यूएपीए में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत के मामले पर अब बड़ी बेंच फैसला करेगी। इस मामले में शुक्रवार को दिन में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने ज़ोर देकर कहा था कि इस मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेजा जाए।

और इस बीच अब सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को आतंकवाद और यूएपीए यानी गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत मामलों में जमानत देने के नियमों पर अहम फ़ैसला सुना दिया। कोर्ट ने दिल्ली दंगे मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न देने वाले अपने पुराने फैसले पर सवाल उठाते हुए मामले को बड़ी बेंच के पास भेज दिया है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने यह आदेश दिया। इसके साथ ही, इस मामले में शामिल दो अन्य आरोपियों- तसलीम अहमद और खालिद सैफी को 6 महीने की अंतरिम जमानत भी दे दी।

दिल्ली दंगे मामले में हैं ये आरोपी

दिल्ली में फरवरी 2020 में CAA विरोधी प्रदर्शनों के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। इन दंगों में 50 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी। पुलिस ने कई लोगों पर आरोप लगाया कि उन्होंने दंगों की साज़िश रची थी। उमर खालिद, शरजील इमाम, तसलीम अहमद और खालिद सैफी समेत कई लोग यूएपीए के तहत गिरफ्तार किए गए थे।
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क्या हुआ आज की सुनवाई में?

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कोर्ट से कहा कि यूएपीए मामलों में जमानत के नियमों पर दोबारा विचार होना चाहिए। उन्होंने हाल के एक फ़ैसले पर सवाल उठाया। इससे पहले न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने नार्को-टेरर मामले में स्येद इफ्तिखार अंदरबी को जमानत देते हुए कहा था कि यूएपीए मामलों में भी 'जमानत नियम है, जेल अपवाद'। उन्होंने उमर खालिद वाले पुराने फ़ैसले पर संदेह जताया था।

एसजी राजू ने कहा कि यूएपीए जैसे गंभीर मामलों में सभी आरोपियों को एक जैसी छूट नहीं दी जा सकती है। हर मामले को अलग-अलग देखना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि के ए नजीब वाले पुराने फैसले में दिए गए सिद्धांतों को लेकर अब भ्रम है। खासकर यूएपीए की धारा 43D(5) यानी जमानत के सख्त नियम और अनुच्छेद 21 यानी जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, यह तय करना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया कि एक बेंच दूसरे बराबर की बेंच के फ़ैसले को आसानी से नहीं बदल सकती। क़ानून में स्पष्टता होनी चाहिए, इसलिए यह मुद्दा मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा जा रहा है ताकि बड़ी बेंच बने और अंतिम फैसला दे।

अंतरिम जमानत किसे मिली?

तसलीम अहमद और खालिद सैफी को 6 महीने के लिए अंतरिम जमानत मिल गई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले इनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। बता दें कि उमर खालिद और शरजील इमाम को अभी जमानत नहीं मिली है। उनका मामला अब बड़ी बेंच तय करेगी।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच 2020 दिल्ली दंगे के दो आरोपियों- तसलीम अहमद और खालिद सैफी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
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ऐसे तो कसाब को भी बेल मिल जाती...: केंद्र

इससे पहले शुक्रवार को दिन में सुनवाई के दौरान आतंकवाद और UAPA मामलों में जमानत को लेकर मतभेद के बीच केंद्र सरकार ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि इस मुद्दे को बड़ी बेंच को भेज दिया जाए, क्योंकि अलग-अलग दो-जज की बेंचों के फैसले एक-दूसरे से उलट हैं। केंद्र सरकार ने सवाल उठाया कि क्या 'बेल नियम है, जेल अपवाद है' वाला सिद्धांत आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों में भी लागू होगा, अगर ट्रायल में देरी हो रही हो? सरकार ने 26/11 मुंबई हमले के दोषी अजमल कसाब और लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद का उदाहरण दिया।

केंद्र सरकार का तर्क

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू और वकील रजत नायर ने कोर्ट में कहा, 'अगर अजमल कसाब 7-8 साल जेल में रहने के बाद बेल मांगता, तो क्या उसे बेल दे देते? सैकड़ों गवाह हैं, सबूत इकट्ठा करने में समय लगता है। इसी तरह अगर हाफिज सईद पाकिस्तान से आकर ट्रायल में 5 साल जेल में रह जाए, तो क्या सिर्फ देरी के आधार पर उसे बेल दे देंगे?' सरकार का कहना है कि हर केस के तथ्यों को देखकर बेल देनी चाहिए, न कि सिर्फ जेल में कितना समय बीता है, इस आधार पर।
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क्यों हुआ मतभेद?

पिछले कुछ महीनों में सुप्रीम कोर्ट की दो-दो जजों वाली बेंचों ने UAPA मामलों में अलग-अलग राय दी है। 18 मई 2026 को जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने कहा कि 'बेल नियम है, जेल अपवाद है'। यह संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 से आता है। उन्होंने कहा कि UAPA जैसे सख्त कानून में भी लंबे समय तक बिना ट्रायल के जेल में नहीं रखा जा सकता।

इससे पहले गुरविंदर सिंह मामले और गुलफिशा फातिमा मामले में दूसरी बेंचों ने कहा था कि अगर आरोप सही लगते हैं तो जेल ही नियम है, बेल अपवाद। केंद्र सरकार का कहना है कि 18 मई वाला फैसला बहुत ढीला है। इसमें अपराध की गंभीरता और आरोपी की भूमिका को नजरअंदाज किया जा रहा है।

क्यों है यह फ़ैसला अहम?

बहरहाल, यूएपीए एक बहुत सख़्त क़ानून है। इसमें जमानत मिलना बहुत मुश्किल होता है। सुप्रीम कोर्ट अब यह तय करेगा कि लंबे समय तक ट्रायल न होने पर जमानत मिलनी चाहिए या नहीं? UAPA में भी 'जमानत नियम, जेल अपवाद' का सिद्धांत लागू होगा या नहीं?

यह फ़ैसला आने वाले समय में आतंकवाद और यूएपीए से जुड़े सभी जमानत मामलों पर असर डालेगा। सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए जमानत क़ानून को और साफ़ करने के लिए बड़े फ़ैसले की तैयारी कर ली है। दो आरोपियों को राहत मिल गई, लेकिन उमर खालिद समेत बड़े सवाल अब बड़ी बेंच के सामने हैं।