बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) के लिए गुरुवार 15 जनवरी को मतदान है। नतीजे 16 जनवरी को आएंगे। बीएमसी चुनाव केवल एक स्थानीय निकाय चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि यह महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा तय करने वाला एक बड़ा 'पावर गेम' बन गया है। इस चुनाव में दो प्रमुख विचारधाराएं  हिंदुत्व और मराठी अस्मिता आमने-सामने है। 

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और एकनाथ शिंदे की शिवसेना 'हिंदुत्व' के मुद्दे को धार दे रहे हैं, ताकि व्यापक हिंदू वोट बैंक को एकजुट किया जा सके। इसके जवाब में उद्धव ठाकरे (शिवसेना UBT) ने 'मराठी मानुष' और 'मराठी अस्मिता' को अपना मुख्य हथियार बनाया है। उद्धव गुट का तर्क है कि दिल्ली की सत्ता मुंबई के महत्व को कम करने और इसके संसाधनों को लूटने की कोशिश कर रही है। शिवसेना यूबीटी के सीनियर नेता संजय राउत ने तो ऐलान ही कर दिया है कि शिवसेना यूबीटी मुंबई को बीजेपी और अडानी को नहीं लूटने देगी।

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ठाकरे परिवार की साख दांव पर 

बीएमसी दशकों से शिवसेना (अविभाजित) का गढ़ रही है। विभाजन के बाद, उद्धव ठाकरे के लिए यह अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता और 'असली शिवसेना' होने के दावे को साबित करने की लड़ाई है। यदि उद्धव बीएमसी खो देते हैं, तो मुंबई पर उनकी पकड़ पूरी तरह कमजोर हो जाएगी। एक तरह से उनकी महाराष्ट्र राजनीति पर भी असर पड़ेगा। पुराना कद हासिल करने के लिए उद्धव को कड़ा संघर्ष करना पड़ेगा। हालांकि उन्होंने अपने चचेरे भाई राज ठाकरे से अब हाथ मिला लिया है और उससे चुनाव पर खासा असर पड़ने जा रहा है।

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भाजपा की रणनीति और हिन्दुत्व का एजेंडा

भाजपा लंबे समय से मुंबई पर सीधे नियंत्रण का प्रयास कर रही है। वह विकास और 'डबल इंजन सरकार' के फायदे गिनाकर वोट मांग रही है, लेकिन उसका गुप्त एजेंडा हिंदुत्व के नाम पर शिवसेना के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाना है। हालिया विवादों (जैसे उर्दू में चुनाव प्रचार के आरोप) ने ध्रुवीकरण को और बढ़ावा दिया है। शिंदे गुट और भाजपा, उद्धव पर 'हिंदुत्व' से समझौता करने का आरोप लगा रहे हैं, जबकि उद्धव गुट इसे मुंबई की बहुसांस्कृतिक पहचान और मराठी भाषी लोगों के अधिकारों की रक्षा की लड़ाई बता रहा है।

महायुति की एकजुटता में दरार

गठबंधन का गणित

महा विकास अघाड़ी (MVA) और महायुति के बीच यह सीधी टक्कर है। लेकिन कई सीटों पर फ्रेंडली भी लड़े रहे हैं। यही स्थिति कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन की भी है। जो अब नाम के लिए बचा है। कांग्रेस और उद्धव की पार्टी अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। एनसीपी के शरद पवार ने भी अपने भतीजे अजित पवार से हाथ मिला लिया है। वंचित बहुजन अघाड़ी ने कांग्रेस से समझौता कर लिया है। गठबंधन के नज़रिए से यह चुनाव अब खासा अहम हो गया है। जैसे महायुति से बीजेपी और अजित पवार बाहर आ गए हैं। इसी तरह एमवीए से उद्ध ठाकरे, शरद पवार भी बाहर आ गए हैं।
यह चुनाव मुंबई के संवेदनशील मुद्दों पर केंद्रित है। अगर मराठी अस्मिता का भावनात्मक मुद्दा हावी हुआ, तो ठाकरे गठबंधन को फायदा हो सकता है। वहीं, BJP की संगठन क्षमता, केंद्र की ताकत, सरकारी संसाधन और हिंदुत्व का वोट बैंक उसे मजबूत बनाता है। संजय राउत की टिप्पणी से इस चुनाव को समझा जा सकता है। उनका कहना है- ठाकरे परिवार की 'मुंबई बंद' करने की ताकत अभी भी बरकरार है। 
BJP 'आउटसाइडर' vs 'लोकल' की बहस को पलटकर विकास और एकता पर फोकस कर रही है। बीजेपी को ठाकरे परिवार आउटसाइडर कह रहा है। बीजेपी को लेकर यह प्रचार जबरदस्त है कि बीजेपी का फोकस कभी मुंबई नहीं रहा, उसका फोकस महाराष्ट्र है। इसलिए वो जीतने के बावजूद मुंबई पर ध्यान नहीं देगी। तमिलनाडु बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष अन्नामलाई ने तो कह ही दिया है कि मुंबई महाराष्ट्र का हिस्सा नहीं है। हालांकि बीजेपी ने उनके बयान से फौरन दूरी बना ली और यह भी कहा कि वो हिन्दी में बोले हैं तो उनकी बात का गलत मतलब निकाला जा रहा है।

