इंडिया-यूएस ट्रेड डील में ‘कुछ दालों’ को शामिल किए जाने की बात सामने आई है। क्या समझौते के अहम पहलू सार्वजनिक नहीं किए गए?
भारत अमेरिका ट्रेड डील में क्या काफ़ी कुछ छिपाया गया है? भारत के साथ डील पर व्हाइट हाउस ने जो फैक्ट शीट जारी की है इसमें कुछ नई चीजें जुड़ी हैं, जो पहले 6 फरवरी के संयुक्त बयान में नहीं थीं। फैक्ट शीट में 'कुछ दालें' शामिल की गई हैं यानी इन पर से भी टैरिफ़ हटेगा। फैक्ट शीट में 'पशु चारे के लिए' शब्द को भी हटा दिया गया है। इसके अलावा साझा बयान में अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर की खरीद में एग्रीकल्चर शामिल नहीं था, लेकिन फ़ैक्ट शीट में इसे शामिल किया गया है। तो क्या समझौते में जो चीजें भारत के पक्ष में नहीं हैं वे धीरे-धीरे बाहर आ रही हैं? कांग्रेस ने तो इसको लेकर बड़ा हमला किया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने तो कहा है कि 'ट्रैप डील' का सच अब धीरे-धीरे सामने आ रहा है!
फैक्ट शीट में सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली बात है 'कुछ दालों' पर टैरिफ़ ख़त्म या कम करने का ज़िक्र। 6 फ़रवरी के संयुक्त बयान में यह नहीं था। अब फ़ैक्ट शीट में लिखा है कि भारत अमेरिकी औद्योगिक सामानों के अलावा खाद्य और कृषि उत्पादों पर टैरिफ़ कम करेगा। इसमें डीडीजी, रेड सोरघम, ट्री नट्स, फल, कुछ दालें, सोयाबीन ऑयल, वाइन आदि शामिल हैं।
फैक्ट शीट में क्या है नया?
9 फ़रवरी को व्हाइट हाउस ने 'द यूनाइटेड स्टेट्स एंड इंडिया एनाउंस हिस्टोरिक ट्रेड डील' नाम से फैक्ट शीट जारी की। इसमें कहा गया है कि भारत अमेरिकी औद्योगिक सामानों पर सभी टैरिफ़ ख़त्म या कम करेगा। साथ ही, कई अमेरिकी खाद्य और कृषि उत्पादों पर भी टैरिफ में कटौती होगी-
- ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स यानी DDGs,
- रेड सोरघम,
- ट्री नट्स यानी बादाम, अखरोट,
- ताजा और प्रोसेस्ड फल,
- कुछ दालें,
- सोयाबीन ऑयल,
- वाइन और स्पिरिट्स,
- और अन्य उत्पाद।
यह फ़ैक्ट शीट अहम है क्योंकि 'कुछ दालों' का ज़िक्र पहले के संयुक्त बयान में नहीं था और 'पशु चारे के लिए' का ज़िक्र था। 6 फ़रवरी के बयान में लिखा था- 'भारत अमेरिकी औद्योगिक सामानों और विभिन्न अमेरिकी खाद्य और कृषि उत्पादों पर टैरिफ़ ख़त्म या कम करेगा, जिसमें DDGs, पशु चारे के लिए रेड सोरघम, ट्री नट्स, ताजा और प्रोसेस्ड फल, सोयाबीन ऑयल, वाइन और स्पिरिट्स, और अतिरिक्त उत्पाद शामिल हैं।' अब फैक्ट शीट में रेड सोरघम से 'पशु चारे के लिए' का जिक्र हटा दिया गया है, जो सवाल खड़े कर रहा है।
इसके अलावा भारत ने अमेरिकी उत्पादों को खरीदने का वादा किया है, जिसमें ऊर्जा, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी, कृषि, कोयला और अन्य उत्पाद शामिल हैं। कुल मिलाकर, भारत 500 अरब डॉलर से ज्यादा के अमेरिकी उत्पाद खरीदेगा।
भारत अपनी डिजिटल सर्विस टैक्स हटाएगा और डिजिटल व्यापार में बाधाओं को दूर करने के नियम बनाएगा। दोनों देश आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने और निवेश पर नियंत्रण के लिए भी सहमत हुए हैं।
'कुछ दालों' का ज़िक्र क्यों अहम?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक और आयातक देश है। 2024-25 में भारत ने 5.48 अरब डॉलर की दालें आयात कीं, लेकिन अमेरिका से सिर्फ 89.65 मिलियन डॉलर की। 'कुछ दालों' पर टैरिफ़ कटौती से अमेरिकी दालें सस्ती हो सकती हैं, जो भारतीय किसानों के लिए चुनौती बन सकती है। व्यापार मंत्री पीयूष गोयल ने मीडिया से बातचीत में कहा कि लेंटिल्स यानी मसूर दाल जैसी दालें सालों से अमेरिका से आयात होती रही हैं और अब उन पर टैरिफ़ कम होगा। लेकिन विपक्ष इसे किसानों की पीठ में छुरा घोंपने जैसा बता रहा है।कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे की प्रतिक्रिया
