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चुनाव में अफ़्सपा, देशद्रोह को मुद्दा बनाएगी बीजेपी

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में दो ऐसे वादे किए हैं जिन्हें बीजेपी ने मुद्दा बना लिया है। कांग्रेस ने कहा है कि अगर केंद्र में उसकी सरकार बनती है तो आर्म्ड फ़ोर्सेस स्पेशल पॉवर्स एक्ट 1958 (अफ़स्पा) में संशोधन किया जाएगा और देशद्रोह के मुक़दमे से संबंधित धारा 124 A को ख़त्म किया जाएगा। इस पर केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि कांग्रेस के वादे बेहद ख़तरनाक हैं और ऐसा लगता है कि इस घोषणापत्र को राहुल गाँधी के ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ वाले दोस्तों ने तैयार किया है। 
जेटली के मुताबिक़, कांग्रेस के घोषणापत्र में ऐसे वादे किए गए हैं जो देश को तोड़ने का काम करते हैं। जेटली का कांग्रेस पर पलटवार इन्हीं दो मुद्दों पर रहा। आइए बारी-बारी से समझते हैं कि आख़िर अफ़्सपा और देशद्रोह का क़ानून क्या है।

क्या है अफ़्सपा क़ानून

पूर्वोत्तर के राज्यों में सुरक्षा बलों को विशेष अधिकार देने वाले सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून (अफ़्सपा) को लेकर लंबे समय से विवाद रहा है। 45 साल पहले भारतीय संसद ने अफ़्सपा क़ानून को लागू किया था। 

अफ़्सपा क़ानून तब लगाया जाता है जब किसी इलाक़े को सरकार ‘अशांत इलाक़ा’ यानी ‘डिस्टर्बड एरिया’ घोषित कर देती है। अफ़्सपा क़ानून के लागू होने के बाद ही वहाँ सेना या सशस्त्र बलों को भेजा जाता है। अगर सरकार यह घोषणा कर दे कि अब राज्य के उस इलाक़े में शांति है तो यह क़ानून हट जाता है और जवानों को वापस बुला लिया जाता है। यह क़ानून सुरक्षा बलों और सेना को कुछ विशेष अधिकार देता है। पूर्वोत्तर और देश के कई अन्य इलाक़ों में आतंकवादी गतिविधियों के चलते हमारे कई जवान अपनी जान गँवा चुके हैं और कहा जाता है कि अफ़्सपा क़ानून जवानों को सुरक्षा देता है। 
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यह क़ाननू ख़ासतौर से उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए बनाया गया था। 1958 में इसे असम, मिज़ोरम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड सहित पूरे पूर्वोत्तर भारत में लागू किया गया था, जिससे उस दौरान इन राज्यों में फैली हिंंसा पर क़ाबू पाया जा सके। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर में भी अफ़्सपा लगा हुआ है। बता दें कि पिछले साल अप्रैल में मेघालय से इसे पूरी तरह ख़त्म कर दिया गया था।  
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अफ़्सपा के तहत मिलने वाले अधिकार 

  • अफ़्सपा के तहत सुरक्षा बलों को किसी भी व्यक्ति को बिना किसी वारंट के ग़िरफ़्तार करने का अधिकार है। 
  • गिरफ़्तारी के दौरान सुरक्षा बलों के जवानों के द्वारा उसके ख़िलाफ़ किसी भी तरह के बल का इस्तेमाल किया जा सकता है। 
  • बिना वारंट किसी के घर में घुसकर उसकी तलाशी लेने का अधिकार है। 
  • सुरक्षा बलों को किसी को गोली मारने तक का अधिकार है। 
  • किसी भी वाहन को रोक कर उसकी तलाशी लेने का अधिकार भी सुरक्षा बलों को मिला हुआ है। 

