मोदी सरकार ने 7.8% GDP Growth का दावा किया। लेकिन जाने-माने अर्थशास्त्री सुभाष गर्ग ने 7.8% GDP ग्रोथ पर सवाल उठाते हुए 2.6% का आंकड़ा पेश किया। मशहूर अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार ने भी GDP गणना के तरीके, असंगठित क्षेत्र और आर्थिक संकट के असर पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
जीडीपी ग्रोथ की हकीकत क्या है
भारत की अर्थव्यवस्था की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत GDP वृद्धि का आंकड़ा सामने आने के बाद सरकार इसे अर्थव्यवस्था की मजबूती के प्रमाण के तौर पर पेश कर रही है। लेकिन इस आंकड़े ने अर्थशास्त्रियों के बीच एक नई बहस भी छेड़ दी है। पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने GDP के पुराने आंकड़ों में हुए बड़े संशोधन को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं, जबकि अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार ने GDP की गणना की पूरी पद्धति पर ही सवाल खड़े किए हैं। दोनों की आपत्तियों का केंद्र अलग है, लेकिन दोनों यह सवाल जरूर उठाते हैं कि क्या सिर्फ 7.8 प्रतिशत की headline growth देखकर भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर समझी जा सकती है?
पिछले साल का आंकड़ा बदला तो इस साल की वृद्धि कितनी असली?
सुभाष गर्ग का सबसे महत्वपूर्ण तर्क GDP के historical revision को लेकर है। उनके मुताबिक Q1 FY2025-26 के लिए पहले नाममात्र GDP करीब ₹86.05 लाख करोड़ बताई गई थी, लेकिन नई श्रृंखला में उसी तिमाही का आंकड़ा घटकर लगभग ₹80 लाख करोड़ रह गया है। यानी करीब ₹6 लाख करोड़ से ज्यादा का अंतर। इसके साथ ही पिछले साल की पहली तिमाही की वास्तविक GDP वृद्धि दर, जिसे पहले 7.8 प्रतिशत बताया गया था, नई श्रृंखला में संशोधित होकर 6.9 प्रतिशत हो गई है।गर्ग ने पुराने और नए आंकड़ों की तुलना करते हुए करीब 2.6 प्रतिशत की वृद्धि का हिसाब सामने रखा है। उनका तर्क है कि अगर पिछले साल के पुराने नाममात्र GDP आंकड़े और इस साल के मौजूदा आंकड़े को देखा जाए तो 7.8 प्रतिशत की चमकदार वृद्धि की तस्वीर काफी अलग दिखाई देती है। हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है- 2.6 प्रतिशत MoSPI की आधिकारिक real GDP growth rate नहीं है। यह अलग-अलग समय पर जारी GDP estimates यानी अलग-अलग statistical vintages की तुलना से निकाला गया वैकल्पिक हिसाब है। इसलिए इसे सीधे भारत की आधिकारिक वास्तविक GDP वृद्धि दर कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा। लेकिन गर्ग का मूल सवाल- पिछले साल के आंकड़ों में इतना बड़ा संशोधन क्यों हुआ और इसका मौजूदा वृद्धि दर पर क्या असर पड़ा, जरूर गंभीर है।
असली सवाल आंकड़े से ज्यादा आंकड़े बनाने की प्रक्रिया का है
