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किसान आंदोलन लोकतंत्र को बचाने का आंदोलन है!

सभी भारतवासियों के लिए 26 जनवरी विशेष महत्व का दिन है। इसी दिन हम गणतंत्र दिवस का उत्सव मनाते हैं। गणतंत्र दिवस संविधान की संप्रभुता और सुचिता का दिन है। जैसा कि संविधान की प्रस्तावना के शुरुआती उद्घोष- 'हम भारत के लोग' से स्पष्ट है, संविधान में अंतर्निहित शक्ति वास्तव में गण अर्थात जनता से आती है। इसलिए 26 जनवरी सही अर्थ में जनता का राष्ट्रीय पर्व है, भारत का पर्व है। लेकिन क्या आज वास्तव में जनता संप्रभु है? क्या देश में जनता का शासन है? संवैधानिक संस्थानों के प्रति जितना अविश्वास आज है शायद कभी पहले रहा हो। 

देखा जाए तो संसद और सर्वोच्च न्यायालय से लेकर चुनाव आयोग तक सभी संवैधानिक संस्थाएँ गंभीर अविश्वास के दौर से गुजर रही हैं। 

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विचार-विमर्श नहीं

लोकसभा में 17 सितंबर और राज्यसभा में 20 सितंबर को बिना किसी पूर्व विचार विमर्श और आम सहमति के तीन कृषि क़ानूनों को पास कर दिया गया। क़ानूनों को पास करने की प्रक्रिया और क़ानूनों की प्रकृति ने किसानों के मन में  सरकार की नीति और नीयत को लेकर  गंभीर सवाल खड़े किये हैं। साथ ही संसद और सरकार के प्रति उनके मन में गहरा अविश्वास पैदा किया है।

संवैधानिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं के प्रति इसी अविश्वास के चलते आज लगभग पूरे देश का किसान आंदोलित है और दिल्ली के चारों ओर का किसान पिछले दो महीनों से राजधानी को घेर कर बैठा है। हालांकि सतही नज़र से देखने से यह किसान आंदोलन केवल तीन कृषि कानूनों की वापसी का लग सकता है, लेकिन मामला इतना सरल और सीधा है नहीं। 

farmers protest against farm laws an agitation to save democracy - Satya Hindi

कॉरपोरेट के ख़िलाफ़

लेखक व पत्रकार पी. साईनाथ की माने तो यह "किसान आंदोलन किसानों द्वारा लुप्त हो चले गणतंत्र को पुनर्स्थापित करने का आंदोलन हैं।” वास्तव में हाड़ कँपाती सर्दी में पिछले दो महीनों से चल रहा यह किसान आंदोलन मात्र तीन कृषि कानूनों को वापस कराने का आंदोलन है भी नहीं। इस आंदोलन के मायने और निहितार्थ बेहद गहरे और दूरगामी हैं। 

ध्यान से देखा जाये तो किसान आंदोलन दशकों से देश की कॉरपोरेट उन्मुखी अर्थ नीति के ख़िलाफ़ किसानों का लामबंद होना है। यह आंदोलन सरकार की आखों में आखें डाल कर यह कहने का आंदोलन है कि देश की दशा और दिशा कॉरपोरेट के अनुसार तय नहीं होगी।

यह आंदोलन कॉरपोरेट समर्थित, कॉरपोरेट की सरकार को जनता उन्मुखी नीति बनाने के लिए बाध्य करने का हैं। यह आंदोलन जनता के द्वारा अपने अस्तित्व, पहचान और शक्ति को पुनर्स्थापित करने तथा हाशिए पर कर दिये गये उसके न्यायसंगत अधिकारों को प्राप्त करने का आंदोलन है।

तानाशाही के ख़िलाफ़

दरअसल यह किसान आंदोलन उस निरंकुशता और तानाशाही के ख़िलाफ़ लडाई है जो यह मानती है कि हमें जो सही लगता है वही सही है, जो यह मानती है कि हम ने किया है तो ठीक किया है। यह स्वयं को सत्य और आलोचना तथा विश्लेषण से परे मानने वाली राजनीतिक मानसिकता को बदलने का आंदोलन है। इस अर्थ में देखें तो यह आंदोलन लोक तंत्र को बचाने का आंदोलन है। 

विद्वानों की माने तो 2019 का आम चुनाव किसानों के लिए अपने मुद्दों को चुनावी मुद्दा बना पाने का अंतिम चुनाव था। लेकिन राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के ज्वार में बह कर किसानों ने राजनीतिक वर्ग को यह संदेश दिया था कि इस देश में चुनाव किसान- मजदूरों के मुद्दों को दरकिनार करके भी जीता जा सकता है। यह किसान आंदोलन राष्ट्रीय राजनीति में किसानों के मुद्दों को पुनर्स्थापित करने का आंदोलन है। 

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इसी संदर्भ में 26 जनवरी की "किसान ट्रैक्टर परेड" को भी समझने की ज़रूरत है। किसान ट्रैक्टर परेड में शामिल ट्रैक्टर प्रतीकात्मक रूप में आधुनिकता और विकास के पथ पर तेजी से भागती गाड़ियों के बीच एक हस्तक्षेप है, अपने वजूद एवम महत्व को प्रदर्शित करना है।

गणतंत्र दिवस किसान ट्रैक्टर परेड इस देश के वातानुकूलित घरों में रहने वालों और वातानुकूलित गाड़ियों में राजधानी की चमचमाती सड़कों पर चलने वाले दंभी एलीट वर्ग को यह संदेश देने के लिए भी है कि देश हम हैं, आप नहीं। देश के निर्माता और भाग्य विधाता हम हैं, आप नहीं।

'हम ही जवान, हम ही किसान'

किसान ट्रैक्टर परेड सही अर्थ में मुठ्ठी बांध कर जोर से ये उद्घोष करने का प्रयास है कि "हम ही जवान, हम ही किसान"। 

26 जनवरी की किसान ट्रैक्टर परेड निरंकुश हो चली सरकार को उसकी वास्तविक शक्ति और उस शक्ति के वास्तविक स्रोत की पहचान करा देने का उत्सव भी है। 

चौधरी चरण सिंह कहते थे कि देश के किसान के हाथ की हथेली हल पर तो नज़र दिल्ली पर होनी चाहिए। तीनों काले कृषि कानून वास्तव में किसानों की नज़र दिल्ली से हटाने के परिणाम है। किसान ट्रैक्टर परेड दिल्ली पर चूक गयी नजर को पुनः जमाने का उद्घोष है।

26 जनवरी को दिल्ली की सड़कों पर किसान ट्रैक्टर परेड देश की सत्ता में बैठी किसान- मज़दूर- आदिवासी विरोधी, गाँव -देहात विरोधी, ग़रीब विरोधी और ख़ास कर गांधी के 'ग्राम स्वराज' विरोधी मानसिकता को चुनौती देने का प्रयास है।

अतः यह लोक आंदोलन वास्तव में निरंकुशता के विरुद्ध लोक के तंत्र को पुन: स्थापित करने का आंदोलन है और किसान ट्रैक्टर परेड लोकविरोधी सरकार को चेतावनी देते हुए लोक की संप्रभुता को प्रदर्शित करने का प्रयास है।

इस स्थिति में यह हर एक लोकतंत्र में विश्वास करने वाले का आंदोलन है तथा हर एक लोकतांत्रिक व्यक्ति का यह धर्म है कि वह इस आंदोलन में भाग ले कर इस आंदोलन को मजबूत करें और निरंकुश हो चली सरकार को लोकतांत्रिक सरकार बनाने में अपना सक्रिय योगदान दे।

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