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बंदूक़ के बल पर कश्मीरी घरों में असहाय बंद: गाँधी शांति प्रतिष्ठान

गाँधी शांति प्रतिष्ठान का बयान...

राज्यसभा और लोकसभा में चली दो दिनों की बहस, प्रधानमंत्री का राष्ट्र को संबोधन और तब से लगातार कश्मीर में बन रहे हालात को देखने के बाद, हम गाँधी-प्रेरित नागरिक यह कहने को विवश हुए हैं कि सरकार ने देश को एक ऐसी अंधी सुरंग में डाल दिया है जिसका दूसरा सिरा बंद है। जिस बंदूक़ के बल पर सरकार ने कश्मीर को चुप कराया है, अब उसी बंदूक़ की दूरबीन बनाकर कश्मीर को देखा और दिखाया जा रहा है। यह किसी भी सरकार के लिए के लