उत्तराखंड, गुजरात, असम में यूसीसी लाए जाने के बाद अब महाराष्ट्र में इसको लाने की तैयारी हो गई है। सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई के नेतृत्व में कमेटी बनाई गई है। इन्होंने उत्तराखंड से लेकर बंगाल तक की कमेटी का नेतृत्व किया। पढ़िए कौन हैं रजना देसाई।
देवेंद्र फडणवीस और जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई
उत्तराखंड, गुजरात और असम के बाद अब महाराष्ट्र की भी बीजेपी सरकार ने राज्य में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी लाने की तैयारी शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने घोषणा की कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में 7 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। यह समिति राज्य के लिए यूसीसी का मसौदा तैयार करेगी और छह महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी। सरकार का लक्ष्य है कि समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार विधेयक को नागपुर में होने वाले शीतकालीन विधानसभा सत्र में पेश किया जाए।
फडणवीस ने जिन जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई का नाम यूसीसी कमेटी का नेतृत्व करने के लिए घोषित किया है, उनका नाम कुछ हफ्ते पहले पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भी राज्य में यूसीसी लाने के लिए घोषित किया था। अधिकारी ने कहा कि अगस्त महीने में विधानसभा सत्र में समान नागरिक संहिता बिल पेश होगा। कानून का मसौदा तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में कमेटी बनाई है। रंजना देसाई ने ही देश में सबसे पहली बार उत्तराखंड में लाए गए यूसीसी के लिए बनी कमेटी का नेतृत्व किया था।
महाराष्ट्र की समिति में कौन-कौन शामिल?
जस्टिस रंजना देसाई की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय समिति में कई वरिष्ठ कानूनी और प्रशासनिक विशेषज्ञ शामिल किए गए हैं। अध्यक्ष के रूप में सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई के अलावा बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर.सी. चव्हाण, बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एस.जी. मेहरे, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य सचिव डी.के. जैन, पूर्व एडवोकेट जनरल और वरिष्ठ अधिवक्ता बीरेंद्र सराफ, संवैधानिक विशेषज्ञ एवं पद्मश्री सम्मानित रमेश पतंगे और शिक्षाविद एवं सामाजिक कार्यकर्ता सुवर्णा रावल समिति के सदस्य हैं।
छह महीने में रिपोर्ट देगी समिति
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने विधानसभा में बताया कि समिति को छह महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए हैं। समिति कानूनी प्रभाव, संवैधानिक पहलू, सामाजिक प्रभाव, प्रशासनिक व्यवस्था, राज्य में UCC लागू करने का व्यावहारिक ढांचा जैसे पहलुओं का अध्ययन करेगी। रिपोर्ट मिलने के बाद सरकार विधेयक का अंतिम मसौदा तैयार करेगी।
उत्तराखंड में जस्टिस देसाई की भूमिका
जस्टिस रंजना देसाई इससे पहले उत्तराखंड सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति की भी अध्यक्ष रह चुकी हैं। उसी समिति ने उत्तराखंड के लिए समान नागरिक संहिता का मसौदा तैयार किया था, जिसके आधार पर राज्य ने देश का पहला व्यापक यूसीसी क़ानून लागू किया।
महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि उत्तराखंड में जस्टिस देसाई के अनुभव को देखते हुए ही उन्हें यह नई जिम्मेदारी सौंपी गई है।
कई पद संभाल चुकी हैं जस्टिस देसाई
2014 में सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त होने के बाद जस्टिस रंजना देसाई कई अहम संवैधानिक संस्थाओं और आयोगों का नेतृत्व कर चुकी हैं। उन्होंने जम्मू-कश्मीर परिसीमन आयोग की अध्यक्षता की थी। वह लोकपाल सर्च कमेटी की प्रमुख रहीं। वह फिलहाल, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की अध्यक्ष हैं। आठवें केंद्रीय वेतन आयोग की अध्यक्ष भी हैं।
जस्टिस देसाई 26/11 मुंबई आतंकी हमले के दोषी अजमल कसाब की फांसी की सजा बरकरार रखने वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ का भी हिस्सा रही थीं।पश्चिम बंगाल में भी UCC की तैयारी
बीजेपी शासित राज्यों में समान नागरिक संहिता को लेकर लगातार पहल की जा रही है। पश्चिम बंगाल में भी बीजेपी सरकार बनने के बाद यूसीसी लागू करने की तैयारी की घोषणा की गई है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा है कि राज्य सरकार ने यूसीसी का प्रारूप तैयार कर लिया है। इसे पहले कैबिनेट की मंजूरी के लिए रखा जाएगा और उसके बाद विधानसभा में विधेयक पेश किया जाएगा।
किन राज्यों में पहले से लागू है UCC?
गोवा देश का एकमात्र राज्य है जहां पुर्तगाली सिविल कोड के आधार पर लंबे समय से समान नागरिक संहिता जैसी व्यवस्था लागू है। इसके अलावा आज़ाद भारत में उत्तराखंड यूसीसी लागू करने वाला पहला राज्य बना। राज्य की बीजेपी सरकार ने इसको लागू कराया। वहां यह कानून 27 जनवरी 2025 से प्रभावी है।
गुजरात ने 24 मार्च 2026 को यूसीसी विधेयक पारित किया। इसमें शादी, लिव-इन, संपत्ति आदि में समान नियम का प्रावधान है और बहुविवाह पर प्रतिबंध है।
असम ने 29 मई 2026 को यूसीसी कानून पारित कर पूर्वोत्तर का पहला राज्य बनने का दावा किया। इसमें बहुविवाह प्रतिबंधित और लिव-इन रजिस्ट्रेशन अनिवार्य जैसे प्रावधान हैं। हालाँकि जनजातियों को छूट है।
अब पश्चिम बंगाल इस सूची में शामिल होने की तैयारी कर रहा है। इसके अलावा मध्य प्रदेश में कमेटी गठित हो गई है और इस साल दिवाली तक लागू करने का लक्ष्य है। उत्तर प्रदेश में भी इरादा जताया गया है और उत्तराखंड मॉडल पर काम हो रहा है। राजस्थान में UCC ड्राफ्टिंग कमेटी गठित है। महाराष्ट्र में बिल ड्राफ्ट करने के लिए पैनल बनाया गया। छत्तीसगढ़ और हरियाणा में अध्ययन चल रहा है।
राज्य सरकारों का दावा है कि मसौदा तैयार करते समय उन राज्यों के मॉडल का अध्ययन किया गया है जहां यूसीसी लागू हो चुका है।
क्या है समान नागरिक संहिता?
समान नागरिक संहिता का मतलब है कि विवाह, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार, संपत्ति के बंटवारे और पारिवारिक क़ानून जैसे मामलों में सभी नागरिकों के लिए धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों की जगह एक समान कानून लागू हो।भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को निर्देश दिया गया है कि वह सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करे। हालाँकि यह राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों का हिस्सा है और इसे लागू करना सरकारों के विवेक पर निर्भर करता है।
यूसीसी रहा है बीजेपी का बड़ा चुनावी मुद्दा
बीजेपी ने कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में समान नागरिक संहिता लागू करने का वादा किया था। उत्तराखंड, गुजरात और असम में इसे लागू करने के बाद अब महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे बीजेपी राज्यों में भी सरकारें इसी दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
हालाँकि यूसीसी को लेकर देश में लंबे समय से राजनीतिक और क़ानूनी बहस जारी है। समर्थकों का कहना है कि इससे सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार सुनिश्चित होंगे, जबकि विरोधी पक्ष का तर्क है कि इसे लागू करते समय विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का संतुलन बनाए रखना जरूरी होगा।