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस समझौते की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने एक्स पर लिखा, "भारत के किसानों को बुरी तरह धोखा दिया गया है। भारत के इतिहास में पहली बार एक सरकार ने हमारी कृषि को पूरी तरह विदेशी सामानों के लिए खोल दिया है। अब हम जानते हैं कि इंडो-यूएस संयुक्त बयान में 'अतिरिक्त उत्पाद' का मतलब क्या था! 'दालें' को चुपचाप 9 फरवरी की व्हाइट हाउस फैक्ट शीट में जोड़ा गया है, जो 6 फरवरी 2026 के इंडो-यूएस संयुक्त बयान का हिस्सा नहीं था।"
उन्होंने आगे कहा, "संयुक्त बयान में रेड सोरघम के आयात की उपयोगिता का ज़िक्र 'पशु चारे' के लिए किया गया था, लेकिन अब 9 फरवरी 2026 की व्हाइट हाउस फैक्ट शीट में वह रहस्यमय तरीके से गायब हो गया है। यह हमारे गौ-माता और डेयरी किसानों के साथ विश्वासघात है। समझौते में अमेरिका से DDGs और रेड सोरघम जैसे खाद्य और कृषि उत्पाद आयात करने की बात है, जो ज़्यादातर जीएम यानी जेनेटिकली मॉडिफाइड होते हैं। अगर भारतीय पशु अमेरिकी चारे खाएंगे तो इससे हमारे पशुओं की नस्ल बदल जाएगी और दूध का स्वाद प्रभावित होगा।"
खड़गे ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने 2017 से जीएम चारे को मंजूरी नहीं दी थी, लेकिन अब अचानक मंजूरी दे दी है। उन्होंने कहा कि अख़बारों में अमूल द्वारा पूरे पेज के विज्ञापन छपवाए जा रहे हैं ताकि इस रियायत को छिपाया जा सके, लेकिन सच्चाई यह है कि 2 करोड़ डेयरी किसानों को नुक़सान होगा। उन्होंने आरएसएस, संघ परिवार और बीजेपी पर गौ-हत्या के नाम पर लिंचिंग करने वाले लोगों पर हमला बोलते हुए कहा कि वे देश की पशु आबादी को नष्ट करने पर तुले हैं।
500 अरब डॉलर की खरीद में कृषि शामिल
संयुक्त बयान में भारत ने अमेरिका से 500 अरब डॉलर के सामान खरीदने का वादा किया था, लेकिन उसमें कृषि का ज़िक्र नहीं था। फैक्ट शीट में अब साफ़ लिखा है कि यह खरीद ऊर्जा, आईटी, कृषि, कोयला और अन्य उत्पादों में होगी। यानी कृषि उत्पाद भी शामिल हैं।यह भारत के लिए बड़ा बदलाव है। पहले कृषि को बाहर रखा गया था, लेकिन अब अमेरिकी कृषि उत्पादों की ज्यादा खरीद होगी। इससे अमेरिकी किसानों को फायदा होगा, जबकि भारतीय किसानों पर दबाव बढ़ सकता है।
डील में अमेरिका के फायदे की बात?
फैक्ट शीट पढ़ने से लगता है कि समझौता ज्यादातर अमेरिका के फायदे की बात करता है-
- भारत अमेरिकी सामानों पर टैरिफ कम या खत्म करेगा (औद्योगिक + कृषि)।
- भारत 500 अरब डॉलर से ज्यादा अमेरिकी सामान खरीदेगा, जिसमें कृषि भी शामिल।
- डिजिटल सर्विस टैक्स हटाएगा और डिजिटल व्यापार के नियम बनाएगा।
- अमेरिका ने भारत पर टैरिफ 25% से घटाकर 18% किया, जो अच्छा है, लेकिन बदले में भारत ने बाजार ज्यादा खोला।
भारत को फायदा
टेक्सटाइल, जेम्स के भारतीय निर्यात को अमेरिका में बेहतर पहुँच मिलेगी, लेकिन कृषि और डेयरी सेक्टर में चिंता है। हालाँकि, बांग्लादेश के साथ ताज़ा डील में टेक्सटाइल पर जीरो टैरिफ़ करने से भारत को और ज़्यादा अब नुक़सान होगा। सस्ते आयात से किसान प्रभावित हो सकते हैं। रूस से तेल का मुद्दा भी भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सवाल उठाता है।
किसानों और डेयरी सेक्टर पर असर
यह समझौता भारतीय किसानों के लिए दोधारी तलवार जैसा है। एक तरफ़, यह अमेरिकी बाज़ार में भारतीय उत्पादों के लिए रास्ता खोलेगा, लेकिन दूसरी तरफ़, सस्ते आयात से स्थानीय उत्पाद प्रभावित हो सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि दालों और अन्य कृषि उत्पादों पर टैरिफ़ कटौती से अमेरिकी निर्यातक फ़ायदा उठाएंगे, लेकिन भारतीय किसानों को क़ीमतों में गिरावट का सामना करना पड़ सकता है। डेयरी सेक्टर में जीएम चारे की चिंता भी बड़ी है, क्योंकि इससे दूध की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
धीरे-धीरे डील की पूरी तस्वीर सामने आ रही है। सरकार इसे संतुलित बता रही है, लेकिन विपक्ष आरोप लगा रहा है कि यह अमेरिका को ज़्यादा फ़ायदा पहुँचाने वाली डील लगती है। आने वाले दिनों में और डिटेल्स आएंगी, तब असली फ़ायदा-नुक़सान साफ़ होगा।