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जल्द ही फूट सकता है शेयर बाज़ार का बुलबुला!

एग्ज़िट पोल के नतीजों से उत्साहित शेयर बाज़ार में ज़बरदस्त उछाल दर्ज किया गया, तो इसकी मुख्य वजह राजनीतिक अस्थिरता से बाहर निकलने का संकेत है। पूँजी बाज़ार को इससे बल मिला कि पिछले कुछ हफ़्तों से चल रही अस्थिरता ख़त्म होने को है, उसे एक स्थायी सरकार बनने की संभावना नज़र आई।

ज़बरदस्त उछाल

एग्ज़िट पोल के नतीजे आने के कुछ घंटों बाद ही सोमवार सुबह जब शेयर बाज़ार खुला तो इसके कारोबार में आश्चर्यजनक ट्रेंड देखा गया। बंबई स्टॉक एक्सचेंज यानी बीएसई के संवेदनशील सूचकांक सेनसेक्स ने 1445.67 अंकों की बढ़त दर्ज की और 39,376.44 अंक तक जा पहुँचा। यह 3.87 प्रतिशत की बढ़ोतरी थी। ऐसी वृद्धि पिछले पाँच साल में कभी नहीं देखी गई। सूचकांक अपने सबसे ऊँचे स्तर के आसपास था। बाद में बाज़ार में थोड़ी सी स्थिरता आई और सेनसेक्स थोड़ा नीचे हुआ, लेकिन बाज़ार बंद होते समय यह 39,352 अंक पर था। यह पिछले सत्र के बंद होते वक़्त से 1421.90 अंक ऊपर था।
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राष्ट्रीय स्टॉक एक्सचेंज में भी ऐसा ही कुछ हुआ। एनएसई सूचकांक निफ़्टी एक झटके में 420.70 अंक ऊपर चढ़ कर 11,827.85 तक जा पहुँचा। थोड़ा सा नीचे गिरा, फिर बढ़ा और कारोबार बंद होते समय यह 11,832.70 अंक पर था। बीएसई अपने सबसे ऊँचे स्तर से 135 अंक नीचे पर बंद हुआ तो निफ़्टी अपने ऐतिहासिक स्तर से सिर्फ़ 28 अंक नीचे था।
शेयर बाज़ार अराजनीतिक रहता है और इसे इससे बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता है कि चुनाव में किस पार्टी की जीत होती है। इसलिए शेयर बाज़ार में दर्ज ज़बरदस्त उछाल को सीधे भारतीय जनता पार्टी की संभावित जीत से जोड़ना ग़लत होगा।

स्थिरता की ज़रूरत

लेकिन एग्ज़िट पोल से यह साफ़ लग रहा था कि किसी एक पार्टी की जीत होगी और केंद्र में स्थायी सरकार बनेगी, जिससे स्थिरता आएगी और बाज़ार भी स्थिर हो जाएगा। पूँजी बाज़ार को स्थिरता की ज़रूरत ज़्यादा होती है।
देश की आर्थिक स्थिति लगातार डँवाडोल रही है, बीते दो साल से यह अधिक साफ़ तौर पर दिख रही थी। एक के बाद एक, तमाम इंडिकेटर यह बता रहे थे कि आर्थिक स्थिति ख़राब हो रही है, अर्थव्यवस्था की रफ़्तार धीमी हो रही है। इसका प्रभाव शेयर बाज़ार पर भी पड़ रहा था। जब यह ख़बर आई थी कि कारों की बिक्री कम हो रही है, लोग चारपहिया गाड़ी कम ख़रीद रहे हैं, तो स्टॉक एक्सचेंज में शेयरों की क़ीमतें गिरीं और इसका सबसे अधिक असर ऑटो सेक्टर पर पड़ा था। इसी तरह दोपहियों की बिक्री कम होने पर इससे जुड़ी कंपनियों के शेयर धड़ाम से गिरे थे। इसी तरह सकल घरेलू उत्पाद बढ़ने की रफ़्तार धीमी होने की ख़बर से भी शेयर बाज़ार गिरा था। हाल यह था कि एक-दो दिन शेयर बाज़ार थोड़ी सी तेज़ दिखाता था कि अगले दिन ही वह फिसल जाता था। थोड़ी तेज़ी दर्ज करता था, ऊँचाई पर पहुँचता था कि क़ीमतें फिर धड़ाम से गिरती थीं, एक तरह का साँप-सीढ़ी का खेल चल रहा था।

