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मोदी को उलटा पड़ेगा जंगलराज की याद दिलाना!

चूँकि ‘जंगल राज’ के आरोप के मुक़ाबले रखने के लिए ‘सुशासन बाबू का विकास’ है ही नहीं, इसलिए यह भी हो सकता है कि बार-बार लालू राज का ज़िक्र करने से पिछड़ी और दलित जातियों को कथित जंगल राज के बजाय लालू का वह सामाजिक न्याय न याद आ जाए जिसके तहत कमज़ोर जातियों को रंग-रुतबे वाले तबक़ों के मुक़ाबले मिलने वाली ‘इज्ज़त की राजनीति’ का पहला मनोवैज्ञानिक उछाल मिला था। यानी बीजेपी की यह आधी रणनीति भी उसके ख़िलाफ़ उल्टी बैठ सकती है। 

अभय कुमार दुबे

भारतीय जनता पार्टी पूरी कोशिश कर रही है कि किसी तरह से ‘लालू यादव के जंगल राज’ का मुद्दा चला कर अपने और नीतीश कुमार के जनाधार के एक अच्छे-ख़ासे हिस्से को महागठबंधन की तरफ खिसकने से रोक लिया जाए। यह अलग बात है कि चुनावी मुहिम की शुरुआत से ही अपनायी जा रही यह रणनीति पहले चरण के मतदान तक 50 फ़ीसदी तो नाकाम हो ही चुकी है।

ध्यान रहे कि राजग (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़) ने पहले ‘उनके 15 साल बनाम हमारे 15 साल’ का फिकरा उछाला था, ताकि ‘लालू के जंगल राज’ के मु़काबले ‘सुशासन बाबू’ की हुक़ूमत को पेश किया जा सके। लेकिन जल्दी ही इस रणनीति की हवा निकल गई।

15 साल का कथित सुशासन जैसे ही आर्थिक विकास, पूँजी निवेश और रोज़गार के अवसरों की कसौटी पर कसा गया, वैसे ही पता चल गया कि प्रदेश का विकास अगर लालू के राज में नहीं हुआ था, तो नीतीश के राज में भी नहीं हुआ है।

नीतीश के साथ रही बीजेपी

दरअसल, स्थिति उत्तरोत्तर ख़राब हुई है और इसमें जितनी भूमिका नीतीश के मुख्यमंत्रित्व की है, उससे कम बीजेपी की नहीं है। आखिर ढाई साल छोड़ कर बीजेपी लगातार नीतीश के साथ जोड़ी बना कर बिहार पर राज करती रही है। इसलिए, अब प्रधानमंत्री भी अपने भाषणों में नीतिश राज की खूबियाँ नहीं बताते। केवल लालू राज की बुराई करते हैं। नतीजा यह हुआ है कि आधी रह जाने के कारण यह रणनीति वोटरों को प्रभावित नहीं कर पा रही है।

बीजेपी को बिहार में ऊँची जातियों (ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया, कायस्थ और भूमिहार) की पार्टी माना जाता है। पिछले कुछ समय से वह अति-पिछड़ी जातियों (ईसीबी) के बीच भी काम कर रही है, पर अभी तक उसे कमज़ोर जातियों के इस समूह की स्वाभाविक पार्टी की हैसियत नहीं मिल पाई है। दूसरी तरफ नीतीश कुमार कुछ ग़ैर-यादव ओबीसी समुदायों, ईसीबी, महादलित और पसमांदा मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित करते रहे हैं।
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मुसलिम-यादव

पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का साथ छोड़ कर दोबारा बीजेपी का दामन थामने के कारण पसमांदा मुसलमान उनसे पूरी तरह से फिरंट हो चुके हैं। ऊपर से उन्हें डर यह है कि कहीं ग़ैर-यादव ओबीसी और ईसीबी का एक बड़ा हिस्सा सरकार विरोधी भावनाओं (जो नीतीश राज के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर हैं) के चलते राजद को वोट देने का मन न बना ले।  
बीजेपी को अंदेशा यह है कि जहाँ उसके अपने उम्मीदवार नहीं हैं, या जहाँ नीतीश के उम्मीदवार लड़ रहे हैं वहाँ ऊँची जातियाँ जनता दल (युनाइटेड) को वोट न दे कर महागठबंधन का दामन थाम सकती हैं।
अगर ऐसा हो गया तो तेजस्वी प्रसाद यादव के पिता लालू यादव द्वारा नब्बे के दशक में बनाया गया वही सामाजिक गठजोड़ एक बार फिर उभर आएगा जो बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति की धुरी बन गया था। ऐसी स्थिति में नीतीश-बीजेपी की जोड़ी एक-दूसरे के वोटों को पा कर एक बार फिर जिताऊ समीकरण बनाने का लक्ष्य नहीं वेध पाएगी। 

