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मोदी-शाह की जोड़ी को खारिज कर देगी झारखंड की जनता?

कुछ घंटों में झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे आ जाएँगे और यह पता चल जाएगा कि लोगों ने किसे क्या जनादेश दिए हैं। लेकिन, एग्ज़िट पोल यह साफ़ बताते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू तो उतार पर है ही, अमित शाह का जुगाड़ या कुशल प्रबंधन भी अब कारगर नहीं हो रहा है। जन भावनाओं को उभार कर वोट बटोरने की रणनीति को झारखंड के मतदाताओं ने खारिज कर दिया है। उन्हें जुमले नहीं काम चाहिए, नारे नहीं विकास चाहिए।

यह बात इसलिए कही जा सकती है कि इंडिया टुडे-एक्सिस माइ इंडिया एग्ज़िट पोल से जो बात उभर कर सामने आती है, वह यह है कि बीजेपी को 22 से 32 सीटें मिलती दिख रही हैं। पिछली सरकार में उसके सहयोगी रहे ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) को 3 से 5 सीटें मिल सकती हैं। पिछली बार बीजेपी को 37 और आजसू को 5 सीटें मिली थीं। कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि जनता बीजेपी को खारिज करने जा रही है।
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ग़ैर-आदिवासी मुख्यमंत्री

इसकी वजह तलाशना कठिन काम नहीं है। बीजेपी ने पिछले चुनाव के तुरन्त बाद ही अपनी हार के बीज बो दिए थे। उसने रघुबर दास को मुख्यमंत्री बनाया था, जो ‘दिकू’ यानी ‘बाहरी’ थे।
झारखंड के लोगों के लिए यह मुद्दा अहम इसलिए था कि अलग राज्य का पूरा आन्दोलन ही दिकुओं यानी बाहरी लोगों के ख़िलाफ़ था, यह अपनी पहचान की लड़ाई थी। लेकिन चुनावी जुगाड़ का बीजेपी का खेल अलग था।
पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने यह मान लिया था कि ग़ैर-आदिवासी को मुख्यमंत्री बना कर वे उनके वोट बटोर लेंगे। मुख्यमंत्री बनने के बाद रघुवर दास ने सबको लेकर चलने की नीति नहीं अपनाई, उन्होंने विरोधियों को कुचलने का रास्ता चुना। वह बेहद अलोकप्रिय मुख्यमंत्री साबित हुए। इस बार वह अपनी ही सीट पर जूझ रहे हैं। पर्यवेक्षकों का कहना है कि उनकी हार की आशंका ज़्यादा है, जीत की संभावना कम।

नहीं चला 370, एनआरसी

यह भी साफ़ है कि लोगों ने जन भावनाओं को उभार कर वोट हथियाने की बीजेपी की रणनीति को खारिज कर दिया है। झारखंड के चुनाव में भी नरेंद्र मोदी ने कश्मीर और नैशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजंस (एनआरसी) के मुद्दों को भुनाने की कोशिश की। उन्हे लगा था कि महाराष्ट्र की तरह जनता इन बातों को सुनेगी। 
खूंटी या राजखरसाँवा के लोगों को इससे अधिक मतलब नहीं है कि कश्मीर की किस धारा को आपने बदल दिया या ख़त्म कर दिया। इसमें भी उनकी अधिक दिलचस्पी नहीं है कि आपने जोरहाट या डिब्रूगढ़ में रहने वाले किसी आदमी की पहचान कर ली है जो घुसपैठिया है और जिसे आप बाहर भेजने की तैयारी कर रहे हैं।

ज़मीन से कटी बीजेपी?

