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नक्सलियों का कौन-सा 'राज' जानकर सरकार से माफ़ी माँग रहे ग्रामीण?

छत्तीसगढ़ के बाद अब महाराष्ट्र में भी लोग नक्सवाद यानी ‘लाल आतंक’ से दूर हो रहे हैं। इसका श्रेय सरकार बेशक अपनी योजनाओं को दे रही है लेकिन नक्सल के प्रति मोहभंग होने की वजह उस उन ख़बरों का तेज़ी से सामने आना भी है जिसे अब तक दबा कर रखा गया था। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली पुलिस के सामने कई ऐसे खुलासे हो रहे हैं जिन्हें जानकर हैरानी होती है कि ग़रीबों को न्याय दिलाने के नाम पर शुरू हुए ‘लाल आतंक’ का रूप 'भयानक' होता जा रहा है।

क्षमा याचना के प्रस्ताव

महाराष्ट्र के ज़िला गढ़चिरौली का एक गाँव है लवारी। इस गाँव की ग्राम सभा ने एक क्षमायाचना प्रस्ताव पारित किया है। इसे सरकार के पास भेज दिया गया है। यह क्षमायाचना प्रस्ताव गाँव के 5 लोगों के लिए है जो 1 मई को हुए सनसनीखेज नक्सल हमले में गिरफ़्तार हुए हैं। पुलिस ने इस मामले में अब तक 8 लोगों को गिरफ़्तार किया है। इनमें से पाँच लोग लवारी गाँव के ही हैं। 

गढ़चिरौली के पुलिस अधीक्षक शैलेश बलकवडे ने इस पत्रकार से उपरोक्त क्षमायाचना की पुष्टि की। उनके मुताबिक़ ग्रामीणों ने यह फ़ैसला नक्सलियों की तरफ़ से दी गई धमकी और लालच के बावजूद किया है। उनका दावा है कि नक्सलियों ने गाँव वालों को पैसे का लालच देकर कहा था कि गिरफ़्तार लोगों के मुक़दमे लड़ने का सारा ख़र्च माओवादी उठाएँगे। ग़ौरतलब है कि 1 मई को हुए नक्सली हमले में 15 पुलिसवालों सहित 16 लोगों की मौत हो गई थी। ‘लाल आतंक’ से ग्रामीणों की तेज़ी से बढ़ रही दूरी की वजह ‘लाल आतंक’ से जुड़ी वे ख़बरें भी हैं जिनका खुलासा कथित रूप से महाराष्ट्र पुलिस के हत्थे चढ़े नक्सलियों और उनके कागजातों से हुआ है।

सरकारी योजना के प्रति झुकाव

बलकवडे के अनुसार गाँव वालों ने सरकार की ‘गाँव बंदी’ योजना में दिलचस्पी दिखाई है। इस योजना के तहत गाँव वालों ने नक्सलियों के लिए गाँव में रहने और उनकी सक्रियता पर इलाक़े में पाबंदी लगाने का फ़ैसला किया है। इसके बदले उन्हें सरकारी योजना के तहत विकास फ़ंड के रूप में 6 लाख रुपए भी मिलेंगे। ग्रामीणों का विश्वास जीतने वाली यह योजना कामयाब हो रही है।

लेकिन जानकारों और महाराष्ट्र के नक्सल इलाक़ों में काम करने वाले पुलिस अफ़सरों का मानना है कि यह केवल विकास फ़ंड का लालच नहीं है। महाराष्ट्र पुलिस के एडीजी ऑपरेशन राजेन्द्र सिंह ने ख़ास बातचीत में कहा कि सरकार की विकास योजनाओं और शिक्षा ने लोगों को ‘लाल आतंक’ को समझने में मदद की है। उनके मुताबिक़ गढ़चिरौली में अब तक बीएसएनएल के 60 टावर लगाए जा चुके हैं। इसको लेकर कुल 105 मोबाइल टावर पर काम किए जा रहे हैं। बाक़ी जगहों से कनेक्टिविटी और पुलिस के हालिया 4 मुठभेड़ों ने आम लोगों को ‘लाल आतंक’ से दूर किया है।

