महाराष्ट्र निकाय और बीएमसी चुनाव में बीजेपी की प्रचंड जीत हुई है। लेकिन इस जीत का हीरो कौन है, विश्लेषक देवेंद्र फडणवीस को श्रेय दे रहे हैं। यह ऐसा चुनाव था जो पीएम मोदी के नाम पर नहीं लड़ा गया।
महाराष्ट्र निकाय और बीएमसी चुनाव में प्रचंड जीत ने देवेंद्र फडणवीस का कद बढ़ा दिया है
बीएमसी और महाराष्ट्र के 28 नगर निगम चुनावों में भाजपा की जीत का सारा श्रेय मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को दिया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फडणवीस ने जिस तरह से इस चुनाव की माइक्रो-प्लानिंग की उसने विपक्ष की राजनीति को चित कर दिया। 30 साल बाद मुंबई में ठाकरे परिवार का महत्व घटना, फडणवीस की रणनीतिक जीत मानी जा रही है। हालांकि बीजेपी के बाद ठाकरे परिवार की पार्टियां (शिवसेना यूबीटी-मनसे) दूसरे नंबर पर हैं। लेकिन चर्चा मैदान जीतने वाले की होती है।
महाराष्ट्र निकाय चुनाव की तस्वीर जैसे जैसे साफ होती जा रही है, सोशल मीडिया पर फडणवीस को लेकर ट्वीट से लेकर कॉर्टून और मीम बनाने की बाढ़ आई हुई है। कोई उनको बीजेपी के नए चाणक्य के रूप में पेश कर रहा है तो कोई उन्हें महाराष्ट्र के राजा के रूप में मुकुट पहनाकर पेश कर रहा है।
पार्टियों में 'विभाजन' भाजपा के लिए बना 'वरदान'
महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना और एनसीपी (NCP) का विभाजन इस चुनाव का सबसे निर्णायक मोड़ है। शिवसेना और एनसीपी को दो-फाड़ करने के पीछे फडणवीस की 'चाणक्य नीति' को ही जिम्मेदार माना जाता है। एकनाथ शिंदे (शिवसेना) और अजित पवार (NCP) का भाजपा के साथ आना 'महायुति' के लिए गेम-चेंजर साबित हुआ। इससे विपक्षी वोट बैंक बुरी तरह बंट गया, जिसका सीधा फायदा भाजपा को सीटों के रूप में मिला। हालांकि ये सब तो फडणवीस ने विधानसभा में बीजेपी की सत्ता के लिए किया था। लेकिन उसका असर बीएमसी और निकाय चुनाव तक महसूस किया जा रहा है।फडणवीस ने इस चुनाव में राष्ट्रीय नेताओं (मोदी, शाह, योगी) पर निर्भर नहीं रहकर स्थानीय संगठन और नेताओं पर फोकस किया। मुंबई भाजपा अध्यक्ष अमीत सातम जैसे नेताओं ने ग्राउंड कनेक्ट बनाया, जिसे 'लाइटवेट छोटा रीचार्ज' कहकर ठाकरे बंधुओं ने मजाक उड़ाया, लेकिन नतीजों ने जवाब दिया। इस चुनाव में जिला स्तर के भाजपा नेता मुख्यमंत्री फडणवीस से महत्व पाकर जोरशोर से जुटे हुए थे।
शिवसेना और एनसीपी के विभाजन का फायदा बीएमसी में भी स्पष्ट है। शिंदे गुट ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, जिससे उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की पार्टियों को बड़ा झटका लगा। फडणवीस ने चुनाव से पहले घोषणा की कि मुंबई का अगला मेयर 'माराठी हिंदू' होगा, जो हिंदुत्व और क्षेत्रीय भावनाओं को जोड़ने वाली रणनीति का हिस्सा था। इससे गैर-मराठी वोटरों, खासकर हिंदी भाषी प्रवासियों का ध्रुवीकरण हुआ, जो भाजपा का मजबूत आधार हैं। राज ठाकरे ने जब हिन्दी और उत्तर भारतीयों को धमकाया तो उसका फायदा भी बीजेपी को ही मिला।
'ठाकरे भाइयों' का साथ आना: देर से उठाया गया कदम?
चुनाव से ठीक पहले उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के एक साथ आने की खबरों ने हलचल तो मचाई, लेकिन नतीजों से साफ है कि यह गठबंधन मतदाताओं को भरोसा दिलाने में बहुत देर कर चुका था। एकनाथ शिंदे ने खुद को 'असली शिवसेना' के रूप में पेश किया और भाजपा-आरएसएस काडर के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। उद्धव और राज ठाकरे की पार्टी के मराठी वोट बैंक में शिंदे ने बड़ी सेंध लगा दी, जिससे 'ठाकरे ब्रांड' का जादू इस बार फीका पड़ गया। लेकिन इसका फायदा भी बीजेपी को मिला। यह रणनीति भी फडणवीस की ही थी। उन्होंने शिंदे को ज्यादा सीटें भी नहीं दीं लेकिन उन क्षेत्रों में उसे आगे रखा, जहां उद्धव और राज ठाकरे का प्रभाव है।कांग्रेस की शर्त और विपक्ष की कमजोरी
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि विपक्ष की एकजुटता न होना भाजपा की राह आसान कर गया। शिवसेना यूबीटी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने बीएमसी और बाकी नगर निगमों में कांग्रेस से गठबंधन की पेशकश की थी। लेकिन कांग्रेस ने स्पष्ट शर्त रख दी कि अगर उद्धव ठाकरे अपने चचेरे भाई की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के साथ गठबंधन करते हैं, तो वह 'शिवसेना UBT' के साथ गठबंधन नहीं करेगी। दूसरी तरफ इंडिया गठबंधन से एनसीपी शरद पवार भी बाहर चले गए और उन्होंने अपने भतीजे अजित पवार की पार्टी से समझौता कर लिया। कांग्रेस ने वंचित बहुजन अघाड़ी (वीबीए) से समझौता किया लेकिन नतीजे बता रहे हैं कि कांग्रेस को दलित वोटों का कोई फायदा नहीं हुआ। इस आपसी खींचतान के कारण 'महाविकास अघाड़ी' (MVA) का स्वरूप बिगड़ गया। अगर कांग्रेस और शिवसेना UBT मिलकर लड़ते, तो भाजपा-शिंदे गठबंधन को कड़ी टक्कर मिल सकती थी। अब स्थिति यह है कि उद्धव और राज ठाकरे की पार्टियां दूसरे नंबर पर हैं। एकनाथ शिंदे की पार्टी तीसरे नंबर पर है। कांग्रेस कहीं नहीं है। पवार परिवार को भी कुछ हासिल नहीं हुआ।ये चुनाव महाराष्ट्र में 'विकास बनाम वंशवाद' की लड़ाई साबित हुए। फडणवीस ने ठाकरे परिवार के वर्चस्व को चुनौती देकर भाजपा को 'किंगमेकर' बना दिया। मुंबई का मेयर महायुति से होगा, जो राज्य विधानसभा चुनावों (2029) के लिए टोन सेट करेगा। ठाकरे गुट के लिए यह आत्मचिंतन का समय है, जबकि कांग्रेस को गठबंधन रणनीति पर पुनर्विचार की जरूरत। कुल मिलाकर, महाराष्ट्र की राजनीति अब फडणवीस-केंद्रित हो रही है, जहां हिंदुत्व, विकास और रणनीतिक विभाजन जीत की कुंजी हैं।