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बीजेपी को रोकने के लिए सामाजिक न्याय की लड़ाई में कूदने जा रही है कांग्रेस

मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने राज्य में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ा कर 27 प्रतिशत कर दिया है। आदर्श आचार संहिता लागू होने के पहले ही राज्य की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने सरकार के इस अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। इस कदम के बाद कांग्रेस ने एक तरह से साफ़ कर दिया है कि वह ओबीसी मसलों पर भारतीय जनता पार्टी से सीधे टकराने का मन बना चुकी है।

ओबीसी की हुई हक़मारी

एक ओर जहाँ भाजपा ओबीसी के जातीय नेता खड़े कर और जाति के माध्यम से ओबीसी की सांकेतिक राजनीति कर रही है। वहीं कांग्रेस ने ओबीसी नेताओं को सामने करने के साथ ही उन्हें सुविधाएँ देने की राजनीति का नया दौर शुरू कर दिया है।
राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात सहित जिन तमाम राज्यों में ओबीसी की बहुलता है, वहाँ भाजपा ने कांग्रेस को पटकनी देने के लिए सांकेतिक राजनीति अपनाई है। यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश और बिहार में भी भाजपा ने जातीय नेताओं को उभार कर ओबीसी की सांकेतिक राजनीति की है। वहीं ओबीसी की हक़मारी नरेंद्र मोदी के केंद्र में आने के बाद पिछले 5 साल में चरम पर रही है।
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पिछले 5 साल के दौरान यूपीएससी के माध्यम से आईएएस बने सैकड़ों अभ्यर्थियों को क्रीमी लेयर का बताकर उन्हें अधिकारी बनने से रोके जाने का मसला हो, विश्वविद्यालयों में भर्ती में रोस्टर का मसला हो, या मंत्रिमंडल में ओबीसी के प्रतिनिधित्व का मसला हो, भाजपा ने हर जगह ओबीसी को दोयम दर्जे का बनाए रखा है।
उत्तर प्रदेश में भाजपा ने 80 में से 71 लोकसभा सीटों पर जीतने में कामयाबी हासिल की थी, लेकिन उसके बाद भी राज्य से ओबीसी, एससी या एसटी तबके के किसी आदमी को कैबिनेट मंत्री नहीं बनाया गया। साथ ही ग़ैर संवैधानिक 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण भी कर दिया।
सवर्ण जातियों की राजनीति कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण पर समिति बनाकर उसे फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है। मतलब साफ़ है कि फिलहाल कांग्रेस सवर्ण आरक्षण लागू नहीं करने वाली है और वह सवर्ण जातियों की अंधी राजनीति भी नहीं करने जा रही है। भाजपा ने जिस तरह से 72 घंटे के भीतर संविधान के मूल अधिकार में संशोधन कर 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण को मंजूरी दी, वह ऐतिहासिक है। भले ही भाजपा सरकारी कंपनियों को बेचकर और विभागों के आकार छोटे कर सरकारी नौकरियाँ ख़त्म कर रही है, लेकिन सवर्ण आरक्षण का क़दम मतदाताओं को लुभाने की एक कवायद रही है।
वहीं कांग्रेस अभी इस बात की जाँच में लगी है कि 8 लाख रुपये सालाना कमाने वाला ओबीसी किस तरह से मलाईदार तबके का हो जाता है और 8 लाख रुपये से एक रुपये कम पाने वाला सवर्ण ईडब्ल्यूएस यानी आर्थिक रूप से कमज़ोर बन जाता है।
