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क्या प्रियंका को अमेठी में राहुल की हार का डर सता रहा है?

पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रभारी महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा को डर है कि इस बार अमेठी में उनकी ग़ैर-मौजूदगी से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की मुश्किलें बढ़ सकती है। लिहाज़ा दो दिन के लिए अमेठी दौरे पर गईंं प्रियंका गाँधी ने बंद कमरे में बूथ लेवल के कार्यकर्ताओं की बैठक बुलाकर उन्हें ख़ास नसीहत दी है। क़रीब 2,000 कार्यकर्ताओं की इस बैठक में प्रियंका गाँधी ने कहा है कि इस बार वह पिछले तीन चुनाव की तरह अमेठी में ज़्यादा वक़्त नहीं दे पाएँगी। लिहाज़ा इस बार राहुल जी को जिताने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह कार्यकर्ताओं के कंधों पर है।

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अमेठी लोकसभा क्षेत्र के मुसाफ़िरख़ाना के ए. एच. इंटर कॉलेज में क़रीब 6 घंटे चली बूथ कार्यकर्ताओं की बैठक में प्रियंका गाँधी ने अमेठी की चुनावी रणनीति पर विस्तार से चर्चा की। इस बैठक में शामिल हुए 1962 बूथ कार्यकर्ताओं से प्रियंका ने ब्लॉकवार मुलाक़ात करके पूरे लोकसभा क्षेत्र के सियासी हालात का जायजा लिया।

यह पहली बार है कि प्रियंका ने सभी ब्लॉक के बूथ कार्यकर्ताओं की एक साथ बैठक ली है। इससे पहले वे हर ब्लॉक में एक-एक दिन जाकर बैठक करती रही हैं।

इस बैठक में शामिल कांग्रेस के एक कार्यकर्ता ने 'सत्य हिंदी' को फ़ोन पर बताया कि बैठक में प्रियंका ने कहा, 'राहुल जी ने मुझे पार्टी में महासचिव बनाकर बड़ी ज़िम्मेदारी दी है। लिहाज़ा इस बार मैं एक दिन में एक ब्लॉक का वक़्त नहीं निकाल पाऊँगी। मुझे प्रचार के लिए देश के दूसरे हिस्सों में भी जाना है। इसलिए इस बार राहुल जी का चुनाव पूरी तरह आप लोगों को ही संभालना है।'

इशारों में स्मृति पर हमला

कांग्रेस के कार्यकर्ता के मुताबिक़ प्रियंका थोड़ा भावुक भी हुईंं और बोलींं, 'बचपन से मैं और राहुल जी यहाँ आ रहे हैं। अमेठी हमारा घर-परिवार है। कुछ लोग यहाँ चुनाव लड़ने आते हैं और दिन भर में  चार घण्टे रहकर लौट जाते हैं। अमेठी की जनता के साथ यह सरकार सौतेला व्यवहार कर रही है। दिल से नहीं राजनीति के कारण ये लोग अमेठी आते हैं।' हालाँकि यह कहते हुए प्रियंका ने किसी का नाम नहीं लिया। लेकिन साफ़ है कि उनका इशारा स्मृति ईरानी की तरफ़ था। ग़ौरतलब है कि स्मृति ईरानी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में यहाँ राहुल को कड़ी टक्कर दी थी। उसके बाद से स्मृति ईरानी लगातार अमेठी का दौरा करती रही हैं। 

दरअसल, बीजेपी राहुल को उनकी इस परंपरागत सीट पर स्मृति ईरानी के सहारे ठीक उसी तरह हराना चाहती है जैसे 1984 में कांग्रेस ने अटल बिहारी वाजपेयी को ग्वालियर सीट पर माधवराव सिंधिया को उनके मुक़ाबले खड़ा करके हराया था।

पिछले लोकसभा चुनाव में स्मृति ईरानी को जिताने के लिए तब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की हैसियत से नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के आख़िरी दिनों में यहाँ बड़ी रैली की थी। हाल ही में चुनाव का एलान होने से पहले भी नरेंद्र मोदी ने अमेठी में बड़ी रैली करके नेहरू-गाँधी परिवार पर ज़ोरदार हमला बोला था। अमेठी में पिछले पाँच साल स्मृति ईरानी की लगातार सक्रियता और पीएम नरेंद्र मोदी की यहाँ रैली करना साफ़ इशारा करता है कि वह हर क़ीमत पर यहाँ राहुल गाँधी को हराना चाहते हैं। इसका अंदेशा कांग्रेस और प्रियंका को बख़ूबी है। इसीलिए प्रियंका ने कार्यकर्ताओं से कहा, 'आप लोगों ने हर बार अपने परिवार को चुना है, इस बार भी आप अपने परिवार को चुनिए। प्रियंका गाँधी ने कार्यकर्ताओं पर भरोसा जताते हुए कहा, 'ये चुनाव आप लड़ते हैं। मुझे आप पर पूरा भरोसा है। इस बार आपको और ताक़त से लड़ना है और राहुल जी को जिताना है।'