गौतम अडानी (बाएं) और उद्धव ठाकरे (दाएं)

बीएमसी चुनाव में क्या अडानी कोई मुद्दा है

बीएमसी चुनाव 2026 में अडानी समूह एक प्रमुख विवादास्पद मुद्दा बन गया है, खासकर धारावी पुनर्विकास परियोजना के बहाने। शिवसेना (यूबीटी) और एमएनएस के ठाकरे परिवार ने इसे चुनावी हथियार बनाया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि केंद्र और महायुति सरकार की नीतियों से अडानी ग्रुप को तेजी से फायदा हुआ है, जिससे मुंबई की जमीन और संसाधन एक कॉर्पोरेट घराने के हाथों में जा रहे हैं।
धारावी, एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती, का पुनर्विकास प्रोजेक्ट अडानी ग्रुप को सौंपा गया है। शिवसेना यूबीटी ने लगातार हमला बोला है कि यह परियोजना मुंबईकरों, खासकर गरीब और मराठी माणूस की जमीन छीन रही है। उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे ने कहा है कि अडानी को न सिर्फ धारावी, बल्कि आसपास की सैकड़ों एकड़ जमीन और मुंबई में अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स दिए गए हैं। वे इसे "मुंबई को अडानी को सौंपने" की साजिश बताते हैं।
राज ठाकरे ने शिवाजी पार्क की संयुक्त रैली में मैप्स और ग्राफिक्स दिखाकर दावा किया कि 2014 के बाद अडानी का बिजनेस फूट-फूटकर बढ़ा है, जबकि पहले ऐसा नहीं था। उन्होंने इसे मोदी सरकार की पक्षपाती नीतियों से जोड़ा और कहा कि एक व्यक्ति की ताकत से मुंबई का भविष्य खतरे में है। ठाकरे ब्रदर्स ने वादा किया है कि अगर वे सत्ता में आए तो धारावी की जमीन अडानी से वापस ली जाएगी और स्थानीय लोगों के हित में इस्तेमाल होगी।
यह मुद्दा मराठी अस्मिता से जुड़कर चुनाव को भावनात्मक बना रहा है। महायुति (बीजेपी-शिंदे गुट) ने जवाब में कहा है कि अडानी का विकास राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा है और धारावी में हर योग्य व्यक्ति को 350 वर्ग फुट का घर मिलेगा। लेकिन ठाकरे गुट का फोकस "मुंबई बचाओ, अडानी से बचाओ" पर है, जो BMC चुनाव में मराठी वोटरों को लामबंद करने की कोशिश है।
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बहरहाल, 2026 का बीएमसी चुनाव इस बात का फैसला करेगा कि मुंबई की आत्मा पर किसका नियंत्रण होगा। क्या मुंबई अपने पारंपरिक 'मराठी' जड़ों की ओर लौटेगी या फिर राष्ट्रीय स्तर के 'हिंदुत्व' की लहर में समा जाएगी? यह मुकाबला विकास के दावों से कहीं अधिक प्रतीकों और पहचान की राजनीति पर टिका हुआ है।