सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17ए की संवैधानिक वैधता पर विभाजित फैसला सुनाया है। यह धारा लोक सेवकों के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले सक्षम अथॉरिटी से पूर्व अनुमति अनिवार्य करती है, खासकर जब कोई निर्णय या सिफारिश आधिकारिक कर्तव्यों के निभाने में ली गई हो। मामला सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन बनाम भारत संघ (रिट याचिका संख्या 1373/2018) है, जिसमें 2018 के संशोधन द्वारा जोड़ी गई इस धारा को चुनौती दी गई थी। यह याचिका जनहित में दायर की गई थी।

मामला सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन बनाम भारत संघ (रिट याचिका संख्या 1373/2018) है, जिसमें 2018 के संशोधन द्वारा जोड़ी गई इस धारा को चुनौती दी गई थी। यह याचिका जनहित में दायर की गई थी।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की दो सदस्यीय पीठ ने फैसला सुनाया। दोनों न्यायाधीशों के विचार अलग-अलग रहे, जिसके कारण एकमत नहीं बन सका।

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जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने धारा 17ए को असंवैधानिक घोषित किया और इसे रद्द करने की बात कही। उन्होंने कहा कि यह धारा भ्रष्टाचार को संरक्षण देने का प्रयास है और विनीत नारायण बनाम भारत संघ तथा डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी बनाम सीबीआई जैसे पूर्व फैसलों में रद्द की गई व्यवस्थाओं को पुनर्जीवित करती है। उन्होंने कहा, "धारा 17ए असंवैधानिक है और इसे रद्द किया जाना चाहिए। पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है। यह प्रावधान पहले रद्द किए गए प्रावधानों को पुनर्जीवित करने का प्रयास है। यह अधिनियम के उद्देश्य के विपरीत है, क्योंकि यह जांच को रोकता है और भ्रष्टों की रक्षा करता है, न कि ईमानदारों की।"

दूसरी ओर, जस्टिस के.वी. विश्वनाथन ने धारा 17ए को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया, लेकिन इस हिस्से को 'पढ़ कर सुनाने' की शर्त लगाई। उन्होंने कहा कि पूर्व अनुमति का निर्णय लोकपाल या राज्य लोकायुक्त जैसी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा लिया जाना चाहिए, न कि कार्यपालिका द्वारा, ताकि निष्पक्षता बनी रहे। उन्होंने चेतावनी दी कि धारा को पूरी तरह रद्द करने से 'नीति पक्षाघात' (policy paralysis) हो सकता है और शिकायतों में असमानता आ सकती है। उन्होंने लिखा है: "धारा 17ए संवैधानिक रूप से वैध है, बशर्ते कि अनुमति का निर्णय लोकपाल या राज्य लोकायुक्त द्वारा लिया जाए। अनुमति के दुरुपयोग की संभावना इसे रद्द करने का आधार नहीं हो सकता है।"

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि यह प्रावधान कार्यपालिका को जांच पर अपने नियंत्रण का अधिकार देता है, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करेगा। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसका बचाव करते हुए कहा कि यह ईमानदार लोक सेवकों को फर्जी शिकायतों से बचाने के लिए है।

चूंकि बेंच इस पर बंटी रही, इसलिए धारा 17ए को पूरी तरह रद्द नहीं किया गया। लेकिन जस्टिस विश्वनाथन की राय के अनुसार इसे लोकपाल/लोकायुक्त के माध्यम से लागू करने की व्याख्या की गई। मामला अब आगे की सुनवाई के लिए बड़ी बेंच को भेजा जा सकता है।

बहरहाल, यह फैसला भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों में जांच की स्वतंत्रता और लोक सेवकों की सुरक्षा के बीच संतुलन पर महत्वपूर्ण बहस को आगे बढ़ाएगा।