प्रियंका संभालती हैं राहुल के प्रचार की कमान

2004 में राहुल ने पहली बार अमेठी से लोकसभा का चुनाव लड़ा था। तभी से प्रियंका गाँधी हफ़्ता-दस दिन अमेठी में रहकर उनके चुनाव प्रचार की कमान संभालती रही हैं और उन्हें जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती रही हैं। अमेठी और रायबरेली में बूथ लेवल तक कार्यकर्ताओं का संगठन बनाने में प्रियंका की बड़ी भूमिका रही है। वहाँ के कार्यकर्ता उनके साथ काफ़ी घुले-मिले हुए हैं। यहाँ के कार्यकर्ताओं के लिए राहुल से ज़्यादा प्रियंका की बात मायने रखती है।

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तीन चुनावों में बीजेपी का जनाधार बढ़ा

दरअसल, प्रियंका का डर निराधार नहीं है। पिछले तीन चुनावों के नतीजों पर नज़र डालें तो साफ़ लगता है कि यहाँ धीरे-धीरे बीजेपी ने अपना जनाधार बढ़ाया है। पिछले चुनाव में जब बीजेपी ने स्मृति ईरानी को राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ मैदान में उतारा था तो शुरू में लगता था कि शायद वह कोई ख़ास असर नहीं दिखा पाएँगी। लेकिन मतदान आते-आते स्मृति ईरानी ने राहुल गाँधी की जड़ें हिला दी थींं। पिछले चुनाव के मुक़ाबले राहुल गाँधी को वोट भी कम मिले थे और उनकी जीत भी कम अंतर से हुई थी। राहुल गाँधी को 4,08651 यानी 46.71 फ़ीसदी वोट मिले थे। वहीं स्मृति ईरानी को 3,00748 यानी 34.38 फ़ीसदी वोट मिले थे। बीएसपी के उम्मीदवार धर्मेंद्र प्रताप सिंह को 57,716 और आम आदमी पार्टी के कुमार विश्वास को 25,527 वोट मिले थे। इस बार आम आदमी पार्टी का उम्मीदवार चुनाव मैदान में नहीं है। लिहाज़ा बीजेपी को लगता है कि पिछले चुनाव में स्मृति ईरानी और राहुल गाँधी के बीच एक लाख वोटों के अंतर को पाटा जा सकता है। बीजेपी यहाँ पूरी ताक़त झोंकने के मंसूबे बना रही है।

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क्या रहा है वोटों का गणित?

साल 2004 में जब राहुल ने पहली बार अमेठी से चुनाव लड़ा था तब उन्हें 3,90,179 यानी कुल 66.18 फ़ीसदी वोट मिले थे। बीएसपी के उम्मीदवार चंद्र प्रकाश मिश्रा 99,326 वोट पाकर दूसरे नंबर पर थे और बीजेपी के राम विलास वेदांती महज़ 55,438 रनों पर सिमट गए थे। इसी तरह 2009 में राहुल 4,64,195 वोट यानी 71.78 फ़ीसदी वोट पाकर जीते थे। तब बीएसपी के उम्मीदवार 93,997 वोट पाकर दूसरे नंबर पर थे और बीजेपी के प्रदीप कुमार सिंह महज़ 37,570 वोटों पर सिमट गए थे। साल 2014 के चुनाव में स्मृति ईरानी ने बीजेपी के हक़ में तीन लाख से ज़्यादा वोट बटोरे और 2009 के मुक़ाबले वोटों के प्रतिशत को 5.81 से बढ़ाकर 34.38 तक ले गईंं। इस बार बीजेपी ने स्मृति ईरानी के सहारे राहुल गाँधी को हराने की ठान रखी है।

प्रियंका फ़िक्रमंद क्यों?

ग़ौरतलब है कि गाँधी-नेहरू परिवार को अमेठी में पहली बार में ही हार का मुँह देखना पड़ा था। साल 1977 में अमेठी से संजय गाँधी अपना पहला ही चुनाव हार गए थे। साल 1998 में बीजेपी ने संजय सिंह को यहाँ सोनिया गाँधी परिवार के बेहद नज़दीकी कैप्टन सतीश शर्मा के ख़िलाफ़ उतारा था और बीजेपी जीत गयी थी। बीजेपी 2019 के लोकसभा चुनाव में इसी तरह का करिश्मा दोहराने की कोशिश कर रही है। बीजेपी की इन्हीं कोशिशों के चलते प्रियंका गाँधी राहुल के जीत को लेकर बेहद फ़िक्रमंद हैं। अगर पिछली बार की तरह इस बार भी स्मृति ईरानी अमेठी में डेरा डाल कर बैठ गईंं तो मतदान से पहले प्रियंका गाँधी को भी दो-चार दिनों के लिए यहाँ आना पड़ सकता है।

यूसुफ़ अंसारी
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