अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर की भारतीय सेना की वेस्टर्न कमांड मुख्यालय की यात्रा ने राजनीतिक हलचल मचा दी है। सोमवार को चंडीगढ़ के चंडीमंदिर स्थित मुख्यालय का दौरा करने वाले गोर की इस यात्रा को विपक्ष ने नरेंद्र मोदी सरकार की अमेरिकी हितों को प्राथमिकता देने की नीति का विस्तार बताया है। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया है कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों को अमेरिका के इशारों पर चलाया जा रहा है। वहीं, सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस यात्रा को रेयर लेकिन अप्रत्याशित नहीं बताते हुए भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी के बढ़ते संबंधों का संकेत बताया। गोर इसके बाद अब बेंगलुरु का दौरा करने वाले हैं। जहां वे हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड कंपनी का दौरा भी कर सकते हैं। बेंगलुरु में सेना से जुड़े कई कार्यक्रम रखे गए हैं।

सर्जियो गोर, जो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी सहयोगी हैं, ने पिछले महीने भारत में अमेरिकी राजदूत के रूप में पदभार ग्रहण किया है। वे दक्षिण और मध्य एशियाई मामलों के लिए अमेरिकी विशेष दूत के रूप में भी कार्यरत हैं। अपनी यात्रा की जानकारी साझा करते हुए गोर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट किया: "अभी-अभी चंडीगढ़ पहुंचा हूं। भारतीय सेना की वेस्टर्न कमांड का दौरा करने के लिए उत्सुक हूं।" उनके साथ अमेरिकी इंडो-पैसिफिक कमांड के कमांडर एडमिरल सैमुअल जे. पापारो भी थे।

अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर की यात्रा से पहले किसी विदेशी राजदूत द्वारा भारतीय सेना के पश्चिमी कमान मुख्यालय का दौरा करने का कोई दस्तावेजी उदाहरण नहीं है। यह पहली बार है। 2014 से पहले किसी विदेशी राजदूत द्वारा भारतीय सेना कमान मुख्यालय का दौरा करने का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला है। 2016 में, हमले के बाद जांच के लिए पाकिस्तान की संयुक्त जांच टीम (जेआईटी) को पठानकोट वायुसेना अड्डे का निरीक्षण करने की अनुमति दी गई थी।

सेना के पश्चिमी कमांड का बयान

वेस्टर्न कमांड ने एक्स पर इस यात्रा की जानकारी साझा करते हुए कहा: "भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर... और कमांडर एडमिरल सैमुअल जे. पापारो... ने वेस्टर्न कमांड मुख्यालय का दौरा किया और लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटियार, पीवीएसएम, यूवाईएसएम, एवीएसएम, आर्मी कमांडर, वेस्टर्न कमांड के साथ भारत की पश्चिमी सीमा पर रणनीतिक सुरक्षा गतिशीलता पर गहन चर्चा की। प्रतिनिधिमंडल को वेस्टर्न फ्रंट के परिप्रेक्ष्य पर व्यापक जानकारी दी गई, जिसमें परिचालन तैयारियां, विशिष्ट विरासत, ऑपरेशन सिंदूर का संचालन और राष्ट्र निर्माण तथा क्षेत्रीय स्थिरता में भारतीय सेना की महत्वपूर्ण भूमिका शामिल है।"

यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग बढ़ रहा है। दोनों देशों के बीच समझौते हैं जिनके तहत एक-दूसरे की सेनाओं में संपर्क अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं। वेस्टर्न कमांड का क्षेत्रीय दायित्व कश्मीर से राजस्थान तक फैला हुआ है, जो पाकिस्तान के साथ लगभग पूरी सीमा (गुजरात को छोड़कर) को कवर करता है। इसमें 200 से अधिक ठिकाने शामिल हैं। सेना के सूत्रों के अनुसार, अन्य देशों के राजनयिकों ने भी अतीत में कमांड मुख्यालयों का दौरा किया है, इसलिए विपक्ष की प्रतिक्रिया कुछ ज्यादा ही बढ़ा चढ़ा कर है।

विपक्ष का हमला

हालांकि, विपक्ष ने इस यात्रा को मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए मुद्दा बनाया है। शिवसेना (यूबीटी) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा: "चूंकि भारत के राष्ट्रीय रणनीतिक हित अब अमेरिका जो चाहता है, उसके साथ जुड़ गए हैं, इसलिए यह यात्रा उसी के अनुरूप लगती है। भारत का इतिहास याद रखेगा कि भारत और पाकिस्तान के बीच डी-एस्केलेशन की घोषणा अमेरिकी राष्ट्रपति ने सोशल मीडिया पर की थी, जबकि भारतीयों को अपनी सरकार से पहले पता नहीं चला। अमेरिकी राजदूत अपने देश के लिए काम कर रहे हैं, लेकिन हमारे लिए कौन कर रहा है? जवाब हवा में उड़ रहा है।"

कांग्रेस ने भी एक्स पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा: "इतनी घबराहट क्यों? हम पहले ही देख चुके हैं कि इस सरकार के आशीर्वाद से पाकिस्तान की आईएसआई को पठानकोट एयरबेस तक पहुंच मिली थी। तब तो कहा गया था 'मोदी ने किया है तो कुछ सोच समझकर किया होगा।' उसके मुकाबले यह बहुत छोटी बात है।"

सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यह यात्रा भले ही रेयर है, लेकिन अप्रत्याशित नहीं है। उन्होंने कहा, "यह भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी के बढ़ते स्तर का संकेत है। अतीत में अन्य देशों के राजनयिक भी कमांड मुख्यालयों का दौरा कर चुके हैं। विपक्ष शायद अतिरंजित प्रतिक्रिया दे रहा है।"

यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब भारत-पाकिस्तान सीमा पर तनाव की स्थिति बनी हुई है और क्षेत्रीय स्थिरता एक प्रमुख मुद्दा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की दक्षिण एशिया नीति में भारत एक महत्वपूर्ण साझेदार है, लेकिन विपक्षी दलों का आरोप है कि मोदी सरकार राष्ट्रीय हितों को अमेरिकी एजेंडे के अधीन कर रही है। इस यात्रा के बाद राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है, जबकि सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।