बॉम्बे हाईकोर्ट ने बाल गृहों के लिए फंड नहीं देने पर महाराष्ट्र सरकार को फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि जब सरकार गरीब महिलाओं को लाडकी बहिन योजना समेत अन्य योजनाओं के ज़रिए आर्थिक मदद दे रही है, तो बच्चों की देखभाल करने वाले बाल गृहों को बिना किसी ठोस वजह के पैसे देने से मना नहीं कर सकती और न ही देरी कर सकती है। कोर्ट ने राज्य सरकार को 6 महीने के अंदर एक साफ़ नीति बनाने का आदेश दिया है, जिससे जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत NGO वाले स्वैच्छिक संगठनों द्वारा चलाए जा रहे बाल गृहों के योग्य कर्मचारियों को सैलरी मिल सके।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस किशोर सी. सांत और जस्टिस सुशील एम. घोडेस्वार की बेंच ने फ़ैसले में साफ लिखा, 'राज्य सरकार को बच्चों की भलाई, शिक्षा और पुनर्वास को प्राथमिकता देनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो जुवेनाइल जस्टिस क़ानून का पूरा मक़सद ही बेकार हो जाएगा और समाज को बड़ा नुकसान होगा।' कोर्ट ने जोर देकर कहा कि संसाधनों का बंटवारा आर्टिकल 14 के तहत उचित और तर्कसंगत होना चाहिए। बच्चों की सुरक्षा और विकास के लिए राज्य की ज़िम्मेदारी बहुत बड़ी है।
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कोर्ट ने दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला का भी हवाला दिया, 'हमारे बच्चे वह चट्टान हैं, जिस पर हमारा भविष्य बनेगा। वे राष्ट्र की सबसे बड़ी संपत्ति हैं। सुरक्षा और संरक्षण खुद-ब-खुद नहीं होती, यह सामूहिक सहमति और सार्वजनिक निवेश का नतीजा होती है। हम समाज के सबसे कमजोर नागरिक, अपने बच्चों को हिंसा और डर से मुक्त जीवन देने के लिए बाध्य हैं।'

बाल गृह के सामने क्या दिक्कतें?

यह फ़ैसला कई याचिकाओं पर आया है। ये याचिकाएं उन एनजीओ के कर्मचारियों ने दाखिल की थीं जो सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट और महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के तहत बाल गृह चला रहे हैं। इन कर्मचारियों में सुपरिंटेंडेंट, काउंसलर, क्लर्क, देखभाल करने वाले और रसोइया आदि शामिल हैं। इन कर्मचारियों ने कोर्ट से गुहार लगाई कि सरकार उन्हें सरकारी कर्मचारियों के बराबर सैलरी दे। उन्होंने कहा कि 2005 में हाईकोर्ट के एक फ़ैसले में भी इसी तरह के कर्मचारियों को समान वेतनमान देने का आदेश दिया गया था, लेकिन बाद में सरकार ने सिर्फ कुछ ही संस्थाओं को मदद दी और बाकियों को नजरअंदाज कर दिया।

सरकार का तर्क

महाराष्ट्र सरकार ने कोर्ट में कहा कि कई संस्थाओं में अचानक जाँच में पता चला कि वहाँ बच्चे और स्टाफ़ ही नहीं हैं। संस्थाएं बंद पड़ी हैं। सिर्फ मान्यता मिलने से ही सैलरी ग्रांट नहीं मिल सकती। 

कोर्ट ने सरकार की इस दलील पर नाराजगी जताई कि सिर्फ़ मान्यता मिलने से ही सैलरी ग्रांट नहीं मिल सकती है। अदालत ने कहा कि पहले दिए गए निर्देशों के बावजूद सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं ले रही है।

कोर्ट का अंतिम आदेश

  • सरकार 6 महीने में बाल गृहों के लिए सैलरी ग्रांट की नीति बनाए।
  • हर जिले में कम से कम एक अच्छे बाल गृह को चुने, जहां अच्छी सुविधाएं, इंफ्रास्ट्रक्चर और योग्य स्टाफ हो।
  • ऐसे बाल गृहों को नियमित आर्थिक मदद दी जाए।
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क्यों है यह फ़ैसला अहम?

बाल गृहों में अनाथ, बेसहारा, दुर्व्यवहार झेल चुके या जरूरतमंद बच्चे रहते हैं। इन बच्चों की देखभाल, शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य की जिम्मेदारी सरकार और एनजीओ दोनों की है। कोर्ट ने कहा कि अगर इन बच्चों की उपेक्षा हुई तो पूरा समाज प्रभावित होगा। यह फैसला उन हजारों कर्मचारियों के लिए राहत भरा हो सकता है जो सालों से कम वेतन या बिना नियमित सैलरी के बच्चों की सेवा कर रहे हैं। कोर्ट ने उम्मीद जताई है कि महाराष्ट्र सरकार इस मुद्दे को प्राथमिकता देकर जल्दी सकारात्मक कदम उठाएगी।