अमेरिका ने भारत को चीन और वेनेजुएला जैसे पाँच देशों के साथ प्रायोरिटी वॉच लिस्ट में डाल दिया है। तो क्या भारत पेटेंट, ट्रेडमार्क और कॉपीराइट नियमों को तोड़ रहा है? या अमेरिका प्रायोरिटी वॉच लिस्ट के ज़रिये भारत पर दबाव बनाना चाहता है? वजह चाहे जो भी हो, इस सूची में डालने से भारत और भारतीय कंपनियों को नुक़सान तो होगा ही! तो क्या इसका असर भारत अमेरिका संबंधों पर भी पड़ेगा?
 
इन सवालों के जवाब बाद में पहले यह जान लीजिए कि आख़िर यह सूची क्या है और इसके मायने क्या हैं। अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि यानी USTR ने 30 अप्रैल को अपनी सालाना स्पेशल 301 रिपोर्ट 2026 जारी की। इसमें भारत को फिर से प्रायोरिटी वॉच लिस्ट (Priority Watch List) में रखा गया है। इस लिस्ट में कुल छह देश हैं- चिली, चीन, भारत, इंडोनेशिया, रूस और वेनेजुएला।

USTR रिपोर्ट में साफ़ लिखा है, 'भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जहां इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी यानी बौद्धिक संपदा की सुरक्षा और इसे लागू करने में अभी भी बहुत बड़ी चुनौतियां हैं।'
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प्रायोरिटी वॉच लिस्ट क्या होती है?

अमेरिका हर साल अपने व्यापारिक साझेदार देशों में पेटेंट, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क और ट्रेड सीक्रेट जैसी बौद्धिक संपदा अधिकारों यानी IPR की समीक्षा करता है। प्रायोरिटी वॉच लिस्ट उन देशों के लिए होती है जहां अमेरिका को लगता है कि आईपीआर की सुरक्षा कमजोर है और अमेरिकी कंपनियों को नुक़सान हो रहा है। इससे ज्यादा गंभीर श्रेणी प्रायोरिटी फॉरेन कंट्री यानी PFC है, जिसमें इस बार वियतनाम को रखा गया है।

यह लिस्ट कोई कानूनी सजा या तुरंत टैरिफ नहीं लगाती। लेकिन इससे अमेरिका इन देशों पर ज़्यादा नज़र रखता है और द्विपक्षीय दबाव बढ़ाता है।

भारत को लिस्ट में क्यों डाला गया?

अमेरिका मानता है कि भारत ने पिछले साल पेटेंट नियमों में तेजी लाकर, नए आईपी कोर्ट बना कर और कुछ पाइरेसी साइटों पर कार्रवाई कर कुछ सुधार किए हैं। लेकिन कई पुरानी समस्याएँ अभी भी बाक़ी हैं। अमेरिका की मुख्य आपत्तियां हैं-
  • पेटेंट मंजूरी में लंबी देरी।
  • सख्त और अस्पष्ट नियमों के कारण कई पेटेंट रिजेक्ट हो जाते हैं।
  • पेटेंट रद्द होने का खतरा बना रहता है।
  • भारतीय पेटेंट कानून की धारा 3(d) जैसी व्यवस्थाएं अमेरिकी फार्मा कंपनियों को परेशान करती हैं।
  • लागू करने का मैकेनिज़्म कमजोर है।
  • ऑनलाइन पाइरेसी बहुत ज्यादा– फिल्में, गाने, सॉफ्टवेयर, वीडियो गेम्स चोरी से इस्तेमाल होते हैं।
  • नकली दवाइयां और सामान बाजार में आसानी से मिलते हैं।
  • पुलिस और अदालतों में आईपीआर मामलों की सुनवाई में देरी।
  • सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कमी।
  • दवाएं, टेक्नोलॉजी, मेडिकल डिवाइस जैसे आईपी से जुड़े उत्पादों पर ज़्यादा आयात शुल्क।
  • ट्रेड सीक्रेट और टेस्ट डेटा की सुरक्षा कमजोर है।
  • ट्रेडमार्क और कॉपीराइट के मामलों में अदालती प्रक्रिया धीमी है।

अमेरिका का कहना है कि ये समस्याएँ अमेरिकी कंपनियों के इनोवेशन और व्यापार को नुक़सान पहुँचाती हैं। तो क्या इसी को लेकर भारत को इस सूची में डाला गया है?

क्या भारत नियम तोड़ रहा है?

हालाँकि, अमेरिका इनसे जुड़े नियमों को लेकर चिंतित है, लेकिन भारत कोई अंतरराष्ट्रीय क़ानून नहीं तोड़ रहा है। भारत का आईपीआर कानून WTO के समझौते के अनुरूप है। भारत का तर्क है कि वह सस्ती दवाओं की उपलब्धता और सार्वजनिक स्वास्थ्य को भी ध्यान में रखता है। फिर भी अमेरिका फार्मा, आईटी और एंटरटेनमेंट से जुड़ी अपनी कंपनियों के फायदे को देखते हुए यह रिपोर्ट बनाता है। भारत कई बार कह चुका है कि उसने पाइरेसी रोकने, आईपी कोर्ट बनाने और जागरूकता बढ़ाने में प्रगति की है।

भारत-अमेरिका व्यापार पर क्या असर पड़ेगा?

दोनों देशों के बीच व्यापार वर्तमान में करीब 190 बिलियन डॉलर का है। यह लिस्ट सीधे व्यापार पर बड़ा असर नहीं डालती, लेकिन अमेरिकी कंपनियां निवेश या टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करते समय सतर्क हो सकती हैं। USTR ने कहा है कि वह कई एजेंसियों के माध्यम से भारत के साथ बातचीत जारी रखेगा। और अगर समस्याएं सुलझीं तो भारत को लिस्ट से हटाया जा सकता है।
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कई और अहम बदलाव भी

वियतनाम को सबसे सख्त श्रेणी Priority Foreign Country में रखा गया। इससे 30 दिनों में सेक्शन 301 जांच शुरू हो सकती है, जिसके बाद टैरिफ जैसी कार्रवाई संभव है। अर्जेंटीना और मैक्सिको को प्रायोरिटी वॉच लिस्ट से हटाकर सामान्य वॉच लिस्ट में डाला गया। यूरोपीय संघ को वॉच लिस्ट में जोड़ा गया। कुल 19 देश अब सामान्य वॉच लिस्ट में हैं, जिनमें पाकिस्तान, तुर्की और ब्राजील शामिल हैं।

भारत के लिए आगे क्या?

भारत सरकार को पेटेंट मंजूरी की प्रक्रिया तेज करने, पाइरेसी पर सख्त कार्रवाई करने और एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय बनाने की कोशिश कर सकता है। हालाँकि, भारतीय उद्योग का कहना है कि भारत का आईपीआर सिस्टम पहले से मजबूत हुआ है और लिस्ट में रहना अब सही नहीं है।
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अमेरिका ने भारत को चीन और वेनेजुएला जैसे देशों के साथ प्रायोरिटी वॉच लिस्ट में रखा है क्योंकि उसे लगता है कि आईपीआर सुरक्षा अभी पूरी तरह प्रभावी नहीं है। हालांकि दोनों देश बातचीत के रास्ते खुले रखे हैं। आने वाले महीनों में इस मुद्दे पर भारत और अमेरिका के बीच और चर्चा होने की संभावना है।