जंतर-मंतर पर दिल्ली पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों की फेशियल रिकग्निशन और बायोमेट्रिक निगरानी क्या सरकार का नकारात्मक हस्तक्षेप है और क्या इससे निजता का उल्लंघन होता है? इसको लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी किया है।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी और बायोमेट्रिक निगरानी के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। अदालत जांच करेगी कि विरोध प्रदर्शन के दौरान इस तरह की निगरानी क्या लोगों के अधिकार में सरकारी ग़लत हस्तक्षेप है और क्या इससे लोगों के निजता के अधिकार का उल्लंघन होता है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि सरकार को यह साफ़ करना होगा कि निगरानी किस क़ानूनी प्रावधान के तहत की जा रही है।
अदालत ने इस सवाल पर विचार करने का फ़ैसला किया है कि क्या सार्वजनिक जगह पर विरोध-प्रदर्शन कर रहे लोगों की पहचान तकनीक के ज़रिए करना सरकार की ओर से निजता के अधिकार में हस्तक्षेप है। मंगलवार को सुनवाई करने वाली चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची भी शामिल थे। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने मांग की कि सरकार यह बताए कि प्रदर्शनकारियों पर किस तरह की निगरानी की जा रही है और इसके लिए कौन-सा कानूनी प्रावधान लागू है। उन्होंने निगरानी के दौरान जुटाए गए डेटा की सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि इस मामले में यह देखना ज़रूरी है कि सुरक्षा के लिए लगाए गए कैमरों और अत्याधुनिक मशीनों के ज़रिए लोगों की पहचान करने के बीच क्या अंतर है।
'क्या सार्वजनिक जगह पर निजता का अधिकार नहीं है?'
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन स्थलों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं ताकि कोई अप्रिय घटना न हो। मेहता ने सवाल किया कि यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक जगह पर प्रदर्शन कर रहा है तो वहां कैमरा होने से उसके निजता के अधिकार का उल्लंघन कैसे हो सकता है?उन्होंने कहा कि इसी तर्क के आधार पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए लगाए गए सीसीटीवी कैमरों को भी हटाने की मांग की जा सकती है। मेहता ने यह भी कहा कि प्रदर्शनकारी कोई कैदी नहीं हैं और सार्वजनिक जगह पर उनकी गतिविधियां रिकॉर्ड होना अपने आप में निजता का उल्लंघन नहीं माना जा सकता है। हालांकि, जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सरकार के इस तर्क को बेहद सामान्य बताते हुए कहा कि इस मामले में तकनीक के इस्तेमाल के प्रभाव को भी समझना होगा।
'मानव एजेंसी, मशीन से पहचान में अंतर'
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि सरकार को सुरक्षा के उद्देश्य से सीसीटीवी कैमरे लगाने का अधिकार है, लेकिन किसी व्यक्ति की पहचान करने के लिए इंसान और मशीन के इस्तेमाल में अंतर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब डेटा को समझने और उसका विश्लेषण करने वाला इंसान होता है तो स्थिति अलग होती है। लेकिन यदि इंसान की जगह एक अत्यधिक शक्तिशाली मशीन ले लेती है, जो लाखों नागरिकों के चेहरे पहचान सकती है, तो यह जांचना जरूरी हो जाता है कि क्या इससे निजता का उल्लंघन होता है।जस्टिस बागची ने कहा कि फेशियल रिकग्निशन तकनीक के जरिए एक व्यक्ति की पहचान करने के बाद उस डेटा का किस तरह इस्तेमाल किया जाता है, यह भी महत्वपूर्ण सवाल है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि केवल निगरानी की मौजूदगी ही नहीं, बल्कि निगरानी से हासिल डेटा के इस्तेमाल के तरीके की भी जाँच होनी चाहिए।
सरकार बताए, निगरानी किस कानून के तहत
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने बायोमेट्रिक पहचान से जुड़े कानून का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पहचान के लिए आंखों की पुतली यानी आइरिस स्कैन का इस्तेमाल करने की अनुमति देने वाले कानूनी प्रावधान पर अदालत का ध्यान जाना चाहिए। उन्होंने 1920 के आइडेंटिफिकेशन ऑफ प्रिजनर्स एक्ट में संशोधन का जिक्र किया।जस्टिस बागची ने कहा कि इस कानून के तहत राज्य को अपराध का पता लगाने के लिए आइरिस पहचान का इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई है। उन्होंने केंद्र सरकार से इस कानूनी बदलाव पर अदालत को जानकारी देने को कहा। इस पर तुषार मेहता ने कहा कि निजता के अधिकार में वैध सरकारी हित के आधार पर अपवाद हो सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार को अदालत के सामने यह साबित करना होगा कि निगरानी का इस्तेमाल वैध सरकारी हित के लिए किया जा रहा है।
'उचित निजता की अपेक्षा' क्या होगी?
