सुप्रीम कोर्ट में दायर ममता बनर्जी की याचिका में ECI के 17 सितंबर के उस फ़ैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें पार्टी के विरोधी गुटों के बीच विवाद के कारण ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के नाम और उसके 'फूल और घास' चुनाव निशान को फ्रीज़ कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव निशान विवाद पर चुनाव आयोग से जल्द फ़ैसला लेने को कहा है। इसके साथ ही इसने टाइम लाइन तय करने को कह दिया। ममता बनर्जी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा कि दोनों गुटों के बीच पार्टी के नाम और चुनाव निशान पर चल रहे विवाद का अंतिम फ़ैसला लेने में उसे कितना समय लगेगा। सुनवाई के दौरान ऋतब्रत बनर्जी के वकील मुकुल रोहतगी ने जब यह दलील दी कि शिवसेना जैसे मामले में चुनाव आयोग ने पहले भी ऐसे अंतरिम आदेश दिए हैं तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘शिवसेना मामले में देरी का अंजाम देख चुके हैं’।
सुनवाई के दौरान चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने आयोग से एक ऐसा समय तय करने को कहा जिसमें दोनों पक्षों को अपनी बात रखने और सबूत देने का सही अवसर मिले, लेकिन मामला अनिश्चित समय तक लंबित भी न रहे। पीठ में सीजेआई सूर्यकांत के अलावा जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन शामिल थे।
सुनवाई के दौरान तृणमूल कांग्रेस के ऋतब्रत बनर्जी वाले विरोधी गुट की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि चुनाव आयोग ऐसे अंतरिम आदेश पहले भी दे चुका है और इसके लिए शिवसेना जैसे मामलों का उदाहरण मौजूद है। इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि अदालत देख चुकी है कि शिवसेना मामले में देरी का क्या अंजाम हुआ।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी इस बात के संदर्भ में आई है कि राजनीतिक दल के नाम और चुनाव निशान का विवाद अगर लंबे समय तक चलता रहे तो चुनावी प्रक्रिया पर उसका असर पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट हाल के दिनों में शिवसेना के नाम और चुनाव निशान से जुड़े विवाद की सुनवाई भी कर रहा है।
शिवसेना मामले में ECI ने क्या किया था?
चुनाव आयोग ने जून 2022 के शिवसेना विभाजन के बाद नाम और धनुष-बाण निशान को अक्टूबर 2022 में अंतरिम रूप से फ्रीज किया और फरवरी 2023 में अंतिम फैसला शिंदे गुट के पक्ष में सुनाया। नतीजा यह हुआ कि एकनाथ शिंदे गुट को आधिकारिक शिवसेना नाम और धनुष-बाण निशान मिल गया जबकि उद्धव ठाकरे गुट को शिवसेना यूबीटी और 'जलती मशाल' निशान मिला। मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। हाल ही में इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कड़े सवाल पूछे थे। अदालत ने पूछा था कि अगर चुनाव आयोग के सामने यह तय करने के लिए मौजूद पैरामीटर पूरी तरह साफ़ नहीं थे कि दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों में से असली शिवसेना कौन है तो आयोग ने दोनों गुटों को अलग-अलग चुनाव निशान देकर अपने दम पर चुनाव लड़ने का विकल्प क्यों नहीं दिया?सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल विवाद में अभी यह तय नहीं किया है कि मूल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल और घास’ निशान किस गुट को मिलेगा।
ECI से पूछा- कितना समय चाहिए?
सुनवाई के दौरान ईसीआई की ओर से पेश वरिष्ठ वकील दामा शेषाद्री नायडू से सीजेआई सूर्यकांत ने पूछा कि आयोग अंतिम रूप से विवाद का फ़ैसला करने में कितना समय लेगा। सीजेआई ने कहा कि पक्षों को निष्पक्ष अवसर मिलना चाहिए, उन्हें अपने सबूत पेश करने का समय मिलना चाहिए और आयोग को भी मामले पर अपना दिमाग लगाने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। लेकिन यह प्रक्रिया बहुत लंबी नहीं होनी चाहिए। अदालत ने आयोग से एक ‘व्यावहारिक’ समयसीमा बताने को कहा है।
ईसीआई की ओर से दलील दी गई कि मामले को 10 या 20 दिन जैसे बहुत कम समय में तय करना संभव नहीं हो सकता, क्योंकि विवाद में तथ्य और दस्तावेजों से जुड़े कई मुद्दे हैं। आयोग ने कहा कि सही समय दिया जाना चाहिए।ममता बनर्जी की याचिका में क्या चुनौती दी गई है?
