सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को vande mataram पर कहा, यह देखना जरूरी है कि राष्ट्रीय गीत के सम्मान और व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता के बीच कानून किस तरह संतुलन स्थापित करे। अदालत ने केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से इस पहलू पर जवाब मांगा।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 22 सितंबर 2026 को केंद्र सरकार से कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि धार्मिक वजहों से ‘वंदे मातरम’ नहीं गाने वाले व्यक्ति को किसी आपराधिक परिणाम का सामना न करना पड़ेगा। अदालत ने कहा कि वह इस मामले में संवैधानिक सवालों की जांच कर रही है और खास तौर पर यह देखना जरूरी है कि राष्ट्रीय गीत के सम्मान और व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता के बीच कानून किस तरह संतुलन स्थापित करता है।
यह मामला उस कानूनी बदलाव से जुड़ा है जिसके तहत ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ के समान कानूनी संरक्षण देने का प्रावधान किया गया है। संसद द्वारा पारित संशोधन के बाद राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर रोकना या उसके गायन में व्यवधान पैदा करना दंडनीय बनाया गया है।
धार्मिक आधार पर नहीं गाने का सवाल
चीफ जस्टिस जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने राष्ट्रीय गीत से जुड़े नए कानूनी प्रावधान और केंद्र सरकार की ओर से जारी निर्देशों को चुनौती दी है। याचिका में विशेष रूप से यह सवाल उठाया गया है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी धार्मिक मान्यता या अंतरात्मा के कारण ‘वंदे मातरम’ नहीं गाता, तो क्या उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है।सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से इस पहलू पर जवाब मांगा। अदालत की टिप्पणी का मूल आशय था कि धार्मिक कारणों से गीत न गाने वाले व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक परिणाम नहीं होना चाहिए।
मामला सिर्फ गीत गाने का नहीं, संवैधानिक अधिकारों का भी
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 25 के तहत अंतरात्मा तथा धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा है। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय गान से जुड़े मामले में Bijoe Emmanuel v. State of Kerala फैसले में कहा था कि किसी व्यक्ति को राष्ट्रीय गान का सम्मान करने के लिए मजबूरन उसे गाना जरूरी नहीं है। उस मामले में धार्मिक विश्वासों के कारण राष्ट्रीय गान नहीं गाने वाले छात्रों को अदालत ने संवैधानिक संरक्षण दिया था।इसी न्यायिक पृष्ठभूमि के कारण ‘वंदे मातरम’ को लेकर यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि राष्ट्रीय गीत के प्रति सम्मान और उसे अनिवार्य रूप से गाने के बीच कानूनी सीमा क्या होगी।
मार्च में भी सुप्रीम कोर्ट ने दिया था महत्वपूर्ण स्पष्टीकरणः इससे पहले मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘वंदे मातरम’ से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था कि केंद्र का संबंधित निर्देश सलाहकारी (advisory) है और उसमें गीत नहीं गाने पर कोई दंड निर्धारित नहीं किया गया था। 25 मार्च 2026 को अदालत ने उस याचिका को समय से पहले दायर बताया था। कोर्ट ने कहा था कि यदि किसी व्यक्ति को गीत गाने के लिए बाध्य किया जाता है या उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई होती है, तब वह अदालत का रुख कर सकता है। लेकिन इसके बाद संसद में कानून में बदलाव किया गया, जिसके कारण अब मामला केवल प्रशासनिक निर्देश तक सीमित नहीं रहा है।
नए कानून से बदली कानूनी स्थिति
Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Act, 2026 के जरिए ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गान के साथ संबंधित कानून के दायरे में लाया गया है। कानून के तहत किसी सभा में राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर रोकना या उसमें व्यवधान पैदा करना आपराधिक अपराध बनाया गया है। संशोधन के बाद इसके लिए जेल और अन्य दंड का प्रावधान लागू हो सकता है। यही बदलाव अब सुप्रीम कोर्ट के सामने संवैधानिक सवाल खड़ा कर रहा है—क्या राष्ट्रीय गीत का कानूनी संरक्षण इतना व्यापक हो सकता है कि धार्मिक या अंतरात्मा के आधार पर उसे न गाने वाले व्यक्ति पर भी आपराधिक कार्रवाई का खतरा पैदा हो?सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल की टिप्पणी पर विवाद
सुनवाई के दौरान एक अलग विवाद भी सामने आया। वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की उस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई जिसमें उन्होंने कानून बनाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए जाने के संदर्भ में ‘नक्सलियों’ का उल्लेख किया था। मुरलीधर ने कहा कि ऐसी भाषा किसी कानून अधिकारी को शोभा नहीं देती और उन्होंने टिप्पणी वापस लेने की मांग की। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने इस विवाद को अनावश्यक तनाव और भावनात्मक बहस से बचने की सलाह दी। बाद में उन्होंने कहा कि अदालत फिलहाल केवल संवैधानिक और कानूनी सवालों पर ध्यान केंद्रित कर रही है।मुरलीधर ने अपनी आपत्ति दोहराते हुए कहा कि वह इस टिप्पणी के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराना चाहते हैं। सॉलिसिटर जनरल ने टिप्पणी वापस लेने या माफी मांगने से इनकार किया। जस्टिस बागची ने इस दौरान संवैधानिक अदालतों की भूमिका पर भी टिप्पणी की और कहा कि संवैधानिक अधिकार सभी के लिए कानून के अनुसार सुरक्षित रहते हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल
इस सुनवाई से जुड़े प्रमुख संवैधानिक प्रश्न इस प्रकार हैं:
- क्या ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गान के समान कानूनी संरक्षण मिलने के बावजूद इसे गाना हर नागरिक के लिए अनिवार्य किया जा सकता है?
- धार्मिक विश्वास के कारण गीत न गाने वाले व्यक्ति को क्या आपराधिक कार्रवाई से सुरक्षा मिलेगी?
- राष्ट्रीय गीत के सम्मान और उसे गाने की बाध्यता में कानूनी अंतर क्या है?
- नए कानून के तहत ‘वंदे मातरम्’ के गायन में बाधा डालने और व्यक्तिगत रूप से इसे न गाने के बीच किस तरह अंतर किया जाएगा?
- धार्मिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के बीच संवैधानिक संतुलन कैसे बनाया जाए?
सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मार्च में जिस स्थिति में ‘वंदे मातरम्’ से जुड़े निर्देश में कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं था, अब कानून में संशोधन के बाद आपराधिक दायित्व का सवाल सीधे सामने आ गया है। अदालत ने फिलहाल मामले को संवैधानिक प्रश्नों तक सीमित रखते हुए केंद्र से जवाब मांगा है। अगली सुनवाई में यह और स्पष्ट हो सकता है कि धार्मिक कारणों से राष्ट्रीय गीत नहीं गाने वाले व्यक्ति पर नए कानून के तहत आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है या नहीं।