महाराष्ट्र की राजनीति में लंबे समय से बड़े खिलाड़ी रहे शरद पवार की पार्टी एनसीपी (एसपी) को म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन के चुनाव में बड़ा झटका लगा है। चुनाव में उनकी पार्टी का प्रदर्शन इतना कमजोर रहा कि उनके गढ़ वाले इलाक़ों में भी बीजेपी आगे निकल गई। शरद पवार और अजित पवार के गुटों का गठबंधन भी बढ़िया प्रदर्शन नहीं कर पाया। पुणे और पिंपरी-चिंचवड नगर निगम चुनावों में शरद पवार और अजित पवार की एनसीपी गुटों की एकजुटता पूरी तरह नाकाम रही। मतदाताओं ने पवार परिवार की पारंपरिक ताक़त पर भरोसा नहीं किया और बीजेपी ने दोनों जगहों पर जबरदस्त बढ़त बनाई है।

पूरे राज्य में 2800 से ज़्यादा वार्डों के रुझानों में शरद पवार गुट की एनसीपी (एसपी) को सिर्फ 29 सीटों पर ही बढ़त मिलती दिख रही है। हालाँकि, अजित पवार गुट की एनसीपी को क़रीब 150 वार्टों में बढ़त मिलती दिख रही है। एनसीपी गुटों की ऐसी हालत तब है जब बीजेपी 1300 से ज़्यादा वार्डों में बढ़त बनाई हुई है, जबकि शिंदे खेमे की शिवसेना 360 से ज़्यादा, कांग्रेस 300 से ज़्यादा और शिवसेना यूबीटी 160 से ज़्यादा वार्डों में बढ़त बनाई हुई हैं।

पुणे नगर निगम में क्या हुआ?

पुणे नगर निगम में शरद पवार और अजित पवार गुट ने मिलकर चुनाव लड़ा। यहाँ कुल 165 सीटें हैं। वोटों की गिनती शुरू होते ही बीजेपी ने बढ़त बना ली। रुझानों में बीजेपी 90 से ज़्यादा सीटों पर आगे चल रही है, जबकि दोनों एनसीपी गुट मिलाकर सिर्फ 20 सीटों पर ही मज़बूत दिख रहे हैं। कई वार्डों में एनसीपी के पारंपरिक इलाक़ों में भी बीजेपी ने बाजी मार ली।

एनसीपी के दोनों गुटों ने सीटों का बँटवारा किया और कुछ हद तक साथ-साथ प्रचार भी किया, लेकिन ये कभी भी पूरी तरह से एक होने जैसा नहीं दिखा। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता बँटे रहे, वोटरों को भ्रम रहा कि ये असली सुलह है या सिर्फ बीजेपी को रोकने की अस्थायी चाल। इस वजह से एकजुट वोट नहीं आ सका।

ये नतीजे साफ़ संकेत देते हैं कि अब पवार ब्रांड अकेले जीत की गारंटी नहीं देता। पिछले दस सालों में पुणे जैसे शहरों के मतदाता बदल गए हैं। मध्यम वर्ग, अपार्टमेंट में रहने वाले नए वोटर और युवा अब पुरानी स्थानीय लीडरशिप से छिटक गया है।

पिंपरी-चिंचवड में भी निराशा

पिंपरी-चिंचवड को हमेशा अजित पवार का गढ़ माना जाता था। कुल 128 सीटों में बीजेपी ने 80 से ज़्यादा सीटों पर बढ़त बनाई हुई है। एनसीपी (अजित पवार) करीब 35 से ज़्यादा सीटों पर आगे है, जबकि शरद पवार गुट कुछ खास नहीं कर सका। यहाँ भी दोनों पवार गुटों की एकजुटता का कोई खास असर नहीं हुआ।

ये नतीजे इसलिए भी अहम हैं क्योंकि अजित पवार की व्यक्तिगत ताक़त यहां सबसे ज्यादा दाँव पर थी। संगठन कमजोर और एक साफ संदेश व बूथ-लेवल प्रबंधन की कमी दिखी।

एकजुटता क्यों नाकाम रही?

दोनों गुटों ने सीट शेयरिंग और कुछ संयुक्त रैलियां कीं, लेकिन इसे कभी भी पूर्ण राजनीतिक विलय नहीं बताया गया। कार्यकर्ताओं के बीच नाराजगी और भ्रम बना रहा। बीजेपी ने सालों से शहर में अपनी मौजूदगी बनाए रखी। उनका बूथ-मैनेजमेंट बहुत मजबूत था। उन्होंने विकास और अच्छे प्रशासन का संदेश दिया। एनसीपी की कोशिश प्रतिक्रिया वाली रही। चुनाव के करीब ही एकजुटता हुई। एनसीपी में पुरानी साख पर ज्यादा भरोसा किया गया, नए वादों और शहर की बदलती जरूरतों पर कम ध्यान दिया। कई वार्डों में स्थानीय नेताओं के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा भी नुकसानदायक रही।

ये हार पवार परिवार के लिए बड़ा सवाल खड़ा कर रही है। क्या ये नतीजे शरद पवार और अजित पवार को असली सुलह की ओर ले जाएंगे? या फिर गुटबाजी और बढ़ेगी? अभी दोनों तरफ से कहा जा रहा है कि ये सहयोग सिर्फ नगर निगम चुनावों तक सीमित था। कोई औपचारिक विलय नहीं हुआ है। लेकिन इन नतीजों के बाद आगे सहयोग बढ़ाने की इच्छा कमजोर लग रही है।

कई विश्लेषक कह रहे हैं कि अब शरद पवार गुट की ताकत और घट गई है। गठबंधन में भी उनकी पार्टी ज्यादा असर नहीं दिखा पाई। कहा जा रहा है कि वोटरों ने दोनों गुटों को एक साथ देखकर भी ज्यादा सपोर्ट नहीं किया। आने वाले समय में अगर विधानसभा या लोकसभा चुनावों में भी ऐसा ही ट्रेंड रहा, तो उनकी पार्टी का वोट बैंक और कम हो सकता है।

क्या पवार परिवार का रुतबा खत्म हो गया?

पूरा खत्म तो नहीं कह सकते, क्योंकि पवार परिवार की जड़ें पश्चिमी महाराष्ट्र में बहुत गहरी हैं। किसान, ग्रामीण इलाकों में अभी भी उनका काफी प्रभाव है। लेकिन ये चुनाव दिखाते हैं कि शहरों में उनका दबदबा तेजी से कम हो रहा है।

साफ़ तौर पर कहें तो ये नतीजे पवार परिवार के लिए चेतावनी की तरह हैं। उन्हें अब अपनी रणनीति बदलनी होगी, नए चेहरे लाने होंगे और जमीनी स्तर पर ज्यादा मेहनत करनी होगी। नहीं तो आने वाले बड़े चुनावों में मुश्किल और बढ़ सकती है।