रणनीति बैठेगी उल्टी?

चूँकि ‘जंगल राज’ के आरोप के मुक़ाबले रखने के लिए ‘सुशासन बाबू का विकास’ है ही नहीं, इसलिए यह भी हो सकता है कि बार-बार लालूराज का ज़िक्र करने से पिछड़ी और दलित जातियों को कथित जंगल राज के बजाय लालू का वह सामाजिक न्याय न याद आ जाए जिसके तहत कमज़ोर जातियों को रंग-रुतबे वाले तबकों के मुक़ाबले मिलने वाली ‘इज्ज़त की राजनीति’ का पहला मनोवैज्ञानिक उछाल मिला था। यानी बीजेपी की यह आधी रणनीति भी उसके ख़िलाफ़ उल्टी बैठ सकती है। 

अगर दुर्बल समुदायों के दिमाग में लालू राज के इस ऐतिहासिक योगदान की वापसी हो गई, तो नीतीश की राजनीति तो ख़ात्मे के कगार पर पहुँच ही जाएगी, बीजेपी की अभी तक की सभी कोशिशें मटियामेट हो जाएँगी।
ध्यान रहे कि सामाजिक न्याय और सेकुलर राजनीति के मामले में लालू का रिकॉर्ड एकदम साफ है। यहाँ तक कि उसका मुक़ाबला उत्तर प्रदेश की पिछड़े और दलित नेता भी नहीं कर सकते। लालू ने इस मामले में कोई समझौता नहीं किया। राजनीतिक नुक़सान की कीमत पर भी उन्होंने न तो कभी हिंदुत्ववादी शक्तियों को कोई स्पेस दिया, और न ही पारम्परिक रूप से दबदबे वाली जातियों के सामने सिर झुकाया। 

'बाबू साहेब' वाला बयान

तेजस्वी ने अपने एक भाषण में अपने पिता के शासन के इसी पहलू को लोकप्रिय ढंग से सामने रखने की कोशिश की है। बीजेपी की तरफ से प्रचार यह किया जा रहा है कि उनके ‘बाबू साहेब’ वाले वक्तव्य के कारण ऊँची जातियों के बीच महागठबंधन की बनती हुई साख को बहुत धक्का लगा है। दरअसल, अगर ऊँची जातियाँ महागठबंधन को वोट देंगी तो उसका कारण नीतीश के विरोध में संचित सरकार विरोधी भावनाओं से ज़्यादा जुड़ा होगा।
यह अलग बात है कि तेजस्वी यादव ने अपनी पार्टी के इतिहास में पहली बार किसी ऊँची जाति के नेता (जगदानंद सिंह) को प्रदेश अध्यक्ष बना कर जो राजनीति की है, उसका संदेश भी द्विज जातियों में सकारात्मक गया है।

बेरोज़गारी

नीतीश-बीजेपी की समस्या केवल यहीं तक नहीं है। तेजस्वी यादव ने चुनाव के विमर्श को हिंदू-मुसलमान, पाकिस्तान-हिंदुस्तान जैसे साम्प्रदायिक मुद्दों से हटा कर रोज़गार जैसे आर्थिक प्रश्न के साथ सफलतापूर्वक जोड़ दिया है। पहली नज़र में ऐसा लगने लगा है कि बिहार का चुनाव आर्थिक प्रश्नों के इर्दगिर्द होने जा रहा है। अगर ऐसा हुआ तो यह हमारी लोकतांत्रिक राजनीति के लिए मोटे तौर पर एक नयी बात होगी।
चुनावों में विकास की बात तो बहुत की जाती है, लेकिन वोट किसी और बात पर पड़ते रहते हैं। आम तौर पर महँगाई, बेरोज़गारी, औद्योगीकरण, कुल घरेलू उत्पाद, राजकोषीय घाटा, ईएमआई, आसान कर्ज, सब्सिडी वगैरह के मुद्दे केवल कहने के लिए ही रह जाते हैं। ये सारी बातें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। अगर जनता महँगाई और बेरोज़गारी से जूझ रही है, तो कुछ स्थानीय कारणों को छोड़ कर वह निश्चित रूप से आर्थिक मोर्चे पर सरकार की धीरे-धीरे जमा होती जा रही नाकामियों का परिणाम होता है।

सुशासन को वोट!

दूसरी तरफ होता यह है कि आर्थिक प्रश्न को सुशासन या कुशासन का मुद्दा दबा देता है। क़ानून-व्यवस्था की समस्या लोगों की ज़िंदगी को असुरक्षा से भर देती है, और जैसे ही कोई पार्टी, नेता या सरकार द्वारा सख़्ती बरतते हुए इस मोर्चे पर सुधार किया जाता है, वैसे ही जनता बदले में जम कर समर्थन देने पर उतर आती है। लेकिन, अपने जीवन को सुरक्षित बनाने का फौरी लक्ष्य वेधने के चक्कर में वोटर प्रदेश की आर्थिक दुर्गति की अनदेखी करते रह जाते हैं। कथित ‘सुशासन’ करने वाला नेता बार-बार अपनी प्रशासनिक कुशलता के कारण जीतता रहता है। 

आर्थिक समृद्धि की दौड़ में बिहार के पिछड़ेपन की हक़ीक़त से शायद ही कोई असहमत हो, लेकिन इसके बावजूद पिछले 15 साल से एक ऐसा नेता चुनाव जीत रहा है जिसकी छवि ‘सुशासन बाबू’ की है।
लेकिन चुनाव ने कुछ ऐसा मोड़ लिया है कि यह छवि अब सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए ज़्यादा उपयोगी नहीं रह गई है। यह ऐसी हाँडी है जो काठ की तो नहीं है, पर बार-बार अँगीठी पर चढ़ाए जाने के बाद अब पहले की तरह सत्ता की खीर पकाने में सक्षम नहीं दिख रही है।

युवा वोटर

प्रदेश के चुनाव में यह मोड़ मुख्य तौर से वोटरों के विन्यास में हुए एक परिवर्तन से आया है। इस समय बिहार के कुल वोटरों का तक़रीबन 51 फ़ीसदी 18 से 39 साल की उम्र तक का है (7.18 करोड़ में से 3.66 करोड़)। इसका मतलब यह हुआ कि 1995 में जब लालू यादव ने पहली बार पूर्ण बहुमत प्राप्त किया था, उस समय इनमें से बहुतों का जन्म भी नहीं हुआ था, और जो लोग आज तीस-चालीस साल के हैं वे उस समय ज़्यादा से ज़्यादा पाँच से दस साल के रहे होंगे।
18 से 25 साल के वोटरों की संख्या 16 फ़ीसदी से ज़्यादा की है। युवा वोटरों के इस प्रदेश की ताज़ातरीन खास बात यह कि संयोग से सही, लेकिन इसका राजनीतिक नेतृत्व भी काफी युवा दिख रहा है। मसलन, महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव 30 साल के हैं। उनके भाई तेजप्रताप उनसे केवल दो साल ही बड़े हैं। कुल मिला कर बिहार के चुनाव में जवानी की बहार है।

सरकार से सवाल

जवानी की इसी बहार ने चुनावी मुद्दों में वह परिवर्तन किया है, जिसे मैं आर्थिक प्रश्न पर चुनाव होना कह रहा हूँ। चूँकि ज़्यादातर वोटर युवा हैं, इसलिए अचानक बेरोज़गारी का सवाल प्रचार मुहिम के केंद्र में आ गया है। यह सवाल पूछा जा रहा है कि 15 से 29 साल की काम करने में समर्थ श्रमशक्ति बेरोज़गार क्यों है?
सरकार ने खाली पड़े पदों को क्यों नहीं भरा? चूँकि बिहार में न तो निजी निवेश आ रहा है, और न ही सरकार बुनियादी सुविधाओं को बढ़ाने के लिए निवेश कर रही है, इसलिए रोज़गार मिलने की संभावना नगण्य है। कुल मिला कर बेरोज़गारी का जो राष्ट्रीय प्रतिशत है, बिहार में बेरोज़गारी उससे भी ज़्यादा है।