एडीजी ऑपरेशन की बात काफ़ी हद तक सही है लेकिन जानकारों का मानना है कि ‘लाल आतंक’ के ख़ौफ़ पर केवल विकास हावी नहीं हो रहा बल्कि ‘लाल आतंक’ का वह रूप अब बाहर आने लगा है जिससे लोग अभी तक अनजान थे।

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सरेंडर करने वाले ने खोला राज

एसपी गढ़चिरौली शैलेश बलकवडे के मुताबिक़ जुलाई महीने में नक्सलियों के गुरिल्ला दस्ते के कमांडर गोकुल ने सरकार के सामने आत्मसमर्पण किया था। उसके अलावा पाँच और नक्सलियों ने सरेंडर किया। इन सभी 6 नक्सलियों पर 32.5 लाख रुपये का ईनाम घोषित था। अकेले गोकुल के बारे में सूचना देने वालों को 8.5 लाख रुपये ईनाम देने की घोषणा की गई थी। असल में गोकुल सीपीआई माओ के कंपनी-4 यानी पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी का 2017 से ही चीफ़ था। शायद इसीलिए 2005 से अब तक सरेंडर किए 622 नक्सलियों में से गोकुल का सरेंडर सबसे अहम माना गया। वह 27 मई को हुए मुठभेड़ में भी शामिल था और पुलिस को उससे काफ़ी जानकारी मिलने की उम्मीद थी। पूछताछ में गोकुल ने जो बातें बताईं वे काफ़ी चौंकाने वाली हैं। 

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गोकुल ने पुलिस को बताया कि 27 मई को एनकाउंटर में मुकेश गोता नाम का एक नक्सली घायल हुआ था। माओवाद के नियमों के मुताबिक़ मौत के बाद उसका शव उसके परिजनों को सौंपना चाहिए था ताकि उसके घरवाले आदिवासी परंपरा के अनुरूप अंतिम संस्कार कर सकें। लेकिन नक्सलियों ने उसका शव जंगल में जला दिया। गोकुल के साथ चार महिला नक्सलियों ने भी सरेंडर किया था। बलकवडे के मुताबिक़ ये सभी नक्सलियों के आर्मी दस्ते से जुड़े हुए थे और इनके सरेंडर करने की वजह पुलिस की सख़्ती के साथ-साथ सीनियर नक्सलियों का अपने जूनियर के साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार हैं।

महिलाओं के साथ यौन शोषण?

माओवादियों के ख़िलाफ़ की गई कार्रवाइयों में पुलिस के हाथ कई कागजात और ऐसे ख़त मिले हैं जो स्थानीय माओवादियों ने माओ नेतृत्व को लिखे हैं। पुलिस के अनुसार, माओवादियों के आपस में लिखे गए ख़तों के मुताबिक लाल आतंक के लिए काम करने वाली जूनियर महिलाओं के साथ यौन शोषण किया जा रहा है। पुलिस का दावा है कि गढ़चिरौली के कई दस्ता इंचार्ज के ख़िलाफ़ इस तरह की शिकायतों के बाद भी माओ नेतृत्व ने कोई कार्रवाई नहीं की जिसकी वजह से नक्सल के लिए सहानुभूति रखने वाली महिला काडर में भी बेचैनी है। उनके इस हालत की ख़बर आम गाँव वालों तक भी पहुँच ही रही है और इसलिए भी ग्रामीणों में ‘लाल आतंक’ से मोहभंग हो रहा है। गढ़चिरौली एसपी बलकवडे ने पुष्टि करते हुए कहा कि सरेंडर करने वाली महिलाओं की बातचीत भी इन कागजातों की बात को कंफर्म करती है।

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