loader

आज 10 बैंक विलय होकर 4 बन गए, कोरोना की तबाही से क्या निपट पाएँगे?

जबसे ग़ैर-कांग्रेसी सरकार आई है तब से लगभग रोज़ कोई न कोई नया फ़ैसला आ रहा है। हर फ़ैसले के साथ नई आशाएँ, नई अपेक्षाएँ। इस ग़ैर-कांग्रेसी सरकार को हम कुछ भी कहें और उसके फ़ैसलों का अच्छा-बुरा विश्लेषण करते रहें पर यह सच है कि सरकार कुछ न कुछ करती ज़रूर रहती है।

आज पूरे वातावरण में कोरोना वायरस का खौफ फैला हुआ है। आर्थिक मोर्चों पर लिए गए या लिए जा रहे निर्णय भी कभी निराशा तो कभी आशा के झूले में झुलाते रहते हैं। इस बीच 1 अप्रैल को बैंकों का मर्जर भी संपन्न हो गया। हालाँकि ऐसा होना पहले से तय था। कोई अनहोनी नहीं हुई। मगर फ़ैसला असलियत में तो आज ही बदला है। 10 सरकारी बैंकों को आज से चार बड़े बैंकों में परिवर्तित कर दिया गया है। नोटबंदी के तुरंत बाद 2017 में भी स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के सहयोगी बैंकों (आनुषंगिक बैंकों) को उसमें मिला दिया गया था। सिद्धांत रूप में यह फ़ैसला भी उसी की अगली कड़ी है।

ताज़ा ख़बरें

लेकिन यह हिसाब तो लगाना ही होगा कि इन बैंकों के मर्जर से सरकार, इकॉनमी या आम आदमी को क्या लाभ-हानि हो सकती है। ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को आर्थिक गतिविधि से जोड़ने या फ़ाइनेंशियल इनक्लूजन यानी आर्थिक समावेशन के इस दौर में भी 80% जनता के लिए बैंक केवल अपने पैसों को सुरक्षित रखने, थोड़ा बहुत ब्याज कमाने और समय-समय पर लेनदेन करने का ज़रिया मात्र हैं। और हाँ, इनमें से एक बड़े वर्ग को आजकल किसी न किसी नाम पर आने वाली सब्सिडी का भी इंतज़ार रहता है। लेकिन इन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बैंक का नाम क्या है और देश में कुल कितने बैंक हैं। उन्हें मतलब इस बात से है कि बैंक में रखा उनका पैसा सुरक्षित है या नहीं, कितना ब्याज मिलता है और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें तुरंत रक़म मिल जाती है या नहीं। लेकिन यही लोग बैंकों के लिए बहुत ज़रूरी हैं। क्योंकि बैंकों को सबसे सस्ते ब्याज पर पैसा इन्हीं से मिलता है। और यही पैसा बैंकों की आमदनी के लिए ज़रूरी है।

बचे हुए 20% लोग ही ऐसे हैं जो अपने रोज़मर्रा के क़ारोबार के लिए बैंकों की सुविधाओं और पूँजी पर बहुत हद तक निर्भर हैं। 2014 के बाद धीरे-धीरे और 2016 के बाद बहुत तेज़ी से इस वर्ग की धन की आवश्यकता पर विभिन्न कारणों से लगाम लगने लगी। बैंक जब सख्त हुए तो पता लगा कि व्यवसायियों को दी जाने वाली रक़म उनके व्यवसाय के अलावा कहीं और इस्तेमाल हो रही है और बैंक का अच्छा ख़ासा पैसा एनपीए में परिवर्तित हो रहा है।

ऐसा नहीं है कि एनपीए एक दिन में हुआ और ऐसा भी नहीं है कि यह पहले कभी नहीं होता था। लेकिन इससे पहले इस तथाकथित डायवर्सन ऑफ़ फंड्स को बैंक और रिजर्व बैंक मिलकर अधिक से अधिक ‘विलफुल डिफॉल्ट’ बता देते थे।

