पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की वैधता पर सवाल उठाए हैं। SIR में बड़े पैमाने पर वोटरों के नाम काटने, मुस्लिम मतदाताओं और चुनाव आयोग की भूमिका पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) एसवाई कुरैशी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की वैधता पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि उनकी राय में यह चुनाव कानूनी रूप से वैध नहीं था। उन्होंने इसके पीछे चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटे जाने को प्रमुख वजह बताया। कुरैशी ने कहा कि कई विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाताओं के 70 से 80 फीसदी तक नाम हटाए जाने की खबरें सामने आई हैं। ऐसे क्षेत्रों की विशेष जांच होनी चाहिए।
हालांकि, कुरैशी ने यह नहीं कहा कि पूरे पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे रद्द कर दिए जाने चाहिए। उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट को उन विधानसभा क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए, जहां मतदाता सूची से गलत तरीके से नाम हटाए जाने की आशंका है। अदालत को इस मामले में उचित फैसला लेना चाहिए।
कुरैशी ने गुरुवार, 5 नवंबर को कोलकाता में आयोजित हाशिम अब्दुल हलीम मेमोरियल लेक्चर में ये बातें कहीं। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल चुनाव की कानूनी वैधता का सवाल अब सुप्रीम कोर्ट के सामने है और उन्हें उम्मीद है कि अदालत इस पर उचित निर्णय लेगी।
49 विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाताओं के 70-80 फीसदी नाम काटे गये
कुरैशी ने पश्चिम बंगाल में SIR की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि कुछ विधानसभा क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने की खबरें चिंताजनक हैं। उन्होंने खास तौर पर उन 49 विधानसभा क्षेत्रों का जिक्र किया, जहां कथित तौर पर 70 से 80 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं के नाम काटे जाने की बात सामने आई है। उन्होंने कहा कि यह जांच का विषय है कि क्या इन लोगों को वास्तव में मतदाता सूची से हटाने का कोई वैध आधार था या उन्हें बांग्लादेशी बताकर सूची से बाहर कर दिया गया।कुरैशी ने कहा कि हो सकता है कि पूरा चुनाव प्रभावित न हुआ हो, लेकिन कम से कम उन क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिए जहां बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने पर संदेह है। उनके मुताबिक, लोकतंत्र में चुनाव की वैधता केवल मतदान कराने और नतीजे घोषित करने से तय नहीं होती। यह भी जरूरी है कि सभी पात्र नागरिकों को मतदान का समान अधिकार मिले।
SIR को बताया NRC का फ्रंट डोर संस्करण
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने SIR की तुलना असम में हुई राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) प्रक्रिया से की। उन्होंने कहा कि पहले उनसे पूछा जाता था कि क्या SIR पिछले दरवाजे से NRC लागू करने की कोशिश है। उनका जवाब था कि SIR तो NRC को सामने के दरवाजे से लागू करने जैसा है। उन्होंने असम NRC का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में कई वर्षों तक कानूनी प्रक्रिया चली और 2019 में अंतिम सूची से लगभग 19 लाख लोगों को बाहर रखा गया।इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान बहुत कम समय में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के आरोप सामने आए। कुरैशी ने सवाल उठाया कि आखिर 2002 की मतदाता सूची से संबंध स्थापित करना क्यों जरूरी बनाया गया? उन्होंने अपना उदाहरण देते हुए कहा कि उनके माता-पिता की 2002 से पहले ही मृत्यु हो चुकी थी और उन्होंने खुद भी उस साल मतदान नहीं किया था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह भारतीय नागरिक नहीं हैं। वह कई चुनावों में मतदान कर चुके हैं। उनका सवाल था कि किसी व्यक्ति की नागरिकता और मतदाता होने की पात्रता को 2002 की मतदाता सूची से जोड़ने का क्या औचित्य है?