 नीतीश कुमार के 15 साल लम्बे शासनकाल में उनके ही पहले कार्यकाल से तुलना करने पर पता लगता है कि बाकी दोनों कार्यकालों में निजी निवेश बुरी तरह से गिरा है। बिहार देश की आबादी का कुल 9 फीसदी है, लेकिन देश के कुल आर्थिक उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी केवल 3 फीसदी ही है।
इन आँकड़ों की रोशनी में पूछा जा सकता है कि अगर लालू यादव का कार्यकाल विकास-विरोधी था, तो नीतीश कुमार के कार्यकाल को क्या कहा जाएगा?

मनरेगा में भी नाकामी

नीतीश की सरकार महात्मा गाँधी ग्रामीण रोज़गार योजना का बेहतर इस्तेमाल करने में भी नाकाम रही। यह देख कर ताज्जुब होता है कि इस सरकार के तहत 2019-20 में केवल 20,445 परिवारों को ही 100 दिन का काम मिल सका। आबादी के मु़क़ाबले यह प्रतिशत 0.5 है, जबकि इसका राष्ट्रीय प्रतिशत 7.0 बताया जाता है।

बढ़ती हुई बेरोज़गारी, विपन्नता और असहायता की इस समस्या को जैसे ही युवा वोटरों की बड़ी संख्या के मद्देनज़र देखा जाता है, तसवीर बदल जाती है। इस बात को बीजेपी से भी पहले तेजस्वी यादव ने समझा।

बेरोज़गारी पर बदली बीजेपी

उन्होंने रोज़गार बढ़ाने का सामान्य आश्वासन देने के बजाय ठोस रूप से 10 लाख नौकरियाँ देने का वायदा कर डाला। सरकारी पक्ष से पहले इस वायदे का मज़ाक उड़ाया गया। पूछा गया कि नौकरियों के लिए पैसा कहाँ से आएगा। कहा गया कि इस तरह से नौकरियाँ दे कर तो तेजस्वी राज्य की अर्थव्यवस्था का कबाड़ा कर देंगे।
लेकिन, जल्दी ही बीजपी और सत्तारूढ़ गठजोड़ को अपनी ग़लती समझ में आ गई। फिर उन्होंने भी बेरोज़गारी के मुद्दे को पकड़ने की कोशिश की। उनकी तऱफ से 19 लाख नये रोज़गारों के सृजन (केवल नौकरियाँ नहीं) का वायदा किया गया। स्वयं प्रधानमंत्री ने अपनी चुनावी रैलियों ने आर्थिक समृद्धि के मोर्चे पर अपेक्षित सफलता न मिल पाने की ज़िम्मेदारी कांग्रेस के 10 साल के केंद्रीय शासन पर डाल दी। लेकिन यह नहीं बताया कि पिछले 6 साल से तो केंद्र में उनकी सरकार है।
उन्होंने यह भी नहीं बताया कि नीतीश के 15 साल में ढाई साल छोड़ कर बाकी सारे समय बीजेपी उनकी सरकार में बराबर की भागीदार के रूप में इस विफलता की हिस्सेदार क्यों नहीं समझी जानी चाहिए?

बेरोज़गारी का यह सवाल इस लिहाज़ से भी संगीन हो गया है कि तीस साल के युवा वोटरों को लालू राज्य की कोई स्मृति नहीं है। इसलिए ‘जंगल राज’ का डर दिखा कर उसके वोट नहीं लिये जा सकते। तेजस्वी यादव की जनसभाओं में आने वाली भीड़ इसका सबूत है। बेरोज़गारी का सवाल सत्तारूढ़ शक्तियों के लिए चुनौती बन रहा है। अगर सामाजिक न्याय का प्रश्न इसके साथ जुड़ सका तो बिहार में चुनाव बदल जाएगा। 

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अभय कुमार दुबे
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