और वसूली के लिए एक सिविल केस लगा दिया जाता था जो सालों खिंचता रहता था और वसूली के लिए बिल्कुल नाकाफ़ी होता था। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। इस तरह की गतिविधियों को फ्रॉड माना गया और वसूली की अन्य प्रक्रियाओं के साथ आपराधिक मामले भी दर्ज होने लगे। इसीलिए आप देखेंगे कि 2014 के बाद बैंकों में फ्रॉड के केस अचानक बहुत बढ़ गए। 

अर्थतंत्र से और ख़बरें

वे यही लोग हैं जो पहले पैसे लेकर, डुबाकर चले जाते थे और फिर भी बाइज्जत शहरी की तरह ज़िंदगी बिताते थे। बैंकों की संख्या कम होने और बेहतर मैनेजमेंट की दशा में इस तरह के बहुत से केस फिर सामने आएँगे। यानी एक बार तो ऐसे केस बढ़ेंगे या बढ़ते हुए दिखेंगे। मतलब आने वाले समय में अभी बैंकों के लिए और इकनॉमी के लिए थोड़ा दर्द और बाक़ी है। लेकिन उम्मीद रखनी चाहिए कि आइंदा के लिए बैंकों को इस बीमारी से छुटकारा मिल जाएगा।

बैंकों की कम संख्या ग्राहकों द्वारा किए जाने वाले अनावश्यक मोलभाव से भी बैंकों को राहत दिलाएगी। जब हम इस महामारी से उबर कर वापस सामान्य गति से चलने का प्रयास करेंगे उस समय तक हमारा सरकारी बैंकों का तंत्र हमें संभालने के लिए तैयार हो चुका होगा, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए। 

आप यह मानकर चलें कि इतनी बड़ी त्रासदी के बाद पहले आर्थिक तंत्र को सरकारी बैंक ही संभालेंगे, प्राइवेट बैंक तो हमेशा से पहले या बाद में केवल मलाई खाने के लिए आते हैं।

इधर बीच में एक चीज का हवाला और दे दूँ कि इस पूरे समय में बैंकों के कर्मचारियों का भी ध्यान रखा जाए तो बेहतर है क्योंकि ये लोग वैसे भी एक लंबे समय से बहुत दबाव में काम कर रहे हैं और उसके बदले में इनको मिलने वाली सैलरी भी कम है और इनका वेज रिवीजन भी लंबे अरसे से लंबित पड़ा है। इस बैंकिंग सेना को अगर लंबी लड़ाई के लिए तैयार करना है तो उनके मोराल यानी हौसले का भी ध्यान रखा जाए।

बैंक अपने कर्मचारियों, शाखाओं, एटीएम व अन्य संसाधनों को तर्कसंगत ढंग से प्रयोग करके अपनी लागत को कम करेंगे और उम्मीद है कि इसका फ़ायदा वह ग्राहकों तक भी पहुँचाएँगे, अभी दिए हुए समय में कुल मिलाकर बैंकों का मर्जर भविष्य के लिए ठीक ही प्रतीत होता है लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि मिलाए जाने वाले बैंकों की 31 मार्च की बैलेंस शीट कोई बड़ा धमाका न कर दे।

Satya Hindi Logo लोकतंत्र तभी बचेगा, जब सच बचेगा! गोदी मीडिया के इस दौर में पत्रकारिता को राजनीति और कारपोरेट दबावों से मुक्त रखने के लिए 'सत्य हिन्दी' के साथ आइए। नीचे दी गयी कोई भी रक़म जो आप चुनना चाहें, उस पर क्लिक करें। यह पूरी तरह स्वैच्छिक है। आप द्वारा दी गयी राशि आपकी ओर से स्वैच्छिक सेवा शुल्क (Voluntary Service Fee) होगा, जिसकी जीएसटी रसीद हम आपको भेजेंगे।
अशोक शुक्ला
सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें

अपनी राय बतायें

अर्थतंत्र से और खबरें

ताज़ा ख़बरें

सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें