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कोरोना उपकरण संभालने की डब्लूएचओ की चेतावनी को सरकार की अनदेखी क्यों?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की चेतावनी के बावजूद केंद्र सरकार ने कोरोना वायरस संक्रमण रोकने के लिए मास्क, दस्ताने और गाऊन जैसे प्रोटेक्टिव उपकरण एकत्रित करने की कोई कोशिश नहीं की। इसके उलट सरकार ने इसके निर्यात पर कोई रोक नहीं लगाई, जिस वजह से इसकी कमी हो गई और कीमत आसमान छूने लगी। सरकार जब तक चेतती और निर्यात पर रोक लगाती, बहुत देर हो चुकी थी।
'द कैरेवन' ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने समय रहते ही यानी 3 हफ़्ते पहले ही भारत को आगाह कर दिया था कि कोरोना संक्रमण फैल सकता है और इसे रोकने के लिए समय रहते ही भारत पर्याप्त संख्या में पर्सनल प्रोटेक्टिव उपकरणों का इंतजाम कर ले।
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डब्लूएचओ के निर्देश को ठेंगा!

यह विडंबना ही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस दिन पूरे देश में जनता कर्फ़्यू लगाने का एलान किया, उसके एक दिन बाद ही सरकार ने इन उपकरणों के निर्यात पर रोक लगाई। यानी सरकार ने 19 मार्च को इन उपकरणों के निर्यात पर रोक लगाई। 
दूसरी विडंबनापूर्ण स्थिति यह भी है कि डब्लूएचओ की चेतावनी के बाद मोदी सरकार ने इन प्रोटेक्टिव उपकरणों के निर्यात को बढ़ावा दिया।
भारत में कोरोना संक्रमण का  पहला मामला 31 जनवरी को सामने आया। पर सरकार ने इसके एक हफ़्ते बाद यानी 8 फरवरी को एक आदेश जारी कर सर्जिकल मास्क और दस्ताने के निर्यात की अनुमति दे दी। 

सरकार को कोई चिंता नहीं!

यह भी त्रासदपूर्ण स्थिति है कि 25 फरवरी तक इटली में 11 लोगों की मौत हो चुकी थी, चीन में उसके पहले ही मरने वालों की तादाद बहुत अधिक हो चुकी थी, और ये बातें सबको पता थीं। यह नहीं माना जा सकता कि सरकार के नीति निर्धारकों को यह जानकारी नहीं थी। 
और इसके बाद प्रधानमंत्री ने जनता कर्फ्यू का एलान किया और उसके भी बाद सरकार ने इन उपकरणों के निर्यात पर रोक लगाई। 

एचएलएल को एकाधिकार क्यों?

केंद्र सरकार ने इन उपकरणों को एकत्रित करने का काम सिर्फ़ और सिर्फ़ एचएलएल लाइफ़केअर लिमिटेड को दिया। वह कंपनी इस दौरान ये किट दूसरों को 1,000 रुपए की दर से बेचती रही। जो कंपनियाँ ये सामान बनाती थीं, वे ये किट 400-500 रुपए की दर से बेच रही थीं, यानी इसी दर पर वे कंपनियां ये किट केंद्र सरकार को दे सकती थी। 
केंद्र सरकार ने इन उपकरणों को एकत्रित करने का काम सिर्फ़ और सिर्फ़ एचएलएल लाइफ़केअर लिमिटेड को दिया। वह कंपनी इस दौरान ये किट दूसरों को 1,000 रुपए की दर से बेचती रही। जो कंपनियाँ ये सामान बनाती थीं, वे ये किट 400-500 रुपए की दर से बेच रही थीं, यानी इसी दर पर वे कंपनियां ये किट केंद्र सरकार को दे सकती थी।
'द कैरेवन' के मुताबिक़, एचएलएल 7.25 लाख ओवरऑल, 60 लाख एन-65 मास्क और एक करोड़ तीन स्तरों वाला मास्क केंद्र सरकार को देगी। 

किसे फ़ायदा पहुँचाया

कपड़ा मंत्रालय ने कहा है कि बॉडी ओवरऑल और एन-65 मास्क की कमी है, लिहाजा इसे एकत्रित करने का काम स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन दिया जाए और वह एचएलएल से इसे कराए। पर सवाल यह है कि जब मंत्रालय यह खुद मानता है कि इन चीजों की कमी है तो फिर एक ही कंपनी को इसका एकाधिकार क्यों दिया गया।
कपड़ा मंत्रालय ने कहा है कि बॉडी ओवरऑल और एन-65 मास्क की कमी है, लिहाजा इसे एकत्रित करने का काम स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन दिया जाए और वह एचएलएल से इसे कराए। पर सवाल यह है कि जब मंत्रालय यह खुद मानता है कि इन चीजों की कमी है तो फिर एक ही कंपनी को इसका एकाधिकार क्यों दिया गया।
यह काम कई कंपनियों में बाँटा जा सकता था। इससे इन चीजों के एकत्रित करने का काम आसानी से और जल्दी होता और प्रतिस्पर्द्धा में उनकी कीमत भी कम होती। 
यह लापरवाही है, या किसी निर्यात लॉबी का काम है या किसी कंपनी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए यह काम किया गया? इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा?

राहुल का हमला

कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने सरकार पर हमला करते हुए सवाल उठाया है कि इन चीजों के निर्यात पर रोक क्यों लगाई? 
कौन देश को बताएगा कि स्वास्थ्य कर्मियों को प्रोटेक्टिव उपकरणों की ज़रूरत है, उन्हें मास्क और बॉडी कवर की ज़रूरत है? इन उपकरणों को मुहैया करा कर स्वास्थ्य कर्मियों के प्रति आभार जताया जा सकता था, पर हमारी प्राथमिकता में थाली पीटना और ताली बजाना है। हमारी कोशिश तो यह भी है कि हम किसी भी मामले को इवेंट में तब्दील कर लें। 

लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि इस मुद्दे पर राजनीति नहीं की जाए और मिल कर इस संकट से निबटा जाए। 

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