प्रोफेसर अरुण कुमार ने सत्य हिन्दी पर द डेली शो में वरिष्ठ पत्रकार डॉ मुकेश कुमार के साथ बातचीत में और महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उनकी आपत्ति सुभाष गर्ग की ही बात को एक कदम और आगे ले जाती है। प्रोफेसर अरुण कुमार का सवाल सिर्फ यह नहीं है कि GDP कितनी बढ़ी, बल्कि यह है कि GDP की गणना किस तरीके से की जा रही है और क्या यह तरीका भारत की वास्तविक आर्थिक गतिविधियों को पर्याप्त रूप से पकड़ पा रहा है?प्रोफेसर साहब के मुताबिक पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत GDP वृद्धि का आंकड़ा उस समय आया है जब अर्थव्यवस्था को कई तरह के झटकों का सामना करना पड़ा। पश्चिम एशिया संकट के कारण तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई, कई उद्योगों को कच्चे माल और ऊर्जा की समस्या हुई तथा होटल, रेस्तरां और दूसरे कारोबारों पर भी असर पड़ा। उनके अनुसार इन परिस्थितियों में खासकर असंगठित क्षेत्र और छोटे कारोबारों पर पड़े दबाव को आधिकारिक GDP आंकड़ों में पर्याप्त रूप से पकड़ पाना मुश्किल है।
उनका सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में है। छोटे दुकानदार, दिहाड़ी मजदूर, छोटे निर्माता, स्थानीय सेवा प्रदाता और दूसरे अनौपचारिक कारोबार राष्ट्रीय आय के आंकड़ों में उसी तरह सीधे दिखाई नहीं देते जैसे संगठित कंपनियों का उत्पादन और बिक्री दिखाई देती है। अरुण कुमार का तर्क है कि जब अर्थव्यवस्था को अचानक कोई बड़ा झटका लगता है, तो संगठित क्षेत्र के संकेतकों के आधार पर असंगठित क्षेत्र की गतिविधियों का अनुमान लगाना वास्तविक नुकसान को कम करके दिखा सकता है।
GDP की ‘Benchmark-Indicator’ पद्धति पर आपत्ति क्यों है
अरुण कुमार ने विशेष रूप से MoSPI की Benchmark-Indicator methodology पर सवाल उठाया है। इस व्यवस्था में पिछले वित्त वर्ष के विस्तृत अनुमान को विभिन्न उपलब्ध संकेतकों के आधार पर आगे की तिमाहियों के लिए अनुमानित किया जाता है। समस्या तब पैदा हो सकती है जब अर्थव्यवस्था में अचानक कोई बड़ा बदलाव आ जाए और पिछले साल के संकेतक मौजूदा परिस्थितियों को प्रतिबिंबित न करें।
उनका कहना है कि संगठित क्षेत्र से मिलने वाले आंकड़ों को असंगठित क्षेत्र के लिए संकेतक के रूप में इस्तेमाल करने की अपनी सीमाएं हैं। नोटबंदी, GST, NBFC संकट और कोरोना महामारी जैसे उदाहरणों का हवाला देते हुए अरुण कुमार लंबे समय से यह तर्क देते रहे हैं कि आर्थिक झटकों का असर असंगठित क्षेत्र पर कहीं ज्यादा और तेजी से पड़ता है। यदि GDP की गणना में इस अंतर को पर्याप्त रूप से नहीं पकड़ा जाता तो आधिकारिक आंकड़े अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति से बेहतर तस्वीर पेश कर सकते हैं।
7.8% वृद्धि के बीच निवेश और रोजगार का सवालः सरकारी आंकड़ों में Q1 FY2026-27 के दौरान GFCF यानी Gross Fixed Capital Formation में 11.9 प्रतिशत की वृद्धि दिखाई गई है। निजी अंतिम उपभोग व्यय यानी PFCE भी 7.1 प्रतिशत बढ़ा है। सेवा क्षेत्र की वृद्धि करीब 10 प्रतिशत और द्वितीयक क्षेत्र की वृद्धि 8.6 प्रतिशत बताई गई है। लेकिन अरुण कुमार पूछते हैं कि अगर अर्थव्यवस्था में निवेश वास्तव में इतनी तेजी से बढ़ रहा है तो क्षमता उपयोग, निजी निवेश और रोजगार के दूसरे संकेतक उतनी ही मजबूत तस्वीर क्यों नहीं दिखाते?
