मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच प्रधानमंत्री मोदी 25 फरवरी को इसराइल यात्रा पर जा रहे हैं। मोदी की इस यात्रा के जोखिम बड़े हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मोदी की इसराइल यात्रा के अच्छे संकेत नहीं जाएंगे। पढ़िए इस विश्लेषण कोः
पीएम मोदी 25 फरवरी को इसराइल की यात्रा पर जाएंगे
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 25 फरवरी को प्रस्तावित इसराइल यात्रा ऐसे समय हो रही है जब पूरा मिडिल-ईस्ट असाधारण तनाव से गुजर रहा है। यह दौरा केवल एक नियमित राजनयिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि ऐसे भू-राजनीतिक माहौल में लिया गया फैसला है जिसके दूरगामी कूटनीतिक संदेश निकल सकते हैं। सवाल यह है कि क्या भारत ने इस यात्रा के समय और उसके संभावित असर पर पर्याप्त संवेदनशीलता दिखाई है? खासकर भारत ने सोमवार 23 फरवरी को ईरान में अपने नागरिकों से कहा है कि वे फौरन ईरान छोड़ दें। यानी ईरान पर किसी भी समय अमेरिकी हमला हो सकता है।
मौजूदा हालात में अमेरिका और ईरान के बीच टकराव की आशंकाएं बनी हुई हैं और इसराइल लगातार तेहरान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाए हुए है। कई मुस्लिम देशों ने क्षेत्र में सैन्य तनाव से बचने की अपील की है। ऐसे समय में भारत के प्रधानमंत्री का तेल अवीव जाना स्वाभाविक रूप से प्रतीकात्मक अर्थ पैदा करता है- चाहे नई दिल्ली की आधिकारिक मंशा कुछ भी क्यों न हो।
भारत लंबे समय से “रणनीतिक संतुलन” की नीति पर चलता रहा है- एक ओर इसराइल के साथ मजबूत रक्षा सहयोग, दूसरी ओर खाड़ी देशों और ईरान के साथ गहरे आर्थिक और ऊर्जा संबंध। लेकिन आलोचकों का तर्क है कि हाल के वर्षों में इस संतुलन की धारणा कमजोर पड़ती दिख रही है। यदि भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी ताकत उसकी कूटनीति रही है, तो उसे प्रतीकों की राजनीति से भी उतनी ही सावधानी बरतनी चाहिए। मोदी की इसराइल यात्रा प्रतीकों की राजनीति का ही हिस्सा है।
ग़ज़ा में जनसंहार ने परिस्थितियां बदली हैं
ग़ज़ा युद्ध के बाद वैश्विक जनमत बंटा हुआ है, लेकिन यह भी सच है कि बड़ी संख्या में देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने वहां मानवीय स्थिति पर गंभीर चिंता जताई है। इसी पृष्ठभूमि में बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार की नीतियां तीखी आलोचना के घेरे में रही हैं। वर्ष 2024 में International Criminal Court (ICC) ने नेतन्याहू के खिलाफ युद्ध अपराधों के मामलों में गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। ग़ज़ा में 70 हज़ार बेगुनाह कत्ल कर दिए गए। इनमें बच्चों और महिलाओं की तादाद ज्यादा है। ग़ज़ा के अस्पतालों पर बेतहाशा बम बरसाए गए, कोई अस्पताल सही सलामत नहीं बचा। दक्षिण अफ्रीका के तमाम देश नेतन्याहू को अपराधी ठहरा रहे हैं। मुस्लिम देशों के विदेश मंत्रियों ने इसराइल के हाल के हमलों की निन्दा की है। यूएन ने भी हाल ही में इसराइल के खिलाफ बयान जारी किया है, जिस पर भारत और 85 अन्य देशों के हस्ताक्षर हैं। एक तरफ भारत यूएन की फिलिस्तीन का समर्थन कर रहा है तो दूसरी तरफ पीएम मोदी इसराइल जाकर नेतन्याहू का हौसला बढ़ाने वाले हैं।
