मुकदमा दर्ज है तो उसके जवाब में ऐसे कृत्य को सही नहीं ठहराया जा सकता।
सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने उत्तर प्रदेश और दिल्ली से मामले में दर्ज FIR, नाबालिग और उसके परिवार की सुरक्षा तथा कथित हमले और धमकी में शामिल लोगों के खिलाफ की गई कार्रवाई की स्थिति रिपोर्ट मांगी।

हमलावरों पर कार्रवाई के बजाय नाबालिग पर ही एफआईआर

मामले की सुनवाई के दौरान नाबालिग छात्रा की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि एक व्यक्ति ने कथित तौर पर वीडियो में लड़की के पिता पर हमले की बात गर्व से स्वीकार की थी। यह व्यक्ति स्वतंत्र भारद्वाज है, जिसे बाद में गिरफ्तार कर हिरासत में भेजा गया। वकील ने आरोप लगाया कि हमले में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय नाबालिग के खिलाफ ही FIR दर्ज कर दी गई। उन्होंने अदालत के सामने यह भी कहा कि लड़की के घर पर पत्थर फेंके जाने के वीडियो मौजूद हैं और चार पुलिसकर्मियों को कथित हमलावरों के साथ देखा जा सकता है, लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई है।
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इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि यदि असामाजिक तत्वों ने बच्चे के खिलाफ हिंसा की है और वे खुले घूम रहे हैं तथा बच्चे को डराने की कोशिश कर रहे हैं, तो यह गंभीर मामला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि “बच्चा बच्चा होता है” और उसकी सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं।

FIR पर तत्काल कार्रवाई के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि नाबालिग की FIR पर उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जाए और उसे पर्याप्त सुरक्षा दी जाए। अदालत ने उत्तर प्रदेश पुलिस से भी पीड़िता और उसके परिवार को सुरक्षा देने को कहा। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सॉलिसिटर जनरल से कहा कि अदालत FIR पर तत्काल कार्रवाई और पीड़िता तथा उसके परिवार को उत्तर प्रदेश पुलिस की सुरक्षा चाहती है। साथ ही, अदालत ने जांच पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन द्वारा किए जाने की बात कही

जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़ा है मामला

यह विवाद CJP के छात्र प्रदर्शन के दौरान जंतर-मंतर पर हुई कथित मारपीट से जुड़ा है। आरोप है कि प्रदर्शन में शामिल नाबालिग छात्रा के पिता के साथ मारपीट हुई थी। बाद में सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो में स्वतंत्र भारद्वाज ने कथित तौर पर इस घटना को लेकर दावा किया, जिसके बाद मामला राजनीतिक और कानूनी विवाद में बदल गया। दिल्ली पुलिस ने हालांकि पहले इस घटना को लेकर सोशल मीडिया पर किए गए कुछ दावों पर सफाई देते हुए कहा था कि पीड़ित के सिर की चोट को लेकर किए गए गंभीर दावे मेडिकल रिपोर्ट से पुष्ट नहीं होते। पुलिस ने दो संदिग्धों से पूछताछ किए जाने की भी जानकारी दी थी।

स्वतंत्र भारद्वाज न्यायिक हिरासत में

इस मामले में स्वतंत्र भारद्वाज को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से गिरफ्तार किया गया था। दिल्ली की अदालत ने पहले उसे एक दिन की पुलिस हिरासत में भेजा और बाद में 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। मामले में बाद में SC/ST एक्ट की धाराएं भी जोड़ी गईं। इसके अलावा नाबालिग प्रदर्शनकारी की शिकायत पर कथित रेप धमकियों को लेकर POCSO एक्ट और आपराधिक धमकी से संबंधित अलग FIR भी दर्ज की गई। स्वतंत्र भारद्वाज ने अपने ऊपर लगे आरोपों के बीच कथित हमले को आत्मरक्षा से जोड़ते हुए सफाई दी थी। वहीं, उसके खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर CJP समर्थकों ने संसद मार्ग पुलिस स्टेशन के बाहर प्रदर्शन भी किया था।
स्वतंत्र भारद्वाज ने अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था। हाईकोर्ट ने 7 सितंबर को उनकी हेबियस कॉर्पस याचिका खारिज कर दी। अदालत के सामने यह भी बताया गया कि FIR में SC/ST एक्ट और अन्य धाराएं जोड़ी गई हैं तथा नाबालिग की शिकायत पर POCSO के तहत भी मामला दर्ज हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से मामला और गंभीर

सुप्रीम कोर्ट की गुरुवार की सुनवाई इस पूरे विवाद में महत्वपूर्ण मोड़ मानी जा रही है। अदालत ने फिलहाल आरोपों की सत्यता पर अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है, लेकिन नाबालिग की सुरक्षा, FIR पर कार्रवाई और कथित हमलावरों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई को लेकर राज्यों से रिपोर्ट मांगकर साफ कर दिया है कि किसी बच्चे को धमकाने या आपराधिक प्रक्रिया से पीछे हटने के लिए मजबूर करने के आरोपों को हल्के में नहीं लिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि नाबालिग को कोई नुकसान पहुंचता है तो बाद में उसकी भरपाई संभव नहीं होगी। इसलिए अदालत ने सुरक्षा और FIR पर कार्रवाई को तत्काल प्राथमिकता देने को कहा है।