प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने संसद सत्र के पहले ही दिन साफ कर दिया कि वो ईरान युद्ध और मिडिल ईस्ट संकट पर चर्चा नहीं कराएगी। उसने विदेश मंत्री एस जयशंकर से संसद में बयान दिलवाकर अपना कर्तव्य पूरा कर लिया। मोदी सरकार ने अभी तक अमेरिका-इसराइल हमलों या खामेनेई की हत्या की निंदा नहीं की। विपक्ष, खासकर कांग्रेस पार्टी, सरकार पर "कम्प्रोमाइज्ड" होने और रणनीतिक स्वायत्तता खोने का आरोप लगा रही है। 

संसद में चर्चा पर सरकार का रुख

मोदी सरकार ने बजट सत्र के दौरान ईरान संघर्ष और मध्य पूर्व स्थिति पर समर्पित बहस की विपक्ष की मांग को खारिज कर दिया है। सरकारी सूत्रों ने 9 मार्च 2026 को पुष्टि की कि ऐसी कोई चर्चा नहीं होगी, क्योंकि अन्य प्राथमिकताएं हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 9 मार्च को लोकसभा और राज्यसभा दोनों में बयान दिया, जिसमें उन्होंने "संवाद और कूटनीति" के माध्यम से तनाव कम करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्थिति पर "नजर बनाए हुए हैं" और सरकार क्षेत्र में भारतीयों की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रही है। उन्होंने अमेरिका-इसराइल हमलों या खामेनेई की हत्या की निंदा नहीं की, बल्कि इधर उधर की बातें करते रहे और बार-बार "कूटनीति (को) सबसे प्रेक्टिकल रास्ता" बताते रहे। विपक्ष ने सदन का बहिष्कार किया। सदन स्थगित हुआ लेकिन सरकार को इन सब बातों की जरा भी परवाह नहीं कर रही है।

विपक्ष के आरोप और राहुल गांधी का बयान

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर "कम्प्रोमाइज्ड" और "ब्लैकमेल" होने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि भारतीय महासागर में एक ईरानी युद्धपोत (IRIS Dena) के डूबने पर मोदी चुप हैं, जबकि संघर्ष "हमारे नज़दीक" तक पहुंच गया है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका द्वारा रूसी तेल खरीद पर छूट "कम्प्रोमाइज्ड व्यक्ति" का शोषण है और मोदी ने भारत की रणनीतिक स्वायत्तता समर्पित कर दी है। राहुल ने कहा- नरेंद्र मोदी ब्लैकमेल हो चुके हैं, Compromised हैं, इसलिए संसद से भाग गए हैं। अब वो सदन के अंदर नहीं आ पाएंगे।' पश्चिम एशिया में Paradigm shift करने की लड़ाई चल रही है, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था को बहुत नुकसान होने वाला है। पश्चिम एशिया एक जरूरी मुद्दा है, क्योंकि उसका असर Fuel की कीमत और भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
वहीं, नरेंद्र मोदी ने अमेरिका से ट्रेड डील साइन कर ली है और हमने स्टॉक मार्केट का हाल देख लिया है। देश को बहुत जबरदस्त चोट लगने वाली है।ये सभी जनता से जुड़े जरूरी मुद्दे हैं। इसलिए हम इन मुद्दों पर संसद में चर्चा करने की मांग कर रहे हैं, जिसे मोदी सरकार नहीं मान रही।


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कूटनीतिक कदम और अनौपचारिक शोक संवेदना

सरकार ने आधिकारिक तौर पर अमेरिका या इसराइल की निंदा नहीं की। हालांकि, विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने नई दिल्ली में ईरानी दूतावास में शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए। लेकिन भारत की राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के मुंह से कोई शब्द नहीं निकला। 9 मार्च 2026 को वरिष्ठ भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने दूतावास जाकर शोक जताया और कहा कि "युद्ध समाधान नहीं, समस्या है"। यह गैर-सरकारी स्तर पर सहानुभूति का प्रदर्शन है, जो सरकार के यूएस-इसराइल समर्थन रुख से अलग है। ईरान के दूतावास ने हमलों को "स्पष्ट अपराध" बताकर वैश्विक निंदा की मांग की, लेकिन भारत ने ऐसा नहीं किया। मोदी ने ओमान और कुवैत के नेताओं से बात की, खाड़ी सुरक्षा और भारतीय प्रवासियों की चिंता जताई। लेकिन ईरान पर चुप रहे। 

मोदी की इसराइल यात्रा क्यों हुई थी

विपक्ष का दावा है कि 25-26 फरवरी 2026 की मोदी की इसराइल यात्रा (हमलों से 48 घंटे पहले) जानबूझकर की गई ताकि भारत को अमेरिका-इसराइल खेमे में खड़ा दिखाया जाए। यात्रा के दौरान मोदी ने इसराइली संसद नेसेट को संबोधित किया, इसराइल के साथ एकजुटता जताई और रक्षा एवं सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए। आलोचकों का कहना है कि इससे भारत की तटस्थता खत्म हुई और ऐतिहासिक फिलिस्तीन समर्थन से अमेरिका-इसराइल निकटता की ओर बदलाव आया।

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ईरान भारत का सदियों पुराना मित्र है। लेकिन भारत अब अपने स्टैंड पूरी तरह पीछे हट चुका है। विपक्ष इसे ब्लैकमेल और तानाशाही से जोड़ रहा है। विपक्ष ने एक स्वर में ईरान पर हमले की निन्दा की थी। साथ ही खामेनेई की हत्या की आलोचना की थी। ईरान को लेकर भारत के विपक्षी दलों का रुख कायम है लेकिन मोदी सरकार ने अटल बिहारी वाजपेयी के समय की नीति को भी बदल दिया है।