ममता बनर्जी ने 18 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर ईसीआई के 17 सितंबर के अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी। चुनाव आयोग ने अपने आदेश में दोनों विरोधी गुटों के मूल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल और घास’ चुनाव निशान के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी।
आयोग के सामने एक तरफ़ ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट था और दूसरी तरफ रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट। दोनों ही खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बता रहे हैं। ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने सुनवाई के दौरान ईसीआई की कार्रवाई के समय पर सवाल उठाया। कपिल सिब्बल ने कहा कि आयोग के सामने यह विवाद जुलाई में पहुँच गया था और काफ़ी समय तक मामला लंबित रहा। लेकिन उपचुनाव की प्रक्रिया शुरू होने के बाद आयोग ने अंतरिम आदेश जारी किया। सिब्बल का तर्क था कि अगर आयोग पहले फ़ैसला करता तो उनकी ओर से अदालत में प्रभावी क़ानूनी उपाय अपनाया जा सकता था।
‘उपचुनाव के बीच ECI ऐसा आदेश कैसे दे सकता है?’
कपिल सिब्बल ने अदालत के सामने सवाल उठाया कि जब उपचुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, तब चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम और निशान फ्रीज करने का फैसला क्यों किया। उन्होंने कहा कि आयोग ने ऐसा समय चुना जब चुनावी प्रक्रिया चल रही थी और इस स्थिति में अदालत से तत्काल राहत लेना मुश्किल हो गया।
सिब्बल ने यह भी कहा कि ममता बनर्जी का गुट अभी मूल चुनाव निशान और नाम को बहाल करने के लिए अंतरिम राहत मांगने के बजाय आयोग को अक्टूबर में ही मूल विवाद पर फ़ैसला करने का निर्देश देने की मांग कर रहा है। उन्होंने स्थानीय निकाय चुनावों का भी जिक्र किया और कहा कि राज्य में जल्द ही स्थानीय निकाय चुनाव होने वाले हैं, इसलिए विवाद का जल्दी समाधान जरूरी है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि पश्चिम बंगाल उपचुनाव का कार्यक्रम पहले ही जारी हो चुका है। उन्होंने संकेत दिया कि घोषित चुनाव प्रक्रिया के बीच ECI की ओर से बनाई गई अंतरिम व्यवस्था में अदालत का हस्तक्षेप आसान नहीं होगा। ऋतब्रत बनर्जी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि अक्टूबर तक फ़ैसला करने की समयसीमा बहुत कम होगी। उनका कहना था कि आयोग को मामले में ‘थोड़ा और समय’ मिलना चाहिए।
दोनों गुटों को अलग नाम और चुनाव निशान
ईसीआई के अंतरिम आदेश के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम दिया गया है और ‘फुटबॉल प्लेयर’ चुनाव निशान आवंटित किया गया है। वहीं ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव निशान दिया गया है। यह व्यवस्था आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा उपचुनावों के लिए लागू है। नंदीग्राम और रेजीनगर में 6 अक्टूबर को उपचुनाव होना है।
अब 28 सितंबर को क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश को रद्द नहीं किया है और न ही किसी गुट को मूल ‘फूल और घास’ चुनाव निशान वापस दिया है। अदालत ने आयोग से सिर्फ यह बताने को कहा है कि वह दोनों पक्षों को सही अवसर देने के बाद मूल विवाद का फैसला कितने समय में कर सकता है।
28 सितंबर को होने वाली अगली सुनवाई में ECI की ओर से समयसीमा बताई जा सकती है। इसके बाद अदालत यह देख सकती है कि प्रस्तावित समयसीमा उचित है या इसमें बदलाव की ज़रूरत है।