बीजेपी ने जल-ज़मीन-जंगल से जुड़े मुद्दे नहीं उठाए, उसने यह बताने की कोशिश नहीं कि राँची के पास बंद पड़ा कौन सा कारखाना खुल जाएगा या नोआमुंडी के किस खदान में और कितने लोगों को नौकरी मिलेगी। 

बीजेपी का प्रचार अभियान इस कदर ज़मीन से कटा हुआ था कि पार्टी ने वहाँ भी सावरकर की बात की, वहाँ भी उग्र राष्ट्रवाद को परोसने की कोशिश की, जबकि झारखंड के लोगों का मिजाज इससे मेल नहीं खाता है। 

पार्टी ने शेष भारत की तरह झारखंड में भी विभाजनकारी प्रचार अभियान का सहारा लेने की कोशिश की थी। नागरिकता संशोधन क़ानून भी ऐसा कुछ नहीं था, जिससे झारखंड की जनता सीधे जुड़ती हो। कथित रूप से बांग्लादेश से आए लोगों की तादाद झारखंड में नगण्य ही होगी, पर अमित शाह का ज़ोर इसी पर था।

नाराज़ स्थानीय लोग!

जल-ज़मीन-जंगल से कटने को इस तरह भी समझा जा सकता है कि पूरे झारखंड में पिछले साल जब पत्थरगड़ी आन्दोलन चला था, जिसके तहत गाँव के लोगों ने बाहर के लोगों घुसने से मना करते हुए पत्थर गाड़ दिए, तो बीजेपी ने उसका विरोध किया था। इतना ही नहीं, बीजेपी की राज्य सरकार ने उसे बेहरमी से कुचलने की कोशिश की थी। 
पत्थरगड़ी आन्दोलन से बीजेपी बाहर नहीं निकल पाई। उसने लोगों के भावनाओं को सहलाने के बजाय उस पर चोट ही किया। आन्दोलन को देश विरोधी बताने की कोशिश से पार्टी इस बार भी बाज नहीं आई।

नहीं चला हिन्दुत्व?

इसी तरह उग्र हिन्दुत्व को भी लोगों ने सिरे से नकार दिया। न तो सावरकर की वहाँ कोई अपील है न ही वहाँ हिन्दू-मुसलमान विद्वेष का इतिहास रहा है। पर पार्टी का तो पूरा ज़ोर इसी पर था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रचार का आलम यह था कि उन्होंने खुले आम मंच से कहा, ‘ये जो आग लगा रहे हैं, ये जो तसवीरें टीवी पर दिखाई जा रही हैं, उन्हें उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है।’ मोदी ये बातें उस राज्य में कह रहे थे, जहाँ उनके एक पूर्व मंत्री ने गोमांस रखने के शक में हत्या करने वालों के ज़मानत पर छूटने पर मालाओं से लाद दिया था। इस घटना के बाद भी वे मंत्री बने रहे, पार्टी ने उन्हें लोकसभा का टिकट फिर दिया।

सोशल इंजीनियरिंग नहीं?

बीजेपी इस बार अति आत्मविश्वास में सोशल इंजीनियरिंग से भी पीछे रह गई। पिछली बार उसके साथ आजसू था, जिस वजह से पार्टी को आदिवासियों के वोट मिले थे। लेकिन इस बार टिकट बँटवारे पर बात बिगड़ गई, आजसू अलग हो गया। भले ही उसे 3 सीटें ही मिलें, पर आदिवासी वोट तो बीजेपी से बिदक ही गया। 

यदि बीजेपी यह चुनाव वाकई हारती है, जिसकी पूरी संभावना है, तो यह साफ़ संकेत जाएगा कि पार्टी की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। लोग इसके हिन्दुत्व और उग्र राष्ट्रवाद से ऊब चुके हैं, अब बदलाव चाहते हैं।
हरियाणा, महाराष्ट्र और उसके बाद झारखंड में सरकार बनाने में पार्टी की नाकामी का सबसे तात्कालिक और बुरा असर दिल्ली पर पड़ेगा। दिल्ली चुनाव वैसे भी बेहद कठिन है, टक्कर तो है, पर बढ़त आम आदमी पार्टी को हासिल है।  

दिल्ली विधानसभा का कार्यकाल 20 फरवरी, 2020 को ख़त्म हो रहा है। फरवरी के पहले हफ़्ते तक चुनाव कराने ही होंगे। नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में रविवार को एक बड़ी जनसभा को सम्बोधित कर चुनाव प्रचार अभियान का विधिवत उद्घाटन कर दिया। झारखंड चुनाव रणनीति की नाकामी से बीजेपी क्या सबक लेती है, लोगों का ध्यान इस ओर भी होगा। 

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प्रमोद मल्लिक
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