सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून को चुनौती देने वाली डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। मीडिया संगठनों का कहना है कि कानून के प्रावधान खोजी पत्रकारिता को बाधित कर सकते हैं, सूचना पाने के मौलिक अधिकार को प्रभावित कर सकते हैं और पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर होने का खतरा पैदा कर सकते हैं। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी।
द इंडियन एक्सप्रेस की 27 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, मंगलवार को भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची तथा जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने DNPA की याचिका पर सुनवाई की। एसोसिएशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने पक्ष रखा। अदालत ने केंद्र सरकार से याचिका पर जवाब मांगा है। अदालत ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए 17 नवंबर की तारीख दी है। फिलहाल नोटिस जारी होने का अर्थ यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। कानून की वैधता और उसके प्रावधानों पर अंतिम निर्णय होना बाकी है।

क्या है DNPA की आपत्ति?

डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन ने अपनी याचिका में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट और उससे जुड़े नियमों को चुनौती दी है। एसोसिएशन का तर्क है कि इन प्रावधानों से संविधान के तहत मिले सूचना के अधिकार तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।मीडिया संगठनों की चिंता है कि व्यक्तिगत डिजिटल डेटा की सुरक्षा के लिए बनाए गए नियम यदि पत्रकारिता पर भी उसी तरह लागू होते हैं, तो भ्रष्टाचार, कॉरपोरेट अनियमितताओं, चुनावी गड़बड़ियों और सरकारी कामकाज की जांच करना मुश्किल हो सकता है।
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DNPA की मुख्य आपत्तियां इस प्रकार हैं:

  • - खोजी पत्रकारिता पर असर: किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ जांच करते समय पत्रकारों को कानूनी बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।
  • - सूचना देने वालों की पहचान का खतरा: भ्रष्टाचार या अन्य अनियमितताओं की जानकारी देने वाले गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर होने की आशंका है।
  • - खबरें हटाने का दबाव: व्यक्तिगत डेटा मिटाने के अधिकार का इस्तेमाल प्रकाशित समाचारों को हटवाने या उनमें बदलाव कराने की मांग के लिए किया जा सकता है।
  • - प्रेस की स्वतंत्रता पर असर: पत्रकारों और समाचार संस्थानों के लिए स्पष्ट कानूनी छूट न होने से जनहित में रिपोर्टिंग करने पर अनिश्चितता और अनुपालन का दबाव बढ़ सकता है।

पत्रकारों को जांच के लिए संबंधित व्यक्ति की सहमति लेनी पड़ेगी?

यह इस विवाद का सबसे अहम पहलू है। DNPA की दलील है कि कानून के नोटिस और सहमति से जुड़े प्रावधानों को पत्रकारिता पर लागू करने से ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है, जिसमें किसी व्यक्ति के बारे में उसकी निजी जानकारी जुटाने या उसकी गतिविधियों की जांच करने से पहले पत्रकारों को उसे सूचना देनी पड़े या उसकी सहमति लेनी पड़े।

मसलन, यदि कोई पत्रकार किसी कंपनी में भ्रष्टाचार की जांच कर रहा है या किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के कथित गलत कामों की पड़ताल कर रहा है, तो जांच के विषय को पहले ही इसकी जानकारी मिलना सबूतों को नष्ट करने या गवाहों पर दबाव डालने का अवसर दे सकता है। यह DNPA की आशंका है; कानून का हर प्रावधान हर पत्रकारिता संबंधी जांच में अनिवार्य रूप से पूर्व सहमति की मांग करता है, ऐसा निष्कर्ष अभी नहीं निकाला जा सकता।

क्या खबरें हटवाने के लिए डेटा मिटाने के अधिकार का इस्तेमाल हो सकता है?

