धर्मेंद्र प्रधान ने जब कहा कि भविष्य की पीढ़ी को जानने के लिए NCERT ने किताब में इमर्जेंसी को शामिल किया है तो योगेंद्र यादव ने इसे झूठ क़रार देते हुए कहा, '2007 में मैं इसे लिखने में शामिल था कि NCERT के छात्रों से कड़वा सच छिपाया न जाए'।
योगेंद्र यादव और धर्मेंद्र प्रधान
योगेंद्र यादव ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के उस बयान को 'झूठ' क़रार दिया है जिसमें उन्होंने कहा था कि भविष्य की पीढ़ी को जानने-समझने के लिए एनसीईआरटी ने किताब में इमर्जेंसी को शामिल कर सही किया है। योगेंद्र यादव ने कहा कि आपातकाल का अध्याय पहली बार नहीं जोड़ा गया है, बल्कि यह विषय 2007 से ही एनसीईआरटी की राजनीति विज्ञान की किताबों में मौजूद है। उन्होंने कहा कि वह स्वयं उस पुस्तक को तैयार करने वाली टीम का हिस्सा थे।
क्या कहा था धर्मेंद्र प्रधान ने?
योगेंद्र यादव ने यह बयान तब दिया है जब धर्मेंद्र प्रधान ने इस मामले में बयान दिया था। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने एनसीईआरटी की नई किताब में आपातकाल का उल्लेख किए जाने का स्वागत करते हुए कहा था कि यह जरूरी है ताकि आने वाली पीढ़ियां भारतीय लोकतंत्र के उस दौर को समझ सकें। उन्होंने कहा, 'एनसीईआरटी ने बिल्कुल सही काम किया है। भविष्य की पीढ़ी को आपातकाल के काले अध्याय के बारे में जानना, पढ़ना और समझना चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति कभी न आए।' प्रधान ने कहा कि एनसीईआरटी ने इस विषय को प्रमुखता देकर अच्छा काम किया है।योगेंद्र यादव ने बताया 'झूठ'
धर्मेंद्र प्रधान के इस बयान पर योगेंद्र यादव ने एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि यह दावा तथ्यात्मक रूप से गलत है। उन्होंने लिखा, 'प्रिय धर्मेंद्र प्रधान जी, यह झूठ है। 2007 से ही एनसीईआरटी की किताब में आपातकाल पर पूरा अध्याय मौजूद है। मैं स्वयं उस किताब को लिखने और यह सुनिश्चित करने की प्रक्रिया में शामिल था कि राजनीति विज्ञान पढ़ने वाले छात्रों से आपातकाल का कड़वा सच छिपाया न जाए।'योगेंद्र यादव ने अपने एक पुराने लेख का भी हवाला दिया, जिसमें उन्होंने बताया था कि कांग्रेस सरकार के समय ही आपातकाल को स्कूल की किताबों में शामिल किया गया था।
'कांग्रेस राज में टेक्स्टबुक में आपातकाल शामिल हुआ'
योगेंद्र यादव ने पाँच साल पहले द प्रिंट के लिए लिखे अपने लेख में कहा है कि '2007 में प्रो. कृष्ण कुमार के नेतृत्व में एनसीईआरटी में स्कूल टेक्स्टबुक्स का पूरी तरह नया संस्करण तैयार हो रहा था। राजनीति विज्ञान की कक्षा 9 से 12 तक की किताबें प्रो. सुहास पल्शीकर और इस लेखक के नेतृत्व में लिखी जा रही थीं।' उन्होंने कहा कि खासतौर पर कक्षा 12 की किताब 'भारत स्वतंत्रता के बाद' में 'लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट' नामक अध्याय (चैप्टर 6) में इमर्जेंसी को विस्तार से शामिल किया गया।
उन्होंने लिखा है, 'यह अध्याय इंदिरा गांधी द्वारा व्यक्तिगत संकट को राष्ट्रीय संकट में बदलने, कैबिनेट को इमर्जेंसी घोषित होने के बाद बताने, मीडिया पर सेंसरशिप, संजय गांधी की असंवैधानिक भूमिका, तुर्कमान गेट विध्वंस और केरल में पी. राजन की हत्या जैसी घटनाओं का सच्चा और तथ्यपरक वर्णन करता था।'
योगेंद्र यादव ने लिखा है कि तीखे कार्टून और चित्रों के जरिए आपातकाल की चापलूसी की संस्कृति और भय का माहौल भी दिखाया गया। आगे लिखा गया है कि मसौदा तैयार होने के बाद इसे विशेष समिति, रामचंद्र गुहा, सुनील खिलनानी, महेश रंगराजन जैसे विद्वानों और अंत में एचआरडी मंत्री अर्जुन सिंह को भेजा गया। यादव ने लिखा है, "अर्जुन सिंह के निजी सचिव ने अध्याय पर सवाल उठाए, लेकिन मंत्री ने अंत में पूछा, 'प्रोफेसर साहब, क्या आपको लगता है हमारा देश इसके लिए तैयार है?' प्रो. यशपाल और लेखक के आग्रह पर किताब को बिना किसी बदलाव के मंजूरी मिल गई। इस तरह कांग्रेस शासन में ही इमर्जेंसी का निर्भीक और बिना मुलम्मे का वर्णन सरकारी स्कूली किताब में पहली बार शामिल हुआ, जो भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का उदाहरण बन गया।"
नई एनसीईआरटी किताब में क्या लिखा गया है?
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी एनसीईआरटी ने पहली बार कक्षा 9 की सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक में 1975-77 के आपातकाल को विस्तार से शामिल किया है। नई किताब में आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के सामने आई सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताया गया है।
किताब में कहा गया है कि 1970 के दशक की शुरुआत में सरकार के खिलाफ बढ़ते असंतोष के बीच देश में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए, जिसके बाद जून 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने आपातकाल लागू किया। इस दौरान मौलिक अधिकारों पर रोक लगी, प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई और कई विपक्षी नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया।
किताब में जयप्रकाश नारायण का भी ज़िक्र
नई किताब में लोकनायक जयप्रकाश नारायण यानी जेपी की भूमिका का भी विशेष उल्लेख किया गया है। पुस्तक के अनुसार, जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले जनआंदोलनों ने खासकर बिहार और गुजरात में छात्रों तथा आम नागरिकों को संगठित किया। किताब में कहा गया है कि 1977 में आपातकाल हटने के बाद आम चुनाव हुए और जनता ने मतदान के जरिए अपनी राय व्यक्त की। किताब कहती है, 'सत्ता में बैठी सरकार की हार ने भारतीय लोकतंत्र की ताकत और लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्व को साबित किया।'
राजनीतिक बहस तेज
बहरहाल, इस मुद्दे पर अब राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। एक ओर भाजपा इसे आपातकाल के इतिहास को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की पहल बता रही है, वहीं दूसरी ओर योगेंद्र यादव जैसे शिक्षाविद और विपक्ष से जुड़े लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि इस विषय को 'पहली बार शामिल किए जाने' का दावा ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं खाता।
अब यह विवाद केवल पाठ्यपुस्तक तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इस बात पर भी बहस छिड़ गई है कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आपातकाल को किस तरह और कब से पढ़ाया जाता रहा है।