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विकास दुबे का अंत गोली नहीं फाँसी से होना चाहिए था: विवेक तन्खा

उत्तर प्रदेश के गैंगस्टर विकास दुबे के एनकाउंटर पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व महाधिवक्ता और राज्यसभा के सदस्य विवेक तन्खा ने कहा है, ‘उत्तर प्रदेश के मोस्ट वांटेड गैंगस्टर विकास दुबे का अंत हर कोई चाहता था। मगर उसका अंत गोली नहीं फाँसी से होना चाहिए था।’

विकास दुबे के एनकाउंटर की ख़बर आने के कुछ देर बाद तन्खा ने एक ट्वीट किया। ट्वीट में उन्होंने कहा, ‘एनकाउंटर की आशंका कल से ही थी। इसी कारण सुप्रीम कोर्ट में याचिका प्रस्तुत हो चुकी है। यह कस्टडी में मौत का प्रकरण है...’

इस ट्वीट के बाद ‘सत्य हिन्दी’ ने विकास दुबे की उज्जैन में नाटकीय धरपकड़ से लेकर एनकाउंटर से जुड़ी परिस्थितियों को लेकर विवेक तन्खा से बातचीत की। पेश हैं, उनसे हुई बातचीत के मुख्य अंश :-

सवाल: अंततः विकास दुबे का एनकाउंटर हो गया?

विवेक तन्खा: इस बात (विकास के एनकाउंटर) की आशंका पहले से ही थी। उत्तर प्रदेश और भाजपा शासित राज्यों में इस तरह की ‘मुठभेड़ों’ का चलन बढ़ गया है। ऐसा लगने लगा है कि बीजेपी सरकारों का क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम पर से भरोसा उठ गया है। यह बेहद दुःखद है। विकास के एनकाउंटर की आशंका को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी लग चुकी थी।

सवाल: क्या है इस याचिका में?

विवेक तन्खा: याचिका हमने नहीं लगाई। लगाने वाले ने आशंका जता दी थी। आज उस पर सुनवाई होनी है।

सवाल: बीजेपी की सरकारों का क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम से भरोसा उठ गया है, आप कह रहे हैं?

विवेक तन्खा: जी बिलकुल। विकास दुबे का मध्य प्रदेश में सरेंडर अकेला उदाहरण नहीं है। ऐसे उदाहरणों की फेहरिस्त लंबी है। मध्य प्रदेश में जब कमलनाथ जी की सरकार थी। शातिर अपराधियों की धरपकड़ करने में जब सरकार जुटती थी तो सामने आता था कि अपराधी ने गुजरात अथवा भाजपा शासित अन्य राज्य में ख़ुद को पुलिस के हवाले कर दिया है। 

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सवाल: विकास दुबे की मप्र में गिरफ्तारी को कैसे देखते हैं?

विवेक तन्खा: मुस्कुराते हुए, पूरा घटनाक्रम संकेत देता है कि विकास दुबे ‘फैमली स्टेट’ में सरेंडर करना चाहता था। वह मानकर चल रहा होगा मप्र पुलिस उसे कोर्ट में पेश करेगी। ट्रांजिट रिमांड माँगा जायेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मप्र में तमाम कहानी बाद में गढ़ी गईं। अनेक चूकें हुईं। क़ानूनी प्रक्रियाओं का पालन मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की पुलिस एवं प्रशासन ने नहीं किया।

सवाल: क़ानूनी प्रक्रियाओं के पालन से आशय?

विवेक तन्खा: मध्य प्रदेश पुलिस ने विकास की गिरफ्तारी दर्ज नहीं की। केवल हिरासत में लेना दिखाया। यूपी एसटीएफ़ को सौंपे जाने के पूर्व ट्रांजिट रिमांड की प्रक्रिया का पालन भी मप्र-यूपी ने नहीं किया। मजिस्ट्रेट से विधिवत ट्रांजिट रिमांड के बाद ही विकास की सुपुर्दगी यूपी एसटीएफ़ को मप्र पुलिस द्वारा की जाना चाहिए थी। मगर ऐसा नहीं हुआ।

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सवाल: विकास दुबे एनकाउंटर मामले में अब आपकी डिमांड क्या है?

विवेक तन्खा: मामला सीधे-सीधे कस्टडी में मौत का है। सुप्रीम कोर्ट आज इस बारे में आदेश दे सकती है। हरेक देशवासी चाहता है कि दुष्टों का अंत हो। मगर फिर दोहराऊँगा, ‘विकास दुबे का अंत गोली की बजाय फाँसी होना चाहिए था।’ क्योंकि इस तरह के एनकाउंटरों का चलन नहीं रुका तो देश में अराजकता फैल जायेगी। कल पत्रकार, जज, वकील, डाॅक्टर या किसी के भी साथ ऐसा होने लग जायेगा।

सवाल: अंत में, विकास का एनकाउंटर - खादी और ख़ाकी के गठजोड़ को दफ्न करना मानते हैं?

विवेक तन्खा: विकास दुबे का खादी और ख़ाकी के साथ गठजोड़ किसी से छिपा नहीं था। सोशल मीडिया पर यूपी के अनेक आला नेताओं के साथ विकास के फ़ोटो वायरल हुए हैं। थाने का थाना संस्पेंड हुआ है। पहले अपराधी नेताओं की मदद किया करते थे, लेकिन अब अपराधी नेता हो गया है। यही वजह है कि अपराधी से नेता बनने वालों के हौसले बुलंद होते चले जा रहे हैं।

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