यह आर्थिक मामलों में यथार्थ और माया के खेल को समझने का बहुत बढ़िया अवसर है और हम चाहें तो इसके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को धन्यवाद कह सकते हैं। वैसे वे खुद क्या हैं और आर्थिक मामलों में किस तीसरी चीज को हासिल करना चाहते हैं यह समझना मुश्किल है। वे तो क्रिप्टो करेंसी से लेकर और जाने किन चीजों के सौदागर हैं– खुद को शांति का सौदागर तो बताते ही हैं। आज जिस तरह शेयर बाजार, वित्तीय बाजार, करेंसी बाजार और बुलियन बाजार में अफरातफरी मची है वह बताती है कि वास्तविक अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य और काम काज से इनका बहुत कुछ लेना नहीं है।

भारत ही नहीं, दुनिया की आर्थिक गतिविधियों में कोई बड़ा उतार चढ़ाव, खास तौर से गिरावट दिखाई नहीं देती, लेकिन शेयर बाजार धड़ाम हो रहे हैं, करेंसी का उतार चढ़ाव संभालने में सरकारों के पसीने छूट रहे हैं, निवेश बाजार से पूंजी निकालने और बाहर ले जाने की होड़ लगी है और बुलियन बाजार में आग लगी है। सोना-चांदी ही नहीं, प्लेटिनम समेत सारे कीमती धातु रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं और मांग बढ़ती जा रही है। सोना और चांदी की क़ीमतें इस स्तर पर आ गई हैं कि आम आदमी के लिए इन्हें खरीदना मुश्किल है और जिनको सोने-चांदी से कोई लेना-देना नहीं रहा है, वे किसी भी कीमत पर इनको खरीदकर जमा करते जा रहे हैं। और माया की तरह यह कहना भी आसान नहीं है कि इन गतिविधियों से अर्थव्यवस्था अप्रभावित है। उस पर भी खूब असर पड़ रहा है, लेकिन खैरियत यही है कि महामंदी का कोई नया दौर आता नहीं दिखता। पर मंदी कोई सूचना देकर थोड़े ही आती है।
यह माना जाता है कि हमारा शेयर बाजार बहुत बड़ा नहीं है और इसमें देश-विदेश का जो पैसा लगा है, उसमें काफी बड़े खिलाड़ी हैं। वे बाजार को कृत्रिम तरीक़ों से भी ऊँचा बनाए रखते हैं या सरकार में अपने ऊँचे रसूख से सरकारी बैंकों और बीमा तथा भविष्यनिधि समेत अन्य वित्तीय संस्थाओं से निवेश कराके बाजार को संभालते रहते हैं। वैसे, यह सरकार की जबाबदेही भी है। इधर, यह भी हुआ है कि विदेशी निवेशक बड़े पैमाने पर अपना निवेश वापस ले रहे हैं पर इधर देशी निवेश बढ़ाने से बाजार को ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है।

500% टैरिफ़ की धमकी से हिला बाज़ार

लेकिन ट्रम्प के फैसले हंगामा मचाते रहे हैं और इस बार जब उन्होंने 500 फीसदी तक सीमा शुल्क बढ़ाने की बात उठाई तो सारे बाजारों का धीरज जवाब दे दिया। धड़ाम हमारे बाजार भी हुए लेकिन इस बार बचाने का प्रयास करने वाले भी नदारद रहे। हमारी सरकार के दुलारे अडानी पर कार्रवाई की अमेरिकी पहल ने एक दिन में उनकी कई कंपनियों के शेयर में पंद्रह फीसदी तक की गिरावट ला दी। अकेले जनवरी महीने में अब तक बाजार साढ़े चार फीसदी तक टूट चुका है और अब सभी बजट की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कोई चमत्कार कर सकती हैं, इसकी गुंजाइश कम ही लगती है।

सरकार और रिजर्व बैंक ने जब रुपए की गिरावट रोकने का प्रयास किया तब ज्यादा सफलता नहीं मिली। जनवरी भर में करीब 2.7 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा बाजार में उतारकर सरकार ने अपने दम भर प्रयास किया लेकिन वह सिर्फ गिरावट की रफ्तार को कम कर सकी, गिरावट को रोकना संभव नहीं हुआ।

रुपया कमजोर क्यों?

