आतंक के साये से भागकर मुस्लिम पत्रकार जम्मू में आए तो उनका घर गिरा दिया गया। एक हिंदू पड़ोसी ने ज़मीन देकर इंसानियत की मिसाल पेश की। तनाव और नफ़रत के माहौल के बीच मानवता की यह कहानी देशभर में चर्चा का विषय बनी।
मुस्लिम पत्रकार का घर गिराया तो हिंदू ने प्लॉट दान किया
जम्मू डेवलपमेंट ऑथोरिटी का शहर के नरवाल इलाक़े में जब बुलडोजर चला तो सिर्फ़ तीन दशक पुराना एक मकान ही नहीं टूटा, एक परिवार का आशियाना ही बिखर गया। सरकार ने इसे 'अवैध कब्ज़ा' करार दिया और देखते-देखते कश्मीरी पत्रकार अरफ़ाज़ अहमद की मेहनत की सारी कमाई मलबे में बदल गई। चुनिंदा कार्रवाई का आरोप लगा। उनके घर ढहाने और उनकी बदहाल स्थिति का वीडियो वायरल हुआ तो राजनीतिक दल आरोप-प्रत्यारोप लगाने लगे। लेकिन इस बीच एक उम्मीद की बड़ी किरण भी नज़र आई। जिस देश में धर्म के नाम पर नफरत की दीवारें ऊँची की जा रही हैं, उसी देश के एक कोने में एक हिन्दू ने इंसानियत की मिसाल कायम कर दी।
जम्मू के नरवाल के कुलदीप शर्मा ने अपने उस मुस्लिम पड़ोसी अरफ़ाज़ अहमद को अपनी बेटी के हाथों 1361 वर्ग फीट का प्लॉट दिलवा दिया ताकि वह इस पर घर बना कर रह सकें। इस घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। इसमें कुलदीप शर्मा कहते सुने जा सकते हैं, "मैं अपनी बेटी की शादी के लिए ये जमीन बचाकर रखी थी... लेकिन आज मेरी बेटी ने खुद कहा, ‘पापा, पहले हमारे कश्मीरी भाई का घर बने।’ अगर ज़रूरत पड़ी तो मैं भीख माँगकर इनका घर बनवाऊँगा... लेकिन अपने कश्मीरी भाई को कभी कमज़ोर नहीं पड़ने दूँगा। ये मेरा भाई है, मेरा कश्मीर है।”
दरअसल, यह पूरा मामला जम्मू शहर के नरवाल इलाक़े का है। गुरुवार सुबह जम्मू डेवलपमेंट अथॉरिटी यानी जेडीए की टीम ने सिंगल स्टोरी मकान को जमींदोज कर दिया। एक वीडियो में 72 साल के गुलाम कादिर डिंग उसके मलबे पर बैठे रोते दिख रहे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में स्थानीय न्यूज पोर्टल में पत्रकार उनके बेटे अरफाज मदद की गुहार लगाते दिखते हैं।
इस वीडियो के वायरल होने के बाद सोशल मीडिया यूज़रों ने लिखा कि इस नफ़रत के समय में शानदार पहल, स्वागत है ऐसे इंसानों का जिसमें आज भी इंसानियत जिंदा है। अशोक कुमार गहलोत नाम के यूज़र ने लिखा, 'देश में धर्म के आधार कर नफरत का अंधेरा बहुत बढ़ रहा है मगर उस अंधेरे को चीरती ऐसी रोशनी एक उम्मीद देती है कि सर्वधर्म समभाव वाला भारत संघ और भाजपा की जहरीली राजनीति को हरा देगा।'
हमारी जमीन पर अतिक्रमण था: JDA
जम्मू डेवलपमेंट ऑथोरिटी यानी जेडीए ने कुछ दिन पहले गुलाम कादिर डिंग के घर को अवैध बताते हुए ढहा दिया। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार जेडीए के वाइस चेयरमैन रूपेश कुमार ने कहा, 'यह रूटीन एक्सरसाइज है। डिंग परिवार को 29 अक्टूबर को पहला नोटिस दिया गया था। जवाब नहीं आया तो 18 नवंबर को दूसरा नोटिस भेजा। खुद गुलाम कादिर ने लिखित में कहा कि नरवाल वाला मकान उनका या उनके परिवार का नहीं है।' उन्होंने यह भी बताया कि डिंग के बेटे अरफाज ने भटिंडी में सरकारी जमीन पर दूसरा मकान बनाया था, जिसे हाल में दूसरी एजेंसी ने तोड़ दिया।
मुख्यमंत्री उमर ने एलजी प्रशासन पर साधा निशाना
