जेल में बंद एक्टिविस्ट उमर खालिद का मामला अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर रहा है। फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े आरोपों में सितंबर 2020 से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद खालिद पर गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज है। पांच साल बीतने के बावजूद उनका मुकदमा शुरू नहीं हो सका है, जिसकी वजह से मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय नेताओं से तीखी आलोचना हो रही है। हाल ही में, न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने खालिद को पत्र लिखकर अपनी चिंता जताई, जबकि अमेरिका के आठ सांसदों ने भारत सरकार से उमर की ज़मानत और निष्पक्ष मुकदमे की मांग की है। यह मामला भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बढ़ते खतरे का प्रतीक बन गया है।

उमर खालिद पर 8 डेमोक्रेट सांसदों ने पत्र लिखा

2025 के अंत में इस मामले ने अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचा। न्यूयॉर्क के मेयर मेंबर जोहरान ममदानी ने खालिद को पत्र लिखकर कहा, "हम आपके बारे में सोच रहे हैं," और उनकी लंबी हिरासत पर चिंता जताई। इसके बाद, 30 दिसंबर 2025 को अमेरिका के आठ डेमोक्रेट सांसदों, जिम मैकगवर्न, जैमी रास्किन, प्रमिला जयपाल, जान शाकोवस्की, लॉयड डॉगेट, रशीदा तालिब, क्रिस वैन होलेन और पीटर वेल्चने भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा को पत्र लिखा। 
पत्र में खालिद पर बिना मुकदमा चलाए पांच साल से जेल में रखने की आलोचना की गई और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार बेल तथा निष्पक्ष, समयबद्ध मुकदमे की मांग की गई। सांसदों ने कहा कि यूएपीए का इस्तेमाल मानवाधिकारों का उल्लंघन कर सकता है और भारत-अमेरिका संबंधों को लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित रखने की अपील की। उन्होंने अन्य सह-अभियुक्तों के लिए भी समान न्याय की मांग की।
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8 डेमोक्रेट सांसदों ने लिखा- वे समझते हैं कि ये मामले वर्तमान में भारत के सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं और खालिद को अपनी बहन की शादी में शामिल होने के लिए अस्थायी जमानत मिलने की खबर का उन्होंने स्वागत किया। उन्होंने आग्रह किया कि अदालत की कार्यवाही पूरी होने तक खालिद को जमानत दी जाए और रिहा किया जाए। सांसदों ने कहा, “भारत के लोकतांत्रिक संस्थानों और अमेरिका के एक प्रमुख सहयोगी के रूप में इसकी भूमिका का सम्मान करते हुए, हम आपकी सरकार से अनुरोध करते हैं कि वह यह सुनिश्चित करने के लिए उठाए जा रहे कदमों को साझा करे कि खालिद और उसके सह-आरोपियों, जो अभी भी हिरासत में हैं, के खिलाफ न्यायिक कार्यवाही अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो।”
इसके अलावा, एमनेस्टी इंटरनेशनल ने सितंबर 2025 में खालिद की तत्काल रिहाई की मांग की, इसे "न्याय की पटरी से उतरना" बताया। दिसंबर 2025 में खालिद के माता-पिता ने अमेरिकी राजनेताओं से मुलाकात की, जिसके बाद यह पत्र आया। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों ने भारत सरकार पर दबाव बढ़ाया है। 

राहुल गांधी पर निशाना साधा

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इस पत्र को कांग्रेस नेता राहुल गांधी से जोड़कर "भारत-विरोधी साजिश" बताया। बीजेपी नेता प्रदीप भंडारी ने कहा कि सांसद जान शाकोवस्की ने 2024 में राहुल गांधी से मुलाकात की थी, और अब वे यूएपीए जैसे कानूनों को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।
उमर खालिद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व छात्र हैं और सामाजिक न्याय, अल्पसंख्यक अधिकारों तथा नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं। फरवरी 2020 में दिल्ली दंगों के बाद उन्हें साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। उनके साथ शरजील इमाम, मीरान हैदर और खालिद सैफी जैसे अन्य कार्यकर्ताओं पर भी मुकदमा है। दिल्ली पुलिस का दावा है कि ये लोग दंगों को भड़काने में शामिल थे, लेकिन बचाव पक्ष का कहना है कि यह राजनीतिक प्रतिशोध है और सबूत कमजोर हैं। दिसंबर 2025 में खालिद को अपनी बहन की शादी में शामिल होने के लिए अस्थायी जमानत मिली, लेकिन स्थायी बेल अभी तक नहीं दी गई है। उनकी बेल याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, जहां 31 अक्टूबर 2025 से सुनवाई शुरू हुई थी, लेकिन अब तक कोई फैसला नहीं आया।

खालिद का मुकदमा पांच साल से अधिक समय से ट्रायल स्टेज पर अटका हुआ है, जो न्यायिक प्रक्रिया की सुस्ती और यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के दुरुपयोग की ओर इशारा करता है। मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि बिना मुकदमा चलाए जेल में रखना, ज़मानत न मिलना अंतरराष्ट्रीय मानकों जैसे समानता, उचित प्रक्रिया का उल्लंघन है। एमनेस्टी और अन्य संगठनों ने इसे "राजनीतिक उत्पीड़न" करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बावजूद, ट्रायल कोर्ट में प्रक्रिया धीमी है, और बेल याचिकाओं को बार-बार खारिज किया गया है। यह देरी न केवल खालिद के अधिकारों का हनन है, बल्कि भारत की न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाती है, जहां यूएपीए के तहत बेल मिलना दुर्लभ है। अंतरराष्ट्रीय दबाव इसी देरी को लक्ष्य कर रहा है, और 2025 में जारी रिपोर्ट्स में इसे "न्याय की विफलता" बताया गया है।

भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बढ़ते खतरे

उमर खालिद का मामला भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर छाए संकट का एक उदाहरण है। फ्री स्पीच कलेक्टिव की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, देश में 14,875 अभिव्यक्ति उल्लंघनों के मामले दर्ज हुए, जिसमें 8 पत्रकारों और 1 सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की हत्या शामिल है। रिपोर्ट में 117 गिरफ्तारियां, 40 हमले (जिनमें 33 पत्रकारों पर) और हजारों सोशल मीडिया ब्लॉकेज का जिक्र है। भारत की प्रेस फ्रीडम रैंकिंग लगातार गिर रही है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) के अनुसार, यह "दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र में प्रेस फ्रीडम का संकट" है। सरकार द्वारा वेबसाइट ब्लॉकिंग, सोशल मीडिया सेंसरशिप और यूएपीए जैसे कानूनों का इस्तेमाल विपक्षी आवाजों को दबाने के लिए हो रहा है।

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ह्यूमन राइट्स वॉच की वर्ल्ड रिपोर्ट 2025 में कहा गया है कि शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति पर मनमाने प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं। इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स ऑर्डर 2025 जैसे नए नियमों से विदेशी आवाजों को भी दबाने की आशंका है। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि भारत में असहमति को अपराध की तरह देखा जा रहा है, जो लोकतंत्र के लिए खतरा है।