देर से ही सही लेकिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान इसराइल-अमेरिका युद्ध को लेकर संसद में और बाहर भी जब कभी भी कुछ कहा है तो वे स्थिति को गंभीर बताते हैं। लेकिन सोमवार को जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, जिनके ऊपर अर्थव्यवस्था के प्रबंधन का असली जिम्मा है, ने संसद में बयान दिया तो उनके कहने का मतलब ठीक वैसा नहीं था जैसा प्रधानमंत्री की चिंता है। उन्होंने अर्थव्यवस्था की स्थिति को मजबूत बताने के साथ ही रुपये की गिरावट को अन्य एशियाई देशों की मुद्राओं की तुलना में कम ही बताया। 
जिस दिन रुपया डॉलर के मुक़ाबले 95 के स्तर को छूकर वापस आया उस दिन ही हमारी वित्त मंत्री 4.1 फीसदी की गिरावट को कुछ ऐसा बता रही थीं कि पश्चिम एशिया संकट कोई चीज नहीं है। उन्होंने उसी दिन शेयर बाजार और सर्राफा बाजार की गिरावट का जिक्र करना भी जरूरी नहीं माना और सरकार द्वारा इस बीच उठाए कदमों की चर्चा भी नहीं की। हम जानते हैं कि सरकार ने पहले तो पेट्रोलियम वितरण में सबसे बड़ी निजी कंपनी को दाम बढ़ाने की छूट दी और फिर कमर्शियल गैस के दाम बढ़ाए। इससे भी आगे बढ़कर उसने विभिन्न करों में कटौती वापस लेकर तेल कंपनियों को लगभग दस रुपये लीटर का अतिरिक्त लाभ लेने की इजाजत दी। पहले यह धन सरकारी खजाने में आता था। बीते वर्षों में इससे सरकार को चालीस लाख करोड़ रुपये मिलने का अनुमान है। यह अभी घटा है, खत्म नहीं हुआ है।

तेल संकट का असर

अब वित्त मंत्री को इन पक्षों की चर्चा करने में क्या दिक्कत थी, इसे समझना तो मुश्किल है लेकिन यह समझने में कोई दिक्कत नहीं है कि अगर पाँच राज्यों में विधान सभा चुनाव न होते तो अब तक तेल और गैस की क़ीमतों में आग लग चुकी होती। और जो प्रधानमंत्री आजकल अर्थव्यवस्था की या मुल्क की हालत की चर्चा करते समय गंभीरता की चादर ओढ़े रहते हैं वही परेशानियों का शोर मचाते रहते। आज वे और उनके समर्थक (जिसमें मीडिया के लोग भी शामिल हैं) लगातार यही सूचना दे रहे हैं कि कहीं कमी नहीं है, सिर्फ विपक्ष अफवाह फैला रहा है। जाने कितने जहाज तेल और गैस लेकर होर्मुज से आगे बढ़ चुके हैं। जबकि ऐसे जहाजों की संख्या पहले की तुलना में काफी घट गई है और ईरान ने भी बहुत मान मनौव्वल के बाद कुछ जहाजों को आने की इजाजत दी। उन पर बीमा का खर्च समेत बाकी क्या बोझ बढ़ा है उसका हिसाब अलग है। इस बीच, हमारी सरकार ने रूस से तेल लेने में जो व्यवहार दिखाया है (और उसमें अमेरिकी दबाव बहुत साफ दिखता है) उससे नाराज रूस अब तेल देना ही बंद कर रहा है। इसलिए सिर्फ तेल वाले पक्ष की ही चर्चा हो तो उस पर वित्त मंत्री को काफी कुछ कहना था।

वे बोलें न बोलें, सामान्य समझ और बाहर दिख रहे दृश्य यह बताते हैं कि सचमुच हाहाकार की स्थिति है। और अगर युद्ध अब जरा भी लंबा खींचा तो अर्थव्यवस्था के पूरे स्वास्थ्य को तो प्रभावित करेगा ही हमारी रसोई और पारिवारिक बजट को चौपट कर देगा।

गैस की कमी ने होटलों-रेस्तरां में मेन्यू बदला है तो कई चीजों के दाम बढ़ गए हैं। कुछ उद्योग तो सीधे प्रभावित हो रहे हैं तो बाकी पर भी असर आएगा ही। निश्चित रूप से सरकार की एजेंसियां अपने काम में कुछ ज्यादा तत्पर हुई हैं लेकिन यह तत्परता देर से शुरू हुई है। जब प्रधानमंत्री युद्ध शुरू होने के दो दिन पहले इसराइल में घूमने फिरने जाते हैं तो बाक़ी लोग कैसे आपात स्थिति की तैयारी कर सकते हैं। जब युद्ध की मार पड़ती है तो इसराइल अपनी स्थिति देखेगा और अमेरिका खाड़ी के अपने चेले चपाटियों की रक्षा करेगा या आपकी चिंता करेगा। और जब ईरान के ऊपर गलत हमले और उसके शासन प्रमुख की हत्या पर आपके मुंह से दो शब्द नहीं निकलते तो वह युद्ध लड़ते हुए आपको कैसे कंधे पर बैठाए घूमेगा। फिर तो आपको अपनी तैयारी और प्रबंधन से ही काम करना होता जो आपने दिखाई नहीं।
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शेयर बाज़ार मे भारी गिरावट

आज चुनावी चिंता से जो चौकसी दिखती है वही कुछ समय पहले से शुरू रहती तो कई मामलों में हम बेहतर स्थिति में होते क्योंकि युद्ध से हमारा नाता बहुत दूर-दूर का ही है और हमने बाद में बेमतलब टांग अड़ाकर अपना नुक़सान कराने वाली स्थिति नहीं बनाई है। लेकिन इस दौरान शेयर बाजार, करेंसी बाजार और सर्राफा बाजार में जिस तरह की हबराहट और बेचैनी दिख रही है उसका काफी कुछ तो हमारा खुद का बनाया हुआ है। जाने कब से जानकार कह रहे हैं कि हमारा शेयर बाजार ओवररेटेड है अर्थात जितना अच्छा हाल कम्पनियों का नहीं है उससे कहीं ज्यादा बढ़िया हाल उनके शेयरों का है। 

जाहिर है इस बनावटी खेल में सरकार और उसकी कर्त्ता-धर्ता संस्थाओं ने भी अपनी भूमिका निभाई है, साझा कोषों (निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की) ने सरकार के निर्देश पर ही बाजार को ऊपर ही ऊपर बनाए रखा है-कुछ खास कंपनियों और समूहों के शेयरों पर खास कृपया बरसती रही है। अब युद्ध का असर तो दुनिया भर के बाजारों पर हुआ है। कायदे से उन बाजारों पर ज्यादा असर आना चाहिए था जिनके देश युद्ध में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उलझे हैं। लेकिन बिना युद्ध में लगे हमारे बाजार गिरावट में सबको मात देने के खेल में जुटे हैं।
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सर्राफा बाजार की हालत भी ख़राब

सर्राफा बाजार सिर्फ और सिर्फ मुनाफाखोरी और काला सफेद का खेल खेलने का मैदान बन गया है। चांदी की सट्टेबाजी की चर्चा ज्यादा रही, लेकिन सरकार ने वायदा बाजार पर भी किसी तरह की सख्ती करके सट्टेबाजी पर अंकुश का प्रयास नहीं किया है। दुर्भाग्य यह है कि सोना चांदी में निवेश का रोग इधर धीरे धीरे वैश्विक बन गया है। आज यह गिरावट भारत में ही नहीं वैश्विक है लेकिन भारत जैसी स्थिति कहीं और नहीं है। यहां तो चांदी आधी कीमत पर आ गई है जबकि बाजार में चांदी की कमी सभी मानते हैं। 
करेंसी बाजार में रुपये को थामने की पहल अब जाकर शुरू हुई है लेकिन तब तक चीजें हाथ से निकल गई हैं। रुपये की गिरावट को जो लोग अर्थव्यवस्था से अलग चीज मानते होंगे उनके अर्थशास्त्र के ज्ञान को नमस्कार करते हुए सिर्फ इतना कहना ज़रूरी है कि जिन क्षेत्रों में अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन अच्छा है और जिन पर अभी तक युद्ध का असर ज़्यादा नहीं दिखता है वे सरकारी प्रबंधन के दायरे से दूर या हाशिये पर हैं। सिर्फ राजकोषीय प्रबंधन में अनुशासन दिखता है जिसका श्रेय सरकार और वित्त मंत्री को दिया जा सकता है। बाकी तो गैस, तेल और फर्टिलाइजर के लिए छापे मारने के पीछे अर्थव्यवस्था की चिंता है या चुनाव की यह समझना कोई मुश्किल नहीं है।