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फोटो साभार: ट्विटर/@_ugra_ ·

कर्नाटक: मंदिर में 'सलाम' की जगह 'संध्या' आरती की सिफ़ारिश क्यों?

हाल में शहरों, सड़कों जैसी चीजों का नाम बदलने का जो चलन उत्तर भारत के बीजेपी शासित प्रदेशों में शुरू हुआ, लगता है कि वह अब दक्षिण भारत में भी पहुँच गया है। कर्नाटक के एक मंदिर में शाम में होने वाली आरती का नाम बदलने की सिफारिश की गई है। यह सिफारिश इसलिए की गई क्योंकि कुछ लोगों ने सदियों पहले से चली आ रही आरती के उस नाम को लेकर आपत्ति की थी। कहा जाता है कि उस आरती के नाम से टीपू सुल्तान का कुछ जुड़ाव था।

यह मामला तमिलनाडु के मंड्या में मेलुकोटे चेलुवनारायण स्वामी मंदिर का है। एक रिपोर्ट के अनुसार कई हिंदू संगठनों के विरोध के बाद जिला प्रशासन ने मेलुकोटे चेलुवनारायण स्वामी मंदिर की 'सलाम आरती' का नाम 'संध्या आरती' करने की सिफारिश की है। सलाम आरती को सदियों से 'देवतीगे सलाम' प्रथा के तौर पर जाना जाता रहा है।

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ऐसा कहा जाता है कि टीपू सुल्तान के शासनकाल के दौरान मंदिर के पुजारियों ने पीठासीन देवता की 'देवतीगे सलाम' के नाम से प्रथा रोजाना शाम 7 बजे शुरू की थी। टीओआई की एक रिपोर्ट के अनुसार कर्नाटक ओपन यूनिवर्सिटी में प्राचीन इतिहास और पुरातत्व विभाग के प्रमुख प्रोफेसर शाल्वा पिले अयंगर ने कहा है कि देवतीगे सलाम प्रथा की शुरुआत हैदर अली और टीपू सुल्तान के शासनकाल के दौरान हुई थी।

एक वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार हाल के दिनों में हिंदू नेताओं और धर्मिक परिषद के सदस्य बी नवीन ने उपायुक्त को एक ज्ञापन सौंपकर नाम बदलने की मांग की थी। उन्होंने नाम इसलिए बदलने की मांग की थी क्योंकि 'हिंदू लिपियों में इसका कोई अर्थ नहीं है'। इसमें खासकर 'सलाम' शब्द पर आपत्ति की गई है क्योंकि यह फारसी शब्द है। और इसी वजह से इसका नाम अब संस्कृत शब्द 'संध्या आरती' करने की मांग की गई है।

रिपोर्ट के अनुसार जिला कलेक्टर ने इस संबंध में पांडवपुरा सहायक आयुक्त और मंदिर कार्यपालक अधिकारी से रिपोर्ट मांगी है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दोनों अधिकारियों ने आरती का नाम बदलने के प्रस्ताव का समर्थन किया। 

कलेक्टर अश्वथी ने राज्य में मंदिर मामलों का प्रबंधन देखने वाले मुजराई विभाग के आयुक्त को पत्र लिखकर नाम बदलकर 'संध्या आरती' करने को कहा। हालाँकि मुजराई विभाग ने अभी इस पर आदेश जारी नहीं किया है।

इससे पहले विश्व हिंदू परिषद यानी विहिप ने भी कर्नाटक के ही एक अन्य मंदिर में ऐसी ही प्रथा का नाम बदलने की मांग की थी। विहिप ने कहा था कि कोल्लूर मूकाम्बिका मंदिर से देवतीगे सलाम को समाप्त किया जाए, क्योंकि यह मंदिर में टीपू सुल्तान को याद करने की एक रस्म है।

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वैसे, टीपू सुल्तान को लेकर बीजेपी बार-बार मुद्दा उठाती रही है और इस वजह से इस पर विवाद भी होता रहा है। राज्य में पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने 2019 में माध्यमिक स्कूलों के इतिहास की किताब से टीपू सुल्तान के पाठ को हटाने की बात की थी तो इस पर काफी विवाद हुआ था। कर्नाटक में सत्ता में आने के तुरंत बाद जुलाई में बीजेपी सरकार ने टीपू सुल्तान की जयंती समारोह को ख़त्म कर दिया था। यह एक वार्षिक सरकारी कार्यक्रम था जिसको सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के दौरान शुरू किया गया था। इसका 2015 से ही बीजेपी विरोध कर रही थी।

टीपू सुल्तान को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का दुश्मन माना जाता था। श्रीरंगपटना में अपने क़िले का बचाव करते समय ब्रिटिश सेना से लड़ाई के दौरान मई, 1799 में उनकी हत्या कर दी गई थी।

कई इतिहासकार टीपू को एक धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक शासक के रूप में देखते हैं जिसने अंग्रेज़ों की ताक़त को चुनौती दी थी। टीपू एक राजा थे और किसी भी मध्ययुगीन राजा की तरह उन्होंने बग़ावत करने वाली प्रजा का मनोबल तोड़ने के लिये अत्याचार किया। मध्य युग के राजाओं का इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है।

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इतिहास में ऐसे ढेरों उदाहरण हैं, जो ये साबित करते हैं कि टीपू सुल्तान ने हिंदुओं की मदद की। उनके मंदिरों का जीर्णोंद्धार करवाया। उसके दरबार में लगभग सारे उच्च अधिकारी हिंदू ब्राह्मण थे। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है- श्रंगेरी के मठ का पुनर्निर्माण। 

1790 के आसपास मराठा सेना ने इस मठ को तहस-नहस कर दिया था। मठ के स्वामी सच्चिदानंद भारती तृतीय ने तब मैसूर के राजा टीपू सुल्तान से मदद की गुहार लगायी थी। दोनों के बीच तक़रीबन तीस चिट्ठियों का आदान-प्रदान हुआ था। ये पत्र आज भी श्रंगेरी मठ के संग्रहालय में पड़े हैं। टीपू ने एक चिट्ठी में स्वामी को लिखा- “जिन लोगों ने इस पवित्र स्थान के साथ पाप किया है उन्हें जल्दी ही अपने कुकर्मों की सजा मिलेगी। गुरुओं के साथ विश्वासघात का नतीजा यह होगा कि उनका पूरा परिवार बर्बाद हो जायेगा।'

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