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ज़बरदस्त मंदी की चपेट में गुजरात का हीरा उद्योग, 60 हज़ार नौकरियाँ गईं 

गुजरात जिस उद्योग के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है, वह हीरा उद्योग बदहाल है। कई ईकाइयाँ बंद हो चुकी हैं, तीन के बदले एक शिफ़्ट में काम हो रहा है, कम घंटे काम हो रहा है। इसके बावजूद इससे जुड़े 60 हज़ार लोगों की नौकरी जा चुकी है। 
साल 2014 में हुए लोकसभा चुनाव के पहले उस समय के मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात के आर्थिक विकास को मॉडल के रूप में पेश किया था। गुजरात के आर्थिक विकास में पेट्रोकेमिकल जैसे उद्योग तो हैं ही, पर हीरा उद्योग सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसकी वजह यह है कि यह सबसे अधिक विदेशी मुद्रा कमाता है और इसमें सबसे अधिक लोगों को रोज़गार मिला हुआ है। 
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हीरा उद्योग में 15 हज़ार ईकाइयाँ काम करती हैं, जिन पर सीधे या परोक्ष रूप से 7 लाख लोगों का रोज़गार निर्भर है। छोटी, मझोली और बड़ी कुल मिला कर 3,500 कंपनियाँ इस क्षेत्र में काम करती हैं। 

लेकिन हीरा उद्योग में मंदी पिछले दो साल से है। नोटबंदी के ठीक बाद ही इस उद्योग में मंदी आने लगी। इसके बाद जीएसटी लागू होने से तो उद्योग की मानो कमर ही टूट गई।
उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि नकली हीरे का चलन बढ़ने और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारतीय हीरों की चमक फीकी पड़ने से भी इस उद्योग का बुरा हाल है। 

नवरात्र की लंबी छुट्टी!

साल 2017 के नवरात्र की छुट्टियों के बाद कई हीरा ईकाइयाँ खुली ही नहीं। सूरत में हीरा उद्योग में 13 हज़ार लोग काम करते हैं। यहाँ की लगभग 40 प्रतिशत ईकाइयाँ 2107 के नवरात्र की छुट्टियों के बाद अब तक नहीं खुली हैं। इस बार अभी से ही कई कंपनियों के बाहर नोटिस लगे हुए हैं, 'पैसे बचा कर रखें, इस बार नवरात्र की छुट्टी ज्यादा लंबी हो सकती है।' लोग इससे अभी से परेशान हो रहे हैं। 
गुजरात हीरा कर्मचारी यूनियन का कहना है कि 2018 में नौकरी जाने के बाद 10 से अधिक कर्मचारियों ने ख़ुदकशी कर ली है। इससे इस उद्योग की स्थिति का अंदाज लगाया जा सकता है। 

नीरव मोदी, मेहुल चोक्सी के प्रभाव!

समझा जाता है कि नीरव मोदी, मेहुल चोक्सी और जतिन मेहता के कारनामे और घपले कर विदेश भाग जाने के बाद कोई बैंक अब हीरा उद्योग को पैसे देना नहीं चाहता। इस वजह से हीरा उद्योग से जुड़ी कंपनियों के सामने वित्तीय पूंजी की कमी हो गई है। इस कारण वे विस्तार नहीं कर पा रहे, नई ईकाइयाँ शुरू नहीं कर पा रहे हैं। 
मंदी का आलम यह है कि कई कारखानों से तीन के बदले एक शिफ़्ट में काम करना शुरू कर दिया है, इसके बाद कुछ दूसरों ने काम का समय कम कर दिया। इसके बावजूद काम नहीं है तो कर्मचारियों को निकाला जाने लगा। 
पर्यवेक्षकों का मानना है कि हीरा उद्योग की यह मंदी कोई अलग की मंदी नहीं है, यह पूरी अर्थव्यवस्था में छाई मंदी का ही एक रूप है। हीरा उद्योग में भी माँग और खपत कम हुई है। लोगों के पास पैसे नहीं हों तो हीरा जैसा महँगा शौक कौन पाले भला! अब तो सरकार और उसकी एजंसियाँ भी मानने लगी हैं कि सबकुछ ठीक नहीं है। इसके मद्देनज़र ही वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बीते दिनों कई ख़ास घोषणाएँ की, जिससे आर्थिक मंदी को कम से कम रोका जा सके। इसका नतीजा क्या होगा, यह देखना अभी बाकी है। 
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