सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वराले ने अपने नासिक दौरे के दौरान स्कूलों की स्थिति को लेकर कड़ी टिप्पणी की है। उनका कहना है कि बड़े धार्मिक कामों के लिए हजारों करोड़ रुपये उपलब्ध कराए जा सकते हैं, तो क्या स्कूलों के लिए छोटी रकम भी नहीं दी जा सकती?
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वराले
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने महाराष्ट्र में मराठी माध्यम के स्कूलों की बदहाल स्थिति और शिक्षा के लिए घटते बजट पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि सरकार अगर नासिक कुंभ मेले के लिए तय करीब 32,000 करोड़ रुपये में से सिर्फ 0.1 प्रतिशत यानी लगभग 32 करोड़ रुपये शिक्षा पर खर्च करती, तो 100 से 150 मराठी माध्यम के स्कूलों को बंद होने से बचाया जा सकता था।
लाइव लॉ ने सोमवार 24 अगस्त की अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि जस्टिस वराले ने यह टिप्पणी शनिवार, 22 अगस्त को नासिक जिले के शिरपुर स्थित अपने पुराने स्कूल के दौरे के दौरान एक कार्यक्रम में की। वह स्कूल में आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे। उन्होंने मराठी में संबोधित करते हुए कहा कि बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर सरकार के खर्च से उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में भी उसी गंभीरता से निवेश होना चाहिए।
कुंभ और कॉरिडोर परियोजना के खर्च का दिया उदाहरण
जस्टिस वराले ने कहा कि हाल में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने बताया था कि सरकार कुंभ मेले के बुनियादी ढांचे पर करीब 34,000 करोड़ रुपये खर्च कर रही है, जबकि एक कॉरिडोर परियोजना पर लगभग 11,000 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें इन परियोजनाओं पर खर्च से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए पर्याप्त संसाधन क्यों नहीं उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि कुंभ के लिए आवंटित लगभग 32,000 करोड़ रुपये का केवल 0.1 प्रतिशत, यानी करीब 32 करोड़ रुपये, यदि शिक्षा पर लगाया जाता तो 100 से 150 मराठी स्कूलों को बंद होने से रोका जा सकता था।
आवासीय स्कूलों की हालत पर भी चिंता
सुप्रीम कोर्ट के जज ने महाराष्ट्र के आवासीय स्कूलों की स्थिति पर भी चिंता जताई। उन्होंने हाल की उस घटना का उल्लेख किया जिसमें एक बोर्डिंग स्कूल में जमीन पर सो रही तीन छात्राओं की सांप के काटने से मौत हो गई थी और एक अन्य छात्रा का इलाज चल रहा है। जस्टिस वराले ने कहा कि राज्य की कई आवासीय स्कूलों की स्थिति बेहद खराब है। उनके मुताबिक, बच्चों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
बढ़ती छात्र संख्या के बावजूद शिक्षा का बजट घटा
जस्टिस वराले ने कहा कि राज्य में छात्रों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन शिक्षा पर होने वाला खर्च उनकी बढ़ती जरूरतों के अनुरूप नहीं बढ़ा है। उन्होंने विशेष रूप से शिक्षा के बजटीय आवंटन में गिरावट की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने बताया कि पहले शिक्षा के लिए बजट में 8 से 12 प्रतिशत तक हिस्सेदारी होती थी, लेकिन अब इसमें कमी आई है। उनके मुताबिक, छात्रों की बढ़ती संख्या और बदलती शैक्षणिक जरूरतों को देखते हुए शिक्षा के बजट में कटौती के बजाय वृद्धि की आवश्यकता है।स्कूलों को आधुनिक बनाने की जरूरत
जस्टिस वराले ने कहा कि केवल स्कूलों को चालू रखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी बुनियादी सुविधाओं में व्यापक सुधार भी जरूरी है। उन्होंने प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में मजबूत भवन और संरचनात्मक सुधार, इंटरैक्टिव क्लासरूम, डिजिटल स्क्रीन, शुरुआती स्तर से कंप्यूटर की सुविधा और आधुनिक प्रयोगशालाओं की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि इन सुविधाओं के बिना छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना मुश्किल होगा। बढ़ती छात्र संख्या और तकनीक आधारित शिक्षा की जरूरतों के बीच सरकारी स्कूलों के आधुनिकीकरण को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।जस्टिस वराले की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब महाराष्ट्र सरकार नासिक-त्र्यंबकेश्वर कुंभ मेले के लिए बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा तैयार करने की योजना पर काम कर रही है। महाराष्ट्र सरकार ने केंद्र को कुंभ मेला विकास योजना के तहत 22,425.39 करोड़ रुपये की योजना की जानकारी भी दी है, जबकि अलग-अलग सरकारी बयानों में कुंभ से जुड़े कुल बुनियादी ढांचा खर्च का आंकड़ा इससे अधिक बताया गया है।
जस्टिस वराले की टिप्पणी का मूल सवाल यही है कि बड़े धार्मिक और बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स के लिए हजारों करोड़ रुपये उपलब्ध कराए जा सकते हैं, तो क्या शिक्षा, स्कूलों और बच्चों की सुरक्षा के लिए अपेक्षाकृत छोटी रकम उपलब्ध नहीं कराई जा सकती? उनके मुताबिक, शिक्षा पर निवेश केवल स्कूलों को बचाने का सवाल नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की गुणवत्ता और अवसरों को सुनिश्चित करने का भी सवाल है।