कानून के तहत व्यक्तियों को निर्धारित शर्तों के अधीन अपने निजी डेटा को मिटाने सहित कुछ अधिकार दिए गए हैं। DNPA को आशंका है कि इन अधिकारों का इस्तेमाल प्रकाशित रिपोर्टों में मौजूद व्यक्तिगत जानकारी को हटाने या खबरें वापस लेने की मांग के लिए किया जा सकता है। मीडिया संगठनों का कहना है कि यदि किसी रिपोर्ट में जनहित से जुड़ी तथ्यात्मक जानकारी मौजूद है, तो केवल संबंधित व्यक्ति की आपत्ति या डेटा मिटाने की मांग के कारण उसे हटाने का दबाव पत्रकारिता के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकता है। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है: कानून के तहत डेटा मिटाने का अधिकार अपने आप में हर समाचार को हटवाने का असीमित अधिकार नहीं है। विवाद इस बात पर है कि पत्रकारिता और जनहित की रिपोर्टिंग को पर्याप्त स्पष्ट सुरक्षा मिलती है या नहीं।

सरकारी एजेंसियों को जानकारी मांगने की पावर पर भी सवाल

DNPA की एक अन्य बड़ी चिंता सरकार को व्यक्तिगत डेटा संभालने वाले संगठनों से जानकारी मांगने के लिए दिए गए अधिकारों को लेकर है। एसोसिएशन का तर्क है कि इन शक्तियों का इस्तेमाल समाचार संस्थानों से ऐसी सामग्री मांगने के लिए किया जा सकता है, जिससे पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान सामने आ जाए। इससे उन लोगों पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है जो भ्रष्टाचार, कॉरपोरेट गड़बड़ियों या चुनावी अनियमितताओं के बारे में पत्रकारों को जानकारी देते हैं। यदि उन्हें अपनी पहचान उजागर होने का डर रहेगा, तो वे महत्वपूर्ण जानकारियां साझा करने से बच सकते हैं। DNPA ने यह भी सवाल उठाया है कि कानून में सरकार को कुछ परिस्थितियों में मिलने वाली छूट के मुकाबले प्रेस को वैसी स्पष्ट सुरक्षा क्यों नहीं दी गई है।

21 समाचार संगठनों की चिंता

इस कानूनी चुनौती के पीछे डिजिटल समाचार प्रकाशकों का एक व्यापक समूह है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, DNPA के माध्यम से 21 समाचार प्रकाशकों ने कानून के प्रावधानों को चुनौती दी है। इस समूह में अलग-अलग मीडिया कंपनियों से जुड़े समाचार मंच शामिल हैं, जिनमें Network18, NDTV, द इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स इंटरनेट का नाम भी आया है। मीडिया समूहों की आपत्ति का मूल सवाल यह है कि व्यक्तिगत निजता की रक्षा और स्वतंत्र पत्रकारिता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। उनका कहना है कि निजता की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन ऐसे नियमों से पत्रकारों की जनहित में जानकारी जुटाने और प्रकाशित करने की क्षमता प्रभावित नहीं होनी चाहिए।

सरकार ने प्रेस की स्वतंत्रता की सुरक्षा का भरोसा दिया था

रिपोर्टों के मुताबिक, मीडिया कंपनियों के प्रतिनिधियों और सरकार के बीच अगस्त में हुई बैठक में प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा को लेकर आश्वासन दिया गया था। लेकिन DNPA का कहना है कि पत्रकारों के लिए कानून में स्पष्ट लिखित छूट नहीं होने से उसकी चिंताएं दूर नहीं हुई हैं। एसोसिएशन ने इस मुद्दे को केवल तकनीकी या डेटा प्रबंधन से जुड़ा विवाद नहीं माना है। उसके मुताबिक, कानून के कुछ प्रावधानों का असर यह हो सकता है कि समाचार संस्थान जनहित से जुड़े मामलों की जांच और रिपोर्टिंग करते समय कानूनी कार्रवाई या आर्थिक दंड के जोखिम से बचने के लिए जरूरी खबरें प्रकाशित करने से पीछे हटें।

कानून कब लागू होगा?

डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 का उद्देश्य डिजिटल माध्यमों में व्यक्तियों के निजी डेटा की सुरक्षा और उसके इस्तेमाल के लिए नियम तय करना है। इसके कार्यान्वयन की प्रक्रिया चरणबद्ध है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, डेटा प्रोसेसिंग में नोटिस, सहमति और डेटा मिटाने के अधिकार से जुड़े कई प्रमुख प्रावधान 13 मई 2027 से लागू होने के लिए निर्धारित हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट में चल रहा मामला महत्वपूर्ण है। अदालत के सामने यह सवाल है कि निजता की रक्षा के लिए बनाए गए कानूनी ढांचे में पत्रकारिता, खोजी रिपोर्टिंग और गोपनीय स्रोतों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त प्रावधान हैं या नहीं।