अफ़्सपा को लेकर विवाद 

पिछले कुछ सालों में अफ़्सपा की काफ़ी आलोचना हुई है। अफ़्सपा को लेकर मानवाधिकार, अलगाववादी संगठन और राजनीतिक दल सवाल उठाते रहे हैं। उनका तर्क है कि इस क़ानून से जनता के मौलिक अधिकारों का हनन होता है। अफ़्सपा क़ानून के बारे में कोई भी बात इरोम शर्मिला के ज़िक्र के बिना अधूरी है। इरोम शर्मिला मणिपुर से अफ़्सपा क़ानून को हटाने की माँग को लेकर 2000 से 2016 तक भूख हड़ताल पर रहीं। इरोम महज 28 साल की उम्र में अनशन पर बैठ गई थीं। इरोम ने असम राइफ़ल के जवानों के साथ मुठभेड़ में 10 नागरिकों के मारे जाने के ख़िलाफ़ यह अनशन शुरू किया था। इसके बाद से ही उन्हें नाक में नली लगाकर भोजन दिया जा रहा था।

लेकिन अफ़्सपा के पक्ष में दलील भी दी जाती रही है। कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियाँ होने की संभावना के चलते यह कहा जाता है कि अफ़्सपा क़ानून के बिना आतंकवादी हमले बढ़ जाएँगे। देश के ख़िलाफ़ किसी तरह की साज़िश से या किसी देशद्रोही गतिविधि से निपटने के लिए एक और क़ानून है, जिसे भारतीय दंड संहिता की धारा 124A के तहत राजद्रोह या देशद्रोह के रूप में परिभाषित किया जाता है। धारा 124A के तहत उन लोगों को ग़िरफ़्तार किया जाता है जिन पर देश की एकता या अखंडता को नुक़सान पहुँचाने का आरोप होता है। 

धारा 124A के मुताबिक़, अगर कोई भी शख़्स मौखिक, लिखित या सांकेतिक रूप से सरकार के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने, लोगों को भड़काने की कोशिश करता है या सरकार की अवमानना करता है तो उसे इस धारा के तहत राजद्रोही या देशद्रोही क़रार दिया जाता है।

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फ़रवरी 2016 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कथित रूप से देशद्रोही नारे लगाने के मामले में जब जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद और कुछ अन्य लोगों पर देशद्रोह की धारा लगी तो इसे लेकर चर्चा शुरू हुई। आरोप है कि संसद पर हमले के दोषी अफज़ल गुरु को फाँसी दिए जाने के विरोध में आयोजित हुए एक कार्यक्रम में कथित रूप से ‘देशविरोधी’ नारे लगाए गए थे।
कन्हैया को देशद्रोह के आरोप में ग़िरफ़्तार कर लिया गया और मुक़दमा चला। वह और उनके कई साथी कई दिनों तक जेल में भी रहे। लेकिन हैरानी की बात यह है कि दिल्ली पुलिस क़रीब तीन साल बाद इस मामले में चार्जशीट दायर कर पाई।
दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य को मुख्य आरोपी बनाया गया है। तब बीजेपी ने ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का नारा देकर कई राज्यों में चुनाव के दौरान ‘उग्र राष्ट्रवाद’ के मुद्दे को लेकर वोट बटोरे थे। बता दें कि कन्हैया कुमार इन दिनों बिहार की बेगूसराय सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं।
राजनीति के जानकारों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी इस चुनाव को 'उग्र राष्ट्रवाद' और 'हिंदू कार्ड' के सहारे लड़कर जीतना चाहते हैं। प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के हालिया भाषणों से भी यह बात पूरी तरह साफ़ हो गई है।
बीजेपी की कोशिश है कि वह मोदी सरकार के 5 साल के कार्यकाल में उठे बेरोज़गारी, किसानों की ख़राब हालत, अर्थव्यवस्था की दुखद स्थिति जैसे अहम मुद्दों से जनता का ध्यान हटा दे। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने पार्टी का घोषणापत्र जारी करते वक़्त इस बात को बता दिया कि वह बेरोज़गारी, किसानों की ख़राब हालत जैसे मुद्दों पर मज़बूती से डटे रहेंगे। कुल मिलाकर कांग्रेस की ओर से किए गए इन दोनों वादों को बीजेपी ने मुद्दा बनाना शुरू कर दिया है और वह चुनाव में इसके दम पर ध्रुवीकरण की पूरी कोशिश करेगी। 
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