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यह सत्य है कि केंद्र में कांग्रेस ही लंबे समय तक सत्ता में रही है और ओबीसी, एससी और एसटी को उतना प्रतिनिधित्व नहीं मिल सका है, जितना मिलना चाहिए। बदलाव की रफ़्तार सुस्त रहने के कारण उस पर आरोप लगते रहे हैं कि वह वंचित तबके के लिए कुछ नहीं कर सकी। जबकि स्वतंत्रता के बाद हुए बदलावों से इंकार नहीं किया जा सकता, भले ही उसकी रफ़्तार सुस्त कही जा सकती है।
ये हो सकते हैं कांग्रेस के एजेंडे। वहीं कांग्रेस कुछ एजेंडे अपने चुनाव घोषणा पत्र में शामिल कर वंचित तबके के बीच 2019 के चुनाव में उतर सकती है। 1- जातीय जनगणना कराई जाए और आबादी के आधार पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए। देश में इतनी बेरोज़गारी है कि हर वर्ग में योग्य युवा बेरोज़गार भरे पड़े हैं, जिन्हें जातीय गुटबंदी और भर्ती में बेइमानियों के कारण चयन नहीं मिलता।
2- पिछले 5 साल के दौरान नरेंद्र मोदी सरकार संघ लोक सेवा आयोग से चयनित जिन आईएएस को क्रीमी लेयर का बताकर या किसी अन्य वजहों से नियुक्ति नहीं दे रही है, और जिन अत्यंत बुरे हालात वाले पिछड़ों को उच्च न्यायालय में केस हारने के बाद उच्चतम न्यायालय तक में मुकदमें लड़ने पड़ रहे हैं, उन्हें सरकार बनते ही 6 महीने के भीतर मामले निपटाकर नियुक्ति दी जाए।
3- सरकारी स्कूलों, कॉलेजों, मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाई जाए और वहाँ विश्वस्तरीय सुविधाएँ मुहैया कराई जाएँ। ग़रीब अमीर सबको एक समान शिक्षा और स्वास्थ्य का अधिकार मिले। स्वास्थ्य बीमा करके हज़ारों करोड़ रुपये प्राइवेट बीमा कंपनियों को दिए जा रहे हैं, उस पैसे को सरकारी अस्पताल बनाने में लगाया जाए, जिसका लाभ सवर्ण भी उठा सकें।
4-  13 प्वाइंट या 200 प्वाइंट के बजाय बाइनरी रोस्टर लागू किया जाए। पहली सीट सामान्य होगी, रोस्टर की यह व्यवस्था ख़त्म हो। दो सीटें आने पर भी 50.5 प्रतिशत सामान्य, 49.5 प्रतिशत रिज़र्व को एक-एक सीट दी जाए, न कि उन्हें सामान्य रखा जाए। पहले रिज़र्व श्रेणी को देना है, या अनरिजर्व रखना है, उसे लॉट्री से तय किया जाए।
5- किसी भी पद पर सीधी भर्ती में साक्षात्कार की व्यवस्था ख़त्म की जाए। अभी हाल ही में चंडीगढ़ एम्स का मामला सामने आया था, जिसमें पीजी में प्रवेश के लिए लिखित परीक्षा में टॉपर को साक्षात्कार में इतने कम अंक दिये गये कि उसका चयन ही नहीं हो पाया। देश के तमाम इलाकों, विभागों, शिक्षण संस्थानों में इस तरह की बेइमानियाँ चल रही हैं, जिससे प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को मौका नहीं मिल पाता है। इस बेइमानी के शिकार वंचित तबके के लोग हो रहे हैं, जिनकी जाति के लोग या रिश्तेदार साक्षात्कार बोर्ड में नहीं होते हैं।
6- क्रीमी लेयर ख़त्म किया जाए। अगर सरकार और उच्चतम न्यायालय ने यह मान लिया है कि 8 लाख रुपये सालाना से कम कमाने वाला व्यक्ति आर्थिक रूप से कमज़ोर होता है तो ऐसे में 8 लाख रुपये से ऊपर कमाने वाले ओबीसी को क्रीमी लेयर मानना न्याय की हत्या है। इसके अलावा अगर क्रीमी लेयर ख़त्म होता है तो ओबीसी तबके में निजी क्षेत्रों में व अच्छी शिक्षा पाने वाले विद्यार्थियों को सेवा का मौका मिलेगा, जो देशहित में रहेगा।
