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झारखंड : पत्थलगड़ी आंदोलनकारियों ने 7 के सिर कलम किए, मुसीबत में सीएम

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पश्चिमी सिंहभूम ज़िले में 7 ग्रामीणों की हत्या की जाँच के लिए विशेष जाँच दल के गठन का आदेश दे दिया है। इसके साथ ही पत्थलगड़ी आन्दोलन से जुड़े कई तरह के सवाल खड़े हो गए हैं, क्योंकि आरोप लग रहा है कि आन्दोलन से जुड़े लोग इस हत्याकांड से जुड़े हुए हैं।
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पुलिस महानिदेशक के साथ बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने यह फ़ैसला किया। समाचार एजेन्सी एएएनआई के मुताबिक़, सोरेन ने कहा : 

‘सरकार ने किसी को यह हक़ नहीं दिया है कि वह क़ानून अपने हाथ में ले ले। कई तरह की अफ़वाहें उड़ रही हैं, पर सरकार तटस्थ भाव से कड़ी कार्रवाई करेगी।’


हेमंत सोरेन, मुख्यमंत्री, झारखंड

पत्थलगड़ी समर्थकों पर आरोप

पुलिस का कहना है कि मंगलवार को लाठियों और कुल्हाड़ियों से लैस पत्थलगड़ी आन्दोलन समर्थकों ने गाँव के 7 लोगों का अपहरण कर लिया। ये वे लोग थे, जिन्होंने इस आन्दोलन का विरोध किया था। पुलिस महानिदेशक साकेत कुमार सिंह ने कहा है कि अगले दिन गाँव के बाहर इन लोगों के शव मिले।
उन्होंने यह भी कहा कि मंगलवार को गाँव में पत्थलगड़ी आन्दोलन को लेकर एक बैठक हुई, जिसमें दोनों पक्षों में झगड़ा हुआ था। 

इस हत्याकांड से मुख्यमंत्री की मुसीबतें बढ़ेंगी और उन्हें कई सवालों के जवाब देने होंगे। उन्हें राज्य की बागडोर संभाले कुछ हफ़्ते ही हुए हैं, और इतना बड़ा कांड हो गया है।

सवालों के घेरे में सोरेन

इसकी एक वजह यह भी है कि हेमंत सोरेन ने 29 दिसंबर को मुख्यमंत्री पद ग्रहण करने के तुरन्त बाद पत्थलगड़ी आन्दोलन से जुड़े लोगों के ख़िलाफ़ लगे राजद्रोह और दूसरे मुक़दमे वापस लेने का एलान किया था। 

मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जे. पी. नड्डा ने इस मामले की जाँच के लिए 6 लोगों की एक टीम बनाई है, जिसमें 5 आदिवासी सांसद हैं। यह टीम जल्द ही अपनी रिपोर्ट सौंप देगी। यह तो साफ़ है कि पार्टी इसे एक बड़ा मुद्दा बनाएगी।

क्या था पत्थलगड़ी आन्दोलन?

साल 2018 में झारखंड के कुछ इलाक़ों में शुरू हुए आन्दोलन का स्वरूप यह था कि हर गाँव की सीमा पर लोगों ने पत्थर के बड़े टुकड़े गाड़ दिए (इसलिए नाम पड़ा पत्थलगड़ी) और उन पर पंचायत एक्सटेंशन टू शेड्यूल्ड एरियाज़ एक्ट (पीईएसए), 1996 के तहत आदिवासी इलाक़ों की पंचायतों को दिए गए अधिकारों की कुछ बातें लिख दीं। गाँव के लोगों का यह कहना था कि बाहर के लोगों, ख़ास कर केंद्र सरकार के कर्मचारियों को गाँव में नहीं घुसने दिया जाएगा। 

राजधानी राँची से 100 किलोमीटर दूर खूंटी ज़िले के 30 गाँवों के हज़ारों लोग 4 मार्च 2018 को सड़कों पर उतर आए। उन्होंने अपने-अपने गाँवों में पत्थर गाड़ दिए, एलान कर दिया कि वे सरकार को कर नहीं चुकाएंगे, सरकारी स्कूलों में बच्चों को नहीं भेजेंगे, चुनाव में भाग नहीं लेंगे और सरकारी कर्मचारियों को गाँव में नहीं घुसने देंगे। जो ग़ैर-आदिवासी इन गाँवों में घुसेंगे, उन्हें कर चुकाना होगा। यह आन्दोलन 60 गाँवों तक फैल गया और इन गाँवों के लोगों ने पूरे इलाक़े को 'स्वायत्त' घोषित कर दिया।

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