भारत का संविधान नागरिकों को केवल वोट डालने का अधिकार नहीं देता, बल्कि सवाल पूछने, असहमति जताने और शांतिपूर्वक विरोध करने का अधिकार भी देता है। यही अधिकार किसी भी लोकतंत्र को जीवित रखते हैं। अगर नागरिक सरकार से सवाल न कर सकें, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे एक औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाता है।
नई दिल्ली में आयोजित एआई समिट के दौरान युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया विरोध और उसके बाद हुई पुलिस कार्रवाई तथा न्यायालयी प्रक्रिया केवल एक घटना नहीं है। यह उस बड़े सवाल का हिस्सा है कि क्या भारत में विरोध को अब एक असुविधा या अपराध की तरह देखा जाने लगा है? और यदि हाँ तो यह प्रवृत्ति खासतौर पर मोदी सरकार के कार्यकाल में ही क्यों तेज़ हुई है?
विरोध कोई रियायत नहीं, मौलिक अधिकार है
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1) नागरिकों को तीन बेहद अहम अधिकार देता है :
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
- शांतिपूर्वक और बिना हथियार के एकत्र होने का अधिकार
- संघ या संगठन बनाने का अधिकार
इन अधिकारों पर राज्य कुछ उचित प्रतिबंध लगा सकता है, लेकिन संविधान स्पष्ट करता है कि ये प्रतिबंध :
- तर्कसंगत हों
- आवश्यक हों
- और अनुपातहीन (disproportionate) न हों
संविधान कहीं यह नहीं कहता कि यदि कोई विरोध सरकार के लिए असुविधाजनक हो, किसी बड़े कार्यक्रम के दौरान हो, या अंतरराष्ट्रीय मंच पर हो तो उसे स्वतः अपराध मान लिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट की नजीरें
भारत का सुप्रीम कोर्ट बार-बार यह स्पष्ट कर चुका है कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र की आत्मा है।
1. रामलीला मैदान मामला (2012)
अदालत ने कहा :
“शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग केवल अंतिम उपाय हो सकता है। राज्य का दायित्व है कि वह पहले संवाद और चेतावनी का रास्ता अपनाए।”
यह फैसला स्पष्ट करता है कि पुलिस की पहली प्रतिक्रिया बल नहीं हो सकती।
2. मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018)
इस ऐतिहासिक फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा :
“राज्य का दायित्व केवल क़ानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि विरोध को सुगम बनाना भी है।”
यानी सरकार का काम यह नहीं कि वह हर विरोध को “समस्या” समझे, बल्कि यह देखे कि विरोध संवैधानिक दायरे में कैसे संभव बनाया जाए।
3. अमित साहनी बनाम कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (2020)अदालत ने माना कि सड़क या सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्चितकालीन कब्जा गलत हो सकता है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि :
“प्रदर्शन पर रोक स्थायी नहीं हो सकती और न ही मनमानी हो सकती है।”
4. मॉडर्न डेंटल कॉलेज केस (2016)
इस फैसले ने अनुपातिकता (Proportionality) का सिद्धांत स्थापित किया :
- क्या कार्रवाई आवश्यक थी?
- क्या कम कठोर विकल्प मौजूद थे?
- क्या अधिकारों पर अनावश्यक आघात किया गया?
एआई समिट मामला: समस्या कहाँ है?
यदि उपलब्ध तथ्यों को मानें, तो युवा कांग्रेस का विरोध :
- शांतिपूर्ण था
- राजनीतिक असहमति का रूप था
- और किसी हिंसक गतिविधि का प्रमाण सामने नहीं आया
इसके बावजूद :
- तत्काल गिरफ्तारी
- गंभीर आपराधिक धाराएँ
- नेतृत्व को पुलिस हिरासत में भेजना
यह सवाल खड़ा करता है कि :
क्या यह कार्रवाई वास्तव में “कानून-व्यवस्था” के लिए थी या एक नज़ीर बनाकर डर पैदा करने के लिए?