7- वर्कफ़ोर्स एजेंसी का गठन किया जाए, जो बेरोज़गारों को पंजीकृत कर सरकारी विभागों/केंद्र व राज्य के पीएसयू में ठेके पर काम कराए। इस समय सरकारी विभागों में क्लास 3 और क्लास 4 की नौकरियाँ ठेके पर दे दी गई हैं। गार्ड से लेकर सफाई कर्मी तक की सेवाएँ किसी 6- निजी एजेंसी से ली जा रही हैं। ये निजी एजेंसियाँ सरकार से पैसे लेती हैं और काम करने वाले श्रमिकों को पैसे नहीं देती हैं।  निजी एजेंसियों की लूट को इस तरह भी समझा जा सकता है कि सफदरजंग मेडिकल कॉलेज में जब स्थायी गार्ड रखे जाते थे तो सन 2000 तक सिर्फ़ 56 चौकीदार पूरे मेडिकल कॉलेज की व्यवस्था संभाल लेते थे, लेकिन अब 2,000 से ऊपर गार्ड रखे गए हैं। 
सुरक्षा गार्डों के पैसे सरकार से लिए जाते हैं। इनसे 8 घंटे के बजाय 12 घंटे ड्यूटी कराई जाती है और पूरे पैसे भी नहीं दिए जाते, सिर्फ़ कागज़ों पर कर्मचारी दिखाकर लूट चल रही है।
8-  केंद्र व राज्य पीएसयू में स्किल फ़्यूचर एजेंसी का गठन किया जाए। जिससे ठेके के कर्मचारियों की नियुक्ति एक निश्चित नियम के मुताबिक हो सके और कोई जातीय धाँधली न हो।
9- एनएचएम/एसएसए के लिए डॉक्टरों व अध्यापकों की नियुक्ति चरणबद्ध तरीके से और खुली भर्ती परीक्षा के माध्यम से की जाए। अभी इनमें जातीय भ्रष्टाचार और बेइमानियों की वजह से वंचित तबके के अभ्यर्थी चयनित नहीं हो पाते हैं और जो लोग जनेऊ या जाति की वजह से गलत तरीके से भर्ती कर लिए जाते हैं वो न्यायालयों से स्टे लेकर अपने पद पर सेवानिवृत्ति तक बने रहते हैं। 10- उच्च और उच्चतम न्यायालय में परीक्षा के माध्यम से खुली भर्ती के लिए संविधान संशोधन विधेयक लाया जाए।
11- उपभोक्ता संरक्षण नियम और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स में संशोधन कर सभी बिचौलियों का मुनाफा 50 से 100 प्रतिशत के बीच सीमित किया जाए। अभी यह बिस्कुट से लेकर दवा तक में 50 प्रतिशत से लेकर 2,000 प्रतिशत तक मुनाफा लिया जाता है। किसी उत्पाद का उत्पादन लागत 10 रुपये होता है, कर लगा कर उसका बिक्री मूल्य 30-40 रुपये या उससे ज्यादा हो जाता है। किसी भी सामान, दवा आदि पर उस उत्पाद का फैक्ट्री मूल्य और अधिकतम खुदरा मूल्य दोनों लिखे जाएँ, जिससे पता चल सके कि ग्राहक उस उत्पाद की लागत से कितना ज़्यादा पैसा दे रहा है। इस माध्यम से महँगाई पर काबू पाया जाए।
12- निजी क्षेत्र में अभ्यर्थियों की भर्ती के लिए एक प्रणाली विकसित की जाए। जिससे हर बेरोज़गार को पता चल सके कि किस कंपनी में कितनी रिक्तियाँ हैं। जिसके बाद खुली परीक्षा के माध्यम से सबको मौका दिया जाए। निजी क्षेत्र में भाई भतीजावाद, जुगाड़वाद और सत्ता में रहने वाले लोगों के रिश्तेदारों की भर्तियाँ बंद हों, जो कंपनियों को लाभ देकर अपने रिश्तेदारों की भर्तियाँ कराते हैं।
13- निजी क्षेत्र में बड़ी कंपनियों के बिक्रेता एससी, एसटी, ओबीसी को बनाया जाए, जिससे उन्हें उद्योग धंधों में भागीदारी मिल सके। अब समय आ गया है कि कांग्रेस वंचित तबके के लिए खुलकर खेले। इन विषयों पर ही बड़ी-छोटी सभी जनसभाओं में चर्चा हो।
जातीय, क्षेत्रीय बेइमानियों की वजह से वंचित तबके का बहुत नुकसान हुआ है और क्रोनी कैपिटलिज्म के चरम में पिछले 5 साल में स्थिति और बदतर हुई है।
 कांग्रेस को सामाजिक न्याय के एजेंडे पर उग्र रूप से सामने आकर भाजपा से दो-दो हाथ करने की ज़रूरत है। यह देश हित में भी है और कांग्रेस पार्टी के हित में भी। कांग्रेस इन मसलों को अगर अपने चुनावी घोषणापत्र में शामिल कर आगे बढ़ती है तो निश्चित रूप से यह देश और राजनीति की दिशा बदलने वाला कदम साबित होगा। 
प्रीति सिंह
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