डॉलर 91 रुपए के ऊपर पहुँचा तो यूरो 103 से ऊपर और पाउंड 125 के क़रीब। यह तब है जब रूस के तेल का भुगतान डॉलर में नहीं करना होता। डॉलर के उतार-चढ़ाव पर मोदी जी ने ही पहले काफी कुछ कहा है इसलिए ज्यादा कहने की जरूरत नहीं रहती। लेकिन मोदी सरकार इस तरह बेबस हो जाएगी, इसका कारण ट्रम्प की नीतियों की अनिश्चितता भर नहीं है। हमारी अर्थव्यवस्था में और आसपास के देशों की आर्थिक गतिविधियों में भी काफी कुछ बदल रहा है जो डॉलर को मज़बूत बनाए न बनाए हमारे रुपए को कमजोर करता जा रहा है।

पर बुलियन बाजार की तेजी का तो ट्रंप की नीतियों या राजनीति से जितना नाता है, हमारी सरकार की कमजोरी का भी वैसा ही नाता है। सोने की क़ीमत प्रति दस ग्राम डेढ़ लाख के ऊपर पहुंचाने में हमारे आम लोगों का कोई हाथ नहीं है, ‘खास’ अर्थात वायदा बाजार के खिलाड़ियों का भी बहुत योगदान नहीं है क्योंकि हमारे यहां सोने की कुल खरीद में काफी कमी आई है। लेकिन चांदी की कीमत सवा तीन लाख प्रति किलो से ऊपर पहुंचाने में तो खिलाड़ियों की ही बड़ी भूमिका है। यह सही है कि चीन बड़े पैमाने पर चांदी खरीदकर वैश्विक तेजी का मुख्य खिलाड़ी बना हुआ है लेकिन हमारे वायदा बाजार के कायदे और खिलाड़ी भी कम बड़ी वजह नहीं हैं, खासकर इस कारण कि हमारे यहां चांदी की कोई कमी नहीं है और न कोई खास मांग आ गई है। यह शुद्ध सट्टेबाजी है और सरकार चुप बैठी है।

वायदा बाजार में भी खेल!

वायदा बाजार में मार्जिन मनी बढ़ते ही तेजी और गिरावट का खेल यह बताता है कि मात्र दो फीसदी रकम से पचास गुना अधिक चांदी या मेटल को सट्टेबाजी में उलझा देने का खेल बड़े पैमाने पर हो रहा है। दुनिया के किसी भी बड़े वायदा कारोबार में इतने कम मार्जिन पर सौदे नहीं होते हैं। सोने-चांदी की देखादेखी प्लेटिनम और दूसरी कीमती धातुओं के दाम भी रिकॉर्ड स्तर तक आ गए हैं। उत्पादक आर्थिक गतिविधियों की जगह अनुत्पादक चीजों के सहारे सट्टेबाजी का इससे बढ़िया उदाहरण शायद ही मिले। पर त्रासदी यह है कि लोग इसे ही सर्वाधिक सुरक्षित आर्थिक निवेश मान रहे हैं।

और जिस अमेरिकी प्रतिभूतियों और डॉलर को कल तक सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता था, आज की यह हालत उनकी दुर्गति के चलते ही हुआ है। इसमें ट्रंप का योगदान काफी बड़ा है लेकिन बीते कुछ समय से अमेरिकी आर्थिक प्रभुत्व में गिरावट के अन्य लक्षण भी दिखने लगे थे। हमारी मुश्किल यह है कि हम चीन के साथ जाएँ तो मुश्किल और अमेरिका से बंधे रहें तो और मुश्किल। और इसी जुड़ाव की कीमत हमारा रुपया भी दे रहा है जो दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के आगे डॉलर से भी ज्यादा तेजी से लुढ़क रहा है। मोदी जी भूल गए होंगे, यह संभव नहीं लगता लेकिन हाल फिलहाल डॉलर कभी चालीस रुपए में मिलेगा, इसकी संभावना तो दूर दूर तक नहीं दिखती।