सुनवाई में निजता के अधिकार की एक अहम अवधारणा उचित निजता की अपेक्षा पर भी चर्चा हुई। तुषार मेहता ने कहा कि जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक जगह पर मौजूद होता है तो उसे निजता की कितनी अपेक्षा हो सकती है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक स्थान पर लोग खुद भी वीडियो रिकॉर्ड करते हैं और सोशल मीडिया पर लाइव प्रसारण करते हैं।मेहता ने सवाल किया कि जब सैकड़ों सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर सार्वजनिक जगहों पर रिकॉर्डिंग कर रहे हैं तो सरकार के सीसीटीवी कैमरों पर आपत्ति क्यों की जा रही है? लेकिन जस्टिस बागची ने कहा कि सार्वजनिक जगह पर मौजूद होने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति की पहचान और उसके डेटा के इस्तेमाल पर कोई सीमा नहीं होनी चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि पहले सरकार ने प्रदर्शनकारियों को कथित तौर पर कठोर अपराधी बताया था। ऐसे में यह देखना होगा कि किसी दिन की निगरानी से प्राप्त फुटेज और कानून के तहत तैयार किए गए राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के डेटा को मिलाकर पहचान करने की प्रक्रिया क्या राज्य का नकारात्मक हस्तक्षेप बनती है।
'पुलिस करती है भौतिक सत्यापन'
तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि फेशियल रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल के बाद भी किसी व्यक्ति की पहचान 100 प्रतिशत निश्चित नहीं होती। उन्होंने कहा कि यदि राष्ट्रीय डेटाबेस के आधार पर किसी व्यक्ति की पहचान होती है, तो केवल उसी आधार पर उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाती। इसके बाद पुलिस उस व्यक्ति का भौतिक सत्यापन करती है।मेहता के मुताबिक, पुलिस यह जांचती है कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में वहां मौजूद था या नहीं और उसकी लोकेशन क्या थी। कार्रवाई से पहले तथ्यों की पुष्टि की जाती है। दिल्ली पुलिस ने पहले भी फेशियल रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल को लेकर कहा था कि सिस्टम में किसी व्यक्ति का चेहरा मैच होने के बाद उसकी भौतिक जांच की जाएगी, ताकि गलत पहचान के आधार पर कार्रवाई न हो। हालाँकि, याचिकाकर्ताओं ने निगरानी के कानूनी आधार और डेटा की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए हैं।
संसद, सुप्रीम कोर्ट तक मार्च पर सरकार की आपत्ति
सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने कहा कि प्रदर्शन के लिए 20 जुलाई को एक दिन की अनुमति दी गई थी। अनुमति लेने वाले व्यक्ति ने इसके लिए लिखित आश्वासन भी दिया था, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने 17 दिनों तक स्थल पर कब्जा बनाए रखा।
मेहता ने यह भी कहा कि अनुमति के बिना प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च किया।उन्होंने कहा कि संसद भारत की संप्रभुता का प्रतीक है और बिना अनुमति संसद या सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। याचिकाकर्ताओं के वकील ने इस घटनाक्रम का सरकार की ओर से दिया गया विवरण अधूरा बताया। उन्होंने कहा कि इसमें लद्दाख के कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को भूख हड़ताल के दौरान प्रदर्शन स्थल से जबरन हिरासत में लिए जाने और पैलेट गन के इस्तेमाल का जिक्र नहीं किया गया।
प्रदर्शन से हजारों करोड़ का नुकसान- व्यापारी
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान दिल्ली के व्यापारियों की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी भी पेश हुए। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन के कारण दिल्ली के कारोबार को भारी नुकसान हुआ है। रोहतगी ने कहा कि दिल्ली के कई व्यापारिक संगठनों की ओर से वह अदालत में पेश हुए हैं। उन्होंने रामलीला मैदान के आसपास स्थित थोक बाजारों का जिक्र करते हुए कहा कि त्योहारों के मौसम में कारोबार प्रभावित हुआ है। इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि प्रदर्शन के अधिकार और कारोबार तथा रोजी-रोटी के अधिकार के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।निजता, प्रदर्शन पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट के सामने इस मामले में कई महत्वपूर्ण सवाल हैं। क्या सार्वजनिक जगह पर प्रदर्शन कर रहे लोगों की फेशियल रिकग्निशन तकनीक से पहचान करना निजता के अधिकार में हस्तक्षेप है? क्या सरकार को निगरानी के लिए स्पष्ट कानूनी आधार बताना होगा? जुटाए गए डेटा की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी? और प्रदर्शन के अधिकार तथा व्यापारियों की आजीविका के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा?
अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर निगरानी के कानूनी आधार पर जवाब मांगा है। साथ ही, प्रदर्शन स्थल और कारोबार से जुड़े विवाद में सभी पक्षों को सुनने की जरूरत बताई है। सुनवाई से यह साफ़ है कि सुप्रीम कोर्ट केवल सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाने के सवाल तक सीमित नहीं है, बल्कि अत्याधुनिक तकनीक के जरिए नागरिकों की पहचान, डेटा के इस्तेमाल और संवैधानिक अधिकारों पर उसके प्रभाव की भी पड़ताल करना चाहता है।