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कोरोना की चपेट में भारतीय अर्थव्यवस्था, माँग कम होने से सुधार की संभावना ख़त्म

भारतीय अर्थव्यवस्था में जो थोड़ा बहुत सुधार दिखने लगा था, कोरोना वायरस ने उसे भी चौपट कर दिया है। पर्यटकों के आने पर लगी रोक, स्कूल-कॉलेज और सिनेमा हॉल को बंद करने के आदेश से आर्थिक गतिविधियाँ कम हो गई हैं। इसका नतीजा यह है कि अर्थव्यवस्था के फिर से पटरी पर लौटने की संभावना पर पानी फिर गया है। 

अर्थव्यवस्था का हाल

इस महामारी के भारत पहुँचने के पहले ही देश की अर्थव्यवस्था का बुरा हाल था, आर्थिक विकास की स्थिति दशक के सबसे बुरे दौर में थी, निवेश कम हो रहा था और खपत गिर रहा था। वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर का अनुमान 6 प्रतिशत से कम कर 5 प्रतिशत कर दिया गया था।
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पूरी दुनिया में कोरोना संक्रमण की वजह से आर्थिक स्थिति बिगड़ी है। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेन्सी मूडीज़ ने अनुमान लगाया है कि विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर 2.5 प्रतिशत होगी।
खपत में कमी, और बंद व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की वजह से लोगों की नौकरियाँ गई हैं। इससे खर्च करने की सरकार की ताक़त कम होगी क्योंकि कर उगाही में कमी होगी। सरकार ने इसे देखते हुए ही पेट्रोल व डीज़ल पर उत्पाद कर बढ़ा दिया है।  

क्या कहना है सरकार का?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मिंट से कहा कि सरकार कोरोना फैलने से होने वाले आर्थिक नुक़सान का अनुमान लगा रही है। उन्होंंने कहा, ‘हम उद्योग जगत, सेवा क्षेत्र और समाज के एक हिस्से से बात कर आकलन करने की कोशिश कर रहे हैं कि कितना नुक़सान हो सकता है।’
विश्लेषकों का कहना है कि उपभोक्ताओं और निवेशकों का भरोसा कम हुआ है। पर्यवेक्षकों का अनुमान है कि कोरोना संक्रमण रोकने के उपाय के तहत जिस तरह लोग के एक जगह एकत्रित होने पर रोक लगाई जा रही है और लोगों की दूसरी गतिविधियाँ कम हो रही हैं, उससे उपभोक्ता वस्तुओं की माँग कम होगी।
केअर रेटिंग्स के मदन सबनवीस ने मिंट से कहा, ‘बैंकों और कर्ज़ देने वाली दूसरी संस्थानों को ज़्यादा चौकन्ना रहना होगा क्योंकि व्यवसाय कम होने से कंपनियों के पास पैसे कम होंगे और उनकी ओर से ब्याज़ चुकाने की संभावना कम होगी।’

चिंता की बात

यह स्थिति ज़्यादा चिंताजनक है। माँग और कम होने से खपत कम होगी और उसके बाद उत्पादन कम होने का कुचक्र ऐसे समय शुरू हो जाएगा जब देश की अर्थव्यवस्था की बदहाली पहले से ही है।
जनवरी और फरवरी में माँग थोड़ी बढ़ी थी, स्थिति थोड़ी सी सुधरने लगी थी। पर अब माँग में कमी होने से सकल घरेलू उत्पाद के पहले लगाए गए अनुमान को पूरा करना सरकार के लिए मुश्किल होगा।
कोरोना का सबसे ज़्यादा असर विमानन क्षेत्र पर पड़ेगा। इस संक्रमण की वजह से अंतरराष्ट्रीय बुकिंग में 75 प्रतिशत और घरेलू बुकिंग में 20 प्रतिशत की गिरावट हो चुकी है। विमानन कंपनी इंडिगो ने कहा है कि मार्च की तिमाही में उसका कारोबार अनुमान से कम होगा, यह तय है। कंपनी की कमाई कम होगी तो सरकार की कर उगाही भी कम होगी। 

चीन का असर!

कोरोना का असर दूसरे तरीकों से भी होगा। चीन की वजह से सप्लाई लाइन बुरी तरह चौपट हो जाएगी। रसायन, कपड़ा, ऑटोमोटिव कल-पुर्जे और दूसरे कई क्षेत्रों में भारत चीन से इस तरह जुड़ा हुआ है कि भारतीय कंपनियों का कारोबार चौपट हो जाएगा। 

इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। इस साल भारत ने यूरोप को 55 अरब डॉलर का निर्यात किया, जो पहले के निर्यात से लगभग 3 प्रतिशत कम है। कपड़ा, रसायन, जेम्स-ज्वेलरी, इस्पात, हैंडीक्रॉफ्ट वगैरह के क्षेत्र में यह निर्यात हुआ। डर यह है कि यह निर्यात और कम हो सकता है। 
सबसे अहम बात यह है कि यह स्थिति उस समय आ रही है जब देश की अर्थव्यवस्था बदहाल है। कोरोना पहले से खराब अर्थव्यवस्था को और नुक़सान पहुँचा सकता है, उम्मीद की जो किरण दिखी थी, वह ख़त्म हो चुकी है। 

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