लेकिन चुनावों के पहले स्थिति ज़्यादा बुरी थी। शेयर बाजार बहुत नीचे गिरा था। निवेशकों को लग रहा था कि आर्थिक स्थिति तो बुरी है ही, सरकार का रवैया अधिक निराशाजनक है।  

निवेशकों का मानना था कि सरकार बदतर होती जा रही आर्थिक स्थिति को दुरुस्त करने के लिए कारगर कदम उठाने के बजाय इस स्थिति से मुँह चुरा रही है, इसे नकार रही है और यहाँ तक कि आँकड़ों से हेराफेरी कर रही है, ऐसे में भारतीय शेयर बाज़ार सुरक्षित जगह नहीं है।

चिंता बरक़रार

यही वजह है कि अप्रैल-मई में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने ही नहीं, घरेलू संस्थागत निवेशकों ने भी हाथ खींच लिया था। चुनाव के एक हफ़्ता पहले शेयर बाज़ार बुरी स्थिति में था।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। चुनाव के पहले शेयर बाज़ार का गिरना अस्वाभाविक नहीं है, क्योंकि थोड़े समय के लिए ही सही, अस्थिरता तो आती ही है। लेकिन इस बार की विशेष बात यह थी कि चुनाव के लगभग एक महीने पहले ही शेयर बाज़ार गिरे थे, उनमें सुधार नहीं हो रहा था। तात्कालिक कारणों से छोटा-मोटा सुधार होता था और वह उसी तरह अगले सत्र में फिर गिर जाता था।

पर्यवेक्षकों का कहना है कि शेयर बाज़ार की यह तेजी स्थिर नहीं रहेगी, क़ीमतें फिर गिरेंगी। इसकी वजह यह है कि निवेशक सरकार के कामकाज से खुश नहीं हैं, आर्थिक स्थिति को लेकर चिंता बनी हुई है। पूँजी बाज़ार को ऐसा नहीं लगता है कि अगली सरकार आर्थिक स्थिति को एकदम से सुधार देगी।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि आर्थिक स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि अगली सरकार यदि इस पर पूरा ध्यान दे और स्थिति सुधारने की दिशा में काम करे तो भी स्थिति तुरन्त नहीं सुधरेगी। इसकी वजह यह है कि आयात-निर्यात, उत्पादन, खपत, माँग, विदेशी मुद्रा, निवेश, बुनियादी सुविधाओं का विकास, रोज़गार सृजन और दूसरे कई मामलों में देश पीछे जा चुका है।
सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार अर्थव्यवस्था को लेकर इतनी उदासीन है कि लंबे समय तक इसके पास एक अलग वित्त मंत्री तक नहीं था। जानकारों का कहना है कि तमाम फ़ैसले स्वयं प्रधानमंत्री लेते थे, जिन्हें अर्थ का जानकार नहीं माना जाता है। वित्त मंत्री भी अर्थशास्त्री नहीं हैं। कुल मिला कर यह छवि यह बन गई कि सरकार आर्थिक स्थिति को लेकर उदासीन है। इन वजहों से निवेशक दूर-दूर जा चुके हैं। यह स्थिति एक दिन में नहीं बनी है, न ही एक दिन में ठीक हो जाएगी। सरकार किसी की बने, आर्थिक स्थिति को ठीक करने में उसे समय लगेगा, उसका नतीजा आने में और समय लगेगा। निवेशक इस पर चिंतित हैं। वे नई सरकार के आते ही भारतीय बाज़ार में पैसा झोंक दें, इसकी संभावना नहीं है। वे 'देखो और इंतजार करो' की नीति पर ही चलेंगे और यह स्वाभाविक भी है। इसलिए एक-दो सत्र के बाद शेयर बाज़ार फिर फिसले तो अचरज की बात नहीं है।
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