डिंग के घर को ढहाए जाने पर राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा, 'राजभवन से तैनात अफसर बिना चुनी हुई सरकार की इजाजत के, बिना संबंधित मंत्री से पूछे बुलडोजर चला रहे हैं। यह मेरी सरकार को बदनाम करने की साजिश है। मैंने विभाग से पूरे जेडीए की जमीन पर सभी अतिक्रमणों की पूरी लिस्ट मांगी है। सिर्फ इसी एक गरीब परिवार को क्यों निशाना बनाया गया?'जम्मू कश्मीर से और ख़बरें
बीजेपी ने उमर को ज़िम्मेदार ठहराया
पूर्व बीजेपी अध्यक्ष रविंदर रैना ने डिंग परिवार के साथ सहानुभूति जताते हुए दावा किया कि तोड़फोड़ के आदेश एलजी प्रशासन से नहीं, बल्कि अब्दुल्ला सरकार से आए थे। रैना परिवार से मिले और बोले, 'हम तो गरीबों को प्रधानमंत्री आवास योजना से घर देते हैं, तोड़ते नहीं।' साथ ही पड़ोसी कुलदीप शर्मा की तारीफ की जिन्होंने अपनी 5 मरले जमीन डिंग परिवार को दी है। रैना ने कहा, 'यही हमारा जम्मू-कश्मीर है- जब मुस्लिम परिवार पर मुसीबत आई तो हिंदू पड़ोसी ने मदद की। मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।'मलबे के पास जमा भीड़ में हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग थे। सबका एक ही सवाल है कि आख़िर जम्मू शहर और आसपास सैकड़ों एकड़ जमीन पर प्रभावशाली लोग कब्जा करके बैठे हैं, उनके घर क्यों नहीं तोड़े जाते? सिर्फ एक गरीब परिवार को ही क्यों चुना गया? क्या उनकी रिपोर्टिंग और सवालों से प्रशासन डर गया?
आतंक से भागकर यहाँ बस थे गुलाम कादिर डिंग
गुलाम कादिर डिंग नरवाल में क़रीब तीन दशक पहले आए थे। वह पहले डोडा के भलेसा इलाक़े में रहते थे। वह वहाँ से 1990 के दशक में आतंक के साये से भागे थे। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार गुलाम कादिर बताते हैं, '1991-92 में डोडा का भलेसा इलाका आतंकवादियों के कब्जे में था। पाकिस्तान से हथियार ट्रेनिंग लेकर लौटे युवक घर-घर जाकर लड़कों को उठा ले जाते थे। मेरा बड़ा बेटा उस वक्त सिर्फ 12 साल का था, लेकिन लंबा-मज़बूत था। डर था कि कहीं उसे भी न ले जाएँ। मैंने उसे साइकिल पर बिठाया, 30 किमी चला, वहां से बस पकड़कर जम्मू आ गए।'वह कहते हैं कि उस वक़्त उनके पास सिर्फ 200-300 रुपये थे। नरवाल मंडी के पास एक कमरा किराए पर लिया। बाद में मकान मालिक ने निकाल दिया तो खुले में रहने लगे। अंग्रेज़ी अख़बार से उन्होंने कहा कि वह चावल खरीद कर पकाते और खाते। बाद में ट्रक ड्राइवर रुकने लगे। फिर रेहड़ी लगाई, लकड़ी का खोखा बनाया, धीरे-धीरे 100-150 रेहड़ियां लग गईं। कोई नहीं रोका। पत्नी और बाकी बच्चे भी भलेसा से आ गए। बाद में एक स्थानीय व्यक्ति से जमीन खरीदकर मकान बना लिया और भलेसा कभी लौटकर नहीं गए। अब इसी मकान को जेडीए ने ढहा दिया।
बहरहाल, अब यह मामला पूरे केंद्र शासित प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया है। एक तरफ गरीबी और आतंक से भागकर बसने वाले परिवार की तकलीफ, दूसरी तरफ प्रशासन और राजनीतिक दलों के बीच जुबानी जंग छिड़ी है। लेकिन इस बीच, डिंग को ज़मीन दान देने की घटना ने बता दिया है कि अभी भी वो भारत ज़िंदा है जहाँ गंगा-जमुनी तहज़ीब साँस लेती है। जहाँ नफरत की आँधी के बीच भी सौहार्द की लौ जल रही है!