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सेंट्रल विस्टा- क्या आम लोगों से पूछेंगे कि उपराष्ट्रपति आवास कहाँ हो: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल विस्टा प्रोटेक्ट के तहत एक भूखंड के भूमि उपयोग में बदलाव को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। उस भूखंड पर भारत के उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के नए आधिकारिक आवास बनाए जाने हैं। इसी को लेकर एक याचिका में दावा किया गया था कि सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट एक 'सार्वजनिक मनोरंजन' के क्षेत्र को प्रभावित करेगा। लेकिन इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर चीज की आलोचना की जा सकती है लेकिन रचनात्मक आलोचना होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला याचिकाकर्ता का नहीं है कि ऐसा करने के अधिकार के बिना परियोजना शुरू की जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यह नीतिगत मामला है और याचिकाकर्ताओं ने कोई दुर्भावना वाली मंशा की शिकायत नहीं की है, इसलिए कोर्ट इस पर विचार करने को तैयार नहीं है।

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इस साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल विस्टा परियोजना को मंजूरी दी थी। यह राष्ट्रपति भवन से दिल्ली के बीच में इंडिया गेट तक 3 किमी के दायरे में है। 

सितंबर 2019 में घोषित सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट में 900 से 1,200 सांसदों की बैठने की क्षमता वाले एक नए त्रिकोणीय संसद भवन की परिकल्पना की गई है। इसका निर्माण अगस्त 2022 तक किये जाने का लक्ष्य रखा गया है जब देश अपना 75वां स्वतंत्रता दिवस मनाएगा।

मौजूदा समय में इस परियोजना का काम जारी है, लेकिन इस परियोजना के ख़िलाफ़ आवाज़ भी उठाई जा रही है और अदालत में चुनौती भी दी जा रही है। सुप्रीम कोर्ट में आज एक ऐसी ही याचिका पर सुनवाई हुई। एक भूखंड पर निर्माण कार्य से 'सार्वजनिक मनोरंजन' के क्षेत्र के प्रभावित होने की दलील पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच में शामिल न्यायमूर्ति एएम खानविलकर ने कहा, 

यह कोई निजी संपत्ति नहीं बनाई जा रही है। उपराष्ट्रपति का आवास बनाया जा रहा है। चारों ओर हरियाली होना तय है। योजना को अधिकारियों द्वारा पहले ही मंजूरी दे दी गई है।


जस्टिस खानविलकर, सुप्रीम कोर्ट

उन्होंने पूछा, 'क्या अब हम आम आदमी से पूछना शुरू करेंगे कि उपराष्ट्रपति का आवास कहाँ होगा?'

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शीर्ष अदालत ने याचिका के जवाब में कहा कि विकास योजना में बदलाव करना संबंधित अधिकारियों का विशेषाधिकार है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह 'एक नीतिगत मामला है।'

बता दें कि इस परियोजना के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी और इस पर रोक लगान को कहा गया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी महीने में इसे मंजूरी दे दी। जस्टिस एएम खानविलकर, दिनेश माहेश्वरी और संजीव खन्ना की बेंच ने कहा था कि हालांकि केंद्र सरकार को निर्माण कार्य शुरू होने से पहले हैरिटेज कंजर्वेशन कमेटी की इजाजत लेनी होगी। अदालत ने यह भी कहा था कि पर्यावरण समिति की सिफ़ारिशें सही और वैध हैं। 

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सरकार ने अदालत में इस प्रोजेक्ट के पक्ष में दलील देते हुए कहा था कि वर्तमान संसद भवन में जगह की बेहद कमी है, आग लगने या भूकंप से बचने के लिए भी ज़रूरी इंतजाम नहीं हैं। इसके अलावा केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों के एक जगह होने का तर्क भी सरकार ने दिया था जिससे सरकार के काम करने की क्षमता बढ़ सके। 

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