उनका जोर इस बात पर है कि GDP वृद्धि का मूल्यांकन केवल उत्पादन के आंकड़े से नहीं किया जाना चाहिए। यह भी देखना होगा कि इस वृद्धि से कितने रोजगार पैदा हो रहे हैं, मजदूरी कितनी बढ़ रही है और आम लोगों की आय तथा खपत में वास्तविक सुधार कितना हुआ है।
- यही सवाल पूर्व RBI गवर्नर रघुराम राजन की चिंता से भी जुड़ता है। राजन ने भी सवाल उठाया है कि अगर अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से बढ़ रही है तो पर्याप्त संख्या में अच्छी गुणवत्ता वाली नौकरियां क्यों नहीं पैदा हो रही हैं और निजी निवेश में अपेक्षित तेजी क्यों नहीं दिखाई देती।
7.8% बनाम 2.6%- सच क्या है?
इस विवाद को समझने के लिए दो चीजों को अलग रखना जरूरी है। 7.8 प्रतिशत MoSPI की नई और समान आधार वाली श्रृंखला में Q1 FY2026-27 की आधिकारिक real GDP growth rate है। नई श्रृंखला में Q1 FY2025-26 की real GDP करीब ₹75.46 लाख करोड़ और Q1 FY2026-27 की real GDP करीब ₹81.36 लाख करोड़ है। इन्हीं तुलनीय आंकड़ों के आधार पर 7.8 प्रतिशत की वास्तविक वृद्धि निकलती है। दूसरी तरफ, 2.6 प्रतिशत गर्ग का वैकल्पिक हिसाब है, जो पुराने नाममात्र GDP आंकड़े और मौजूदा नाममात्र GDP के बीच तुलना से निकाला गया है। इसलिए 2.6 प्रतिशत को आधिकारिक real GDP growth कहना गलत होगा। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि गर्ग का सवाल खत्म हो जाता है। उनका मुद्दा है कि जब पिछले साल का आधार ही बड़े पैमाने पर संशोधित किया गया है, तो जनता को बताया जाए कि संशोधन क्यों हुआ, किस क्षेत्र में कितना हुआ और इस बदलाव से विकास दर की तस्वीर कितनी बदली।क्या GDP और आम आदमी की आर्थिक स्थिति एक ही चीज है?
यहीं से GDP के आंकड़ों और जमीनी अर्थव्यवस्था के बीच का अंतर सामने आता है। GDP किसी देश में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के कुल आर्थिक मूल्य को मापती है। लेकिन यह अपने आप में यह नहीं बताती कि आय किसके पास गई, कितने नए रोजगार बने, वास्तविक मजदूरी कितनी बढ़ी, परिवारों की बचत कितनी रही या घरेलू कर्ज कितना बढ़ा। इसलिए अगर GDP 7.8 प्रतिशत बढ़ती है लेकिन रोजगार की गुणवत्ता कमजोर रहती है, छोटे कारोबार दबाव में रहते हैं और परिवारों की वास्तविक क्रय शक्ति नहीं बढ़ती, तो आम नागरिक को उच्च GDP वृद्धि का लाभ महसूस नहीं हो सकता। अरुण कुमार की आपत्ति इसी व्यापक तस्वीर को देखने की है।बहरहाल, GDP की बहस सिर्फ इस सवाल तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि ‘वृद्धि कितनी है?’ असली सवाल यह भी है कि ‘वृद्धि कितनी विश्वसनीय है, उसे कैसे मापा गया है और उसका फायदा किसे मिल रहा है?’ सुभाष गर्ग के आंकड़ों पर सवाल और प्रोफेसर अरुण कुमार की methodology पर आपत्ति मिलकर इसी बड़े सवाल को सामने रखते हैं- क्या 7.8 प्रतिशत की GDP वृद्धि भारत की पूरी आर्थिक कहानी है, या आंकड़ों के पीछे एक दूसरी कहानी भी है जिसे रोजगार, असंगठित क्षेत्र, निवेश, आय और आम लोगों की क्रय शक्ति के आंकड़ों से पढ़ना होगा?