ईरान-अमेरिका युद्ध के माहौल में मोदी का नेतन्याहू से सार्वजनिक रूप से मिलना भारत की उस पारंपरिक छवि के विपरीत माना जा सकता है, जिसमें वह खुद को “ग्लोबल साउथ” की आवाज और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मानकर्ता के रूप में पेश करता रहा है। कूटनीति में केवल नीति नहीं, प्रतीक भी मायने रखते हैं- और यह दौरा प्रतीकात्मक रूप से इसराइल के पक्ष में एकतरफा झुकाव का संकेत दे रहा है। ईरान पर अगर अमेरिकी हमला हुआ तो हालात और भी बदलेंगे, उस समय भारत किस तरफ खड़ा रहेगा, यह भी एक सवाल है। जिसका जवाब भारत मोदी की इसराइल यात्रा से देने जा रहा है।
इसराइल में अंदरुनी उथल-पुथल से क्या मोदी वाकिफ नहीं
नेतन्याहू का बंधकों की जिन्दगी दांव पर लगाकर हमास के साथ लंबे समय तक युद्ध को इसराइल में अच्छा नहीं माना गया। उनकी इस नीति और करप्शन के आरोपों की वजह से नेतन्याहू के खिलाफ आए दिन इसराइल में प्रदर्शन हो रहे हैं। इसराइल के भीतर भी राजनीतिक उथल-पुथल कम नहीं है। न्यायिक सुधारों को लेकर वहां महीनों से तीखा टकराव चल रहा है। इसराइल के विपक्षी नेता Yair Lapid द्वारा मोदी के कार्यक्रमों की संभावित बहिष्कार की चेतावनी इस बात का संकेत है कि मोदी की यात्रा वहां की घरेलू राजनीति के बीच भी फंस सकती है। किसी भी विदेशी नेता के लिए यह असहज स्थिति होती है। विपक्षी नेता लिपिड ने कहा है कि मोदी के कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के अध्यक्ष को बुलाया जाए। क्योंकि नेतन्याहू ने सुप्रीम कोर्ट के अध्यक्ष को मान्यता देने से इंकार कर दिया है। उनकी नियुक्ति के नोटिफिकेशन को नेतन्याहू सरकार ने आज तक जारी नहीं किया है। सुप्रीम कोर्ट के अध्यक्ष नेतन्याहू के करप्शन के खिलाफ हैं। नेतन्याहू जानते हैं कि न्यायपालिका उन्हें अच्छी नज़र से नहीं देख रही है। इसलिए वो अब अल्ट्रा देशभक्त प्रधानमंत्री के रूप में खुद को पेश करने में जुटे हुए हैं। लेकिन इसराइली विपक्षी दलों ने नेतन्याहू को महाकरप्ट बताते हुए उनके नेतृत्व को खारिज कर दिया है।
भारत में मोदी सरकार के समर्थकों का तर्क है कि इसराइल भारत का प्रमुख रक्षा साझेदार है और राष्ट्रीय सुरक्षा हित सर्वोपरि हैं। अगर इस बात को सही मान लिया जाए तो क्या विदेश नीति सिर्फ हथियारों के सौदों से चलेगी। उसकी असली कसौटी यह होती है कि वह भारत की व्यापक रणनीतिक, आर्थिक और नैतिक पूंजी को कितना सुरक्षित रखती है।
भारत के खाड़ी देशों में करोड़ों प्रवासी काम करते हैं। तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा वहीं से आता है। ईरान के साथ चाबहार जैसे प्रोजेक्ट अभी भी रणनीतिक महत्व रखते हैं। ऐसे में किसी भी कदम का आकलन केवल द्विपक्षीय लाभ से नहीं, व्यापक क्षेत्रीय संतुलन से होना चाहिए। इसराइल की वजह से भारत से संबंधों को नए नज़रिए से देखा जाएगा।
साफ शब्दों में कहें तो यह यात्रा भारत-इसराइल रिश्तों को मजबूत जरूर कर सकती है, लेकिन इसके कूटनीतिक “ऑप्टिक्स” जोखिम भरे हैं। अगर नई दिल्ली यह मानती है कि वह एक साथ सभी पक्षों के साथ भरोसेमंद साझेदार बनी रह सकती है, तो उसे अपने कदमों के प्रतीकात्मक अर्थों को भी उतनी ही गंभीरता से तौलना होगा।
विदेश नीति में समय बहुत कुछ तय करता है- और यही वह बिंदु है जहां मोदी की यह यात्रा सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में खड़ी दिखती है।