सुप्रीम कोर्ट की नजीरों के अनुसार, ऐसी स्थिति में :
- विरोध स्थल तय किया जा सकता था
- प्रदर्शन को सीमित किया जा सकता था
- संवाद किया जा सकता था
लेकिन सीधे आपराधिक कानून का इस्तेमाल संविधान की भावना से टकराता है।
आज की अदालत का आदेश : संतुलन या विवशता?
अदालत ने युवा कांग्रेस के नेता को चार दिन की पुलिस हिरासत में भेजा। यह आदेश दो बातों को एक साथ दर्शाता है :
- अदालत ने पुलिस की पूरी मांग नहीं मानी (सात दिन नहीं दिए)
- लेकिन विरोध को पूरी तरह नागरिक अधिकार के रूप में भी नहीं देखा
यह रुख बताता है कि आज न्यायपालिका भी एक ऐसे माहौल में काम कर रही है जहाँ :
- “राष्ट्रीय सुरक्षा”
- “अंतरराष्ट्रीय छवि”
- “कार्यक्रम की प्रतिष्ठा”
जैसे शब्दों का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
यह सब मोदी सरकार के दौर में ही क्यों बार-बार हो रहा है? यह सबसे असहज लेकिन जरूरी सवाल है।
1. “इवेंट-स्टेट” की राजनीति
- पिछले दस वर्षों में शासन का स्वरूप नीति से ज़्यादा इवेंट-केंद्रित, संवाद से ज़्यादा प्रबंधन-केंद्रित हो गया है।
- हर बड़ा आयोजन “राष्ट्र की प्रतिष्ठा” का प्रश्न बना दिया जाता है।
- और जब प्रतिष्ठा सर्वोपरि हो जाती है, तो असहमति अपराध लगने लगती है।
2. पुलिस का बढ़ता राजनीतिक उपयोग
मोदी काल में पुलिस तटस्थ कानून-प्रवर्तक से कार्यपालिका के विस्तार की तरह व्यवहार करती दिखती है। विरोध को अक्सर “साज़िश”, “देश विरोध”, “अराजकता” के फ्रेम में रखा जाता है।
3. विपक्ष के प्रति असहिष्णुता
- यह संयोग नहीं है कि किसान आंदोलन, छात्र आंदोलन, विपक्षी दलों के प्रदर्शन अक्सर कठोर कार्रवाई का शिकार होते हैं।
- लोकतंत्र में सत्ता बदलती रहती है, लेकिन विरोध का अधिकार स्थायी होता है।
- इस बुनियादी सिद्धांत को मोदी युग में बार-बार संकुचित किया गया है।
4. “मजबूत नेता” की छवि और कमजोर संस्थाएँ
एक मजबूत नेता की छवि तभी तक लोकतांत्रिक होती है, जब तक संस्थाएँ स्वतंत्र रहें, असहमति सुरक्षित रहे, लेकिन जब हर विरोध को “छवि पर हमला” मान लिया जाए, तो संस्थाएँ धीरे-धीरे आत्मसंयम खो देती हैं।
सवाल सत्ता से है, संविधान से नहीं
युवा कांग्रेस का यह मामला दरअसल यह पूछता है : क्या भारत में अब विरोध करने से पहले यह सोचना पड़ेगा कि “कार्यक्रम कितना बड़ा है” और “सरकार कौन-सी है”?
संविधान और सुप्रीम कोर्ट की नजीरें साफ कहती हैं : विरोध लोकतंत्र का दुश्मन नहीं, बल्कि उसका संरक्षक है। यदि हर असहमति पर पुलिस, गिरफ्तारी, हिरासत ही जवाब होगा, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे औपचारिक और खोखला हो जाएगा।
आज ज़रूरत इस बात की है कि :
- न्यायपालिका अपनी पुरानी नजीरों को और दृढ़ता से लागू करे
- पुलिस को संवैधानिक सीमाओं में रखा जाए
- और सत्ता यह स्वीकार करे कि विरोध कमजोरी नहीं, लोकतंत्र की ताकत है
यही भारत के संविधान की आत्मा है — और यही उसकी परीक्षा भी।