फॉर्म-6 के जरिए नाम जुड़वाने पर भी उठाए सवाल
कुरैशी ने चुनाव आयोग की उस व्यवस्था की भी आलोचना की, जिसके तहत SIR में नाम कटने वाले लोगों को दोबारा मतदाता सूची में शामिल होने के लिए फॉर्म-6 भरने को कहा गया। उन्होंने कहा कि फॉर्म-6 मूल रूप से नए मतदाता के पंजीकरण के लिए होता है। इसमें आवेदक को घोषणा करनी पड़ती है कि उसका नाम किसी दूसरी मतदाता सूची में दर्ज नहीं है और वह पहली बार मतदाता के रूप में पंजीकरण करा रहा है। फॉर्म में गलत जानकारी देने पर एक साल तक की सजा का प्रावधान भी है।
कुरैशी ने सवाल किया कि जो व्यक्ति पिछले 10-15 चुनावों में मतदान कर चुका है, वह खुद को पहली बार मतदाता कैसे घोषित कर सकता है? उन्होंने बताया कि उनके कुछ परिचितों ने भी उनसे संपर्क कर कहा था कि मतदाता सूची में नाम वापस जुड़वाने के लिए उनसे फॉर्म-6 भरवाया जा रहा है। कुरैशी ने उन्हें चेतावनी दी कि गलत घोषणा करने पर कानूनी परेशानी हो सकती है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं, उनके लिए नाम बहाल करने की अलग, तेज और प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। पुराने मतदाताओं को नए मतदाता के रूप में आवेदन करने के लिए मजबूर करना उचित नहीं है।
गरीब और प्रवासी मजदूरों के लिए इंसाफ पाना भी मुश्किल
कुरैशी ने कहा कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उन्हें न्यायाधिकरणों (ट्रिब्यूनल) में जाकर अपनी पात्रता साबित करने के लिए कहना व्यावहारिक समाधान नहीं है। उन्होंने गुरुग्राम में अपने आसपास रहने वाले पश्चिम बंगाल के प्रवासी मजदूरों का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि कई मजदूरों के सामने अपने मतदान के अधिकार को बचाने के लिए पश्चिम बंगाल लौटने की मजबूरी आ गई।कुरैशी के अनुसार, कुछ लोगों को अपने दस्तावेजों में सुधार के लिए 24 घंटे का समय दिया गया, जबकि उनकी मासिक कमाई इतनी भी नहीं थी कि वे हवाई जहाज का टिकट खरीद सकें। उन्होंने कहा कि 25 से 27 लाख हटाए गए मतदाताओं की अपीलों का निपटारा करने में मौजूदा व्यवस्था के तहत लगभग 21 साल लग सकते हैं। यदि न्यायाधिकरणों की संख्या 19 से बढ़ाकर 40 भी कर दी जाए, तब भी इस प्रक्रिया में करीब 14 साल लगेंगे। ऐसे में सवाल यह है कि जिन लोगों का मतदान का अधिकार एक चुनाव में छिन गया, उन्हें न्याय मिलने तक कितने चुनाव गुजर जाएंगे?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर भी जताई नाराजगी
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने SIR मामले में न्यायपालिका की भूमिका और कुछ न्यायिक टिप्पणियों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने जस्टिस जॉयमाल्य बागची की उस टिप्पणी पर आपत्ति जताई, जिसमें कहा गया था कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से बाहर रह गए हैं, वे अगले चुनाव में मतदान कर सकते हैं। कुरैशी ने मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की पश्चिम बंगाल की दो विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव को लेकर की गई टिप्पणी का भी उल्लेख किया।उन्होंने कहा कि उपचुनाव को मामूली घटना नहीं माना जा सकता। मुख्यमंत्री तक उपचुनाव हारने पर अपनी कुर्सी गंवा सकता है। इसलिए किसी नागरिक के मतदान के अधिकार को अगले चुनाव तक टाल देना गंभीर मामला है। उन्होंने कहा कि इस तरह की टिप्पणी गैर-जिम्मेदाराना है। कुरैशी ने यह सवाल भी उठाया कि मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच के लिए न्यायिक अधिकारियों को क्यों लगाया जा रहा है? उनके अनुसार, अदालत का काम कार्यपालिका से उसका काम करवाना है, न कि खुद प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालना। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कल यातायात व्यवस्था खराब हो जाए तो क्या सेशन जज को सड़क पर जाकर ट्रैफिक संभालने के लिए कहा जाएगा?
वोटर लिस्ट से नाम कटने का असर सिर्फ मतदान तक सीमित नहीं
कुरैशी ने चेतावनी दी कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का असर केवल मतदान के अधिकार पर नहीं पड़ सकता, बल्कि इससे नागरिकों के दूसरे अधिकार भी प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने द टेलीग्राफ के एक पूर्व संपादक का उदाहरण दिया, जिनका नाम मतदाता सूची से हटाए जाने के बाद पासपोर्ट नवीनीकरण की प्रक्रिया में परेशानी आने की बात सामने आई थी।उन्होंने कुछ मुख्यमंत्रियों की उन टिप्पणियों का भी उल्लेख किया, जिनमें मतदाता सूची से बाहर लोगों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित करने की बात कही गई थी। कुरैशी ने चिंता जताई कि अगर मतदाता सूची में नाम होना सरकारी योजनाओं और अन्य नागरिक सुविधाओं का आधार बना दिया गया तो यह परोक्ष रूप से नागरिकता तय करने का माध्यम बन सकता है।
'मुख्य चुनाव आयुक्त ही पूरा चुनाव आयोग नहीं है'
कुरैशी ने चुनाव आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी के बीच मतभेदों पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग 1990 के दशक से तीन सदस्यीय संस्था के रूप में काम कर रहा है। इसके फैसले सर्वसम्मति से होने चाहिए और यदि सर्वसम्मति नहीं बनती है तो बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए। कुरैशी ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'मुख्य चुनाव आयुक्त ही चुनाव आयोग नहीं है।' उन्होंने कहा कि अगर तीन सदस्यीय आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त अल्पमत में है तो उसका फैसला पूरे आयोग का फैसला नहीं माना जा सकता।यह टिप्पणी इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट के संदर्भ में थी, जिसमें बताया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कथित एकतरफा फैसलों पर 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज कराई थी। कुरैशी ने कहा कि पहले उन्हें लगता था कि दोनों चुनाव आयुक्त आयोग के भीतर हो रही घटनाओं पर चुप हैं, लेकिन बाद में पता चला कि वे लिखित रूप में अपनी आपत्तियां दर्ज कर रहे थे। इससे आयोग के भीतर असहमति का रिकॉर्ड तैयार हुआ और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
उन्होंने चार महीने तक चुनाव आयोग की पूर्ण बैठक नहीं होने पर भी सवाल उठाया। उनके मुताबिक, यह स्थिति बताती है कि आयोग में सामूहिक निर्णय लेने की व्यवस्था कमजोर हुई है। उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि ऐसा लग रहा था कि फैसले कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि कंप्यूटर ले रहा था।
2008 के जम्मू-कश्मीर चुनाव का उदाहरण
कुरैशी ने चुनाव आयोग में बहुमत के महत्व को समझाने के लिए 2008 के जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि उस समय एन. गोपालस्वामी मुख्य चुनाव आयुक्त थे, जबकि वह और नवीन चावला अन्य दो चुनाव आयुक्त थे। जम्मू-कश्मीर में अमरनाथ भूमि हस्तांतरण विवाद के बाद तनाव और हिंसा का माहौल था। उस समय चुनाव कराने को लेकर आयोग में मतभेद थे। कुरैशी और नवीन चावला का मानना था कि चुनाव निर्धारित समय पर होने चाहिए, जबकि तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी की राय इससे अलग थी। दोनों आयुक्तों ने बहुमत के आधार पर चुनाव कराने का फैसला किया। कुरैशी के अनुसार, गोपालस्वामी ने बाद में इस फैसले को सर्वसम्मत बताकर उसका नेतृत्व किया। उस चुनाव में 60 फीसदी से अधिक मतदान हुआ था। कुरैशी ने इसे एक महत्वपूर्ण चुनाव बताया। उनका कहना था कि आयोग के भीतर मतभेद होना असामान्य नहीं है, लेकिन फैसले नियमों और बहुमत के आधार पर होने चाहिए।चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया बदलने की मांग
कुरैशी ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि 2023 के कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए गठित चयन समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। उनके अनुसार, इस समिति में सरकार के पास दो सदस्यों का बहुमत होता है। ऐसे में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की उम्मीद करना मुश्किल है। उन्होंने सुझाव दिया कि कम से कम एक उम्मीदवार के नाम पर समिति की सर्वसम्मति अनिवार्य की जानी चाहिए।उन्होंने नेपाल का उदाहरण भी दिया, जहां संवैधानिक परिषद उम्मीदवारों की सूची तैयार करती है और संसदीय समिति के सामने उनके नामों पर सार्वजनिक सुनवाई होती है। कुरैशी ने मतदाता सूची को पारदर्शी बनाने के लिए लगातार पुनरीक्षण, सूची में किए गए हर बदलाव का समय पर सार्वजनिक खुलासा और गलत तरीके से हटाए गए नामों को तुरंत बहाल करने की व्यवस्था बनाने की जरूरत बताई। उन्होंने चुनाव आयोग के पुराने नारे 'एक भी मतदाता पीछे न छूटे' का उल्लेख करते हुए तंज किया कि मौजूदा प्रक्रिया का नतीजा ऐसा लग रहा है जैसे लक्ष्य यह हो गया हो कि एक भी मतदाता सूची में न बचा रहे।
SIR पर सवाल अब चुनाव की वैधता और चुनाव आयोग की विश्वसनीयता तक पहुंचा
एसवाई कुरैशी का बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह केवल एक राजनीतिक नेता या विपक्षी दल के प्रतिनिधि नहीं हैं, बल्कि देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त हैं। उनका सवाल सीधे चुनाव आयोग की संस्थागत निष्पक्षता, मतदाता सूची की विश्वसनीयता और चुनाव की कानूनी वैधता से जुड़ा है। पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान मतदाताओं के नाम हटाए जाने, फॉर्म-6 के इस्तेमाल और चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं।सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर लाखों पात्र मतदाता चुनाव से पहले मतदाता सूची से बाहर हो जाते हैं, तो क्या केवल मतदान करा देना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक शर्त पूरी करने के लिए पर्याप्त है? दूसरा सवाल चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया का है। यदि तीन सदस्यीय आयोग में बहुमत की राय को दरकिनार कर फैसले लिए जाते हैं, तो संस्था की सामूहिक जवाबदेही और निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
तीसरा और सबसे गंभीर सवाल उन मतदाताओं के अधिकारों का है, जिनके नाम कथित तौर पर गलत तरीके से काटे गए। यदि अदालत में अपील का फैसला आने में 14 से 21 साल लगने का अनुमान है, तो उस समय तक कई चुनाव गुजर चुके होंगे। ऐसे में बाद में मिलने वाला न्याय उनके खोए हुए मतदान के अधिकार की भरपाई कैसे करेगा?
अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर हैं। अदालत का फैसला केवल पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची या चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह तय करने में भी महत्वपूर्ण हो सकता है कि चुनाव आयोग SIR जैसी प्रक्रिया में किस सीमा तक अधिकारों का इस्तेमाल कर सकता है और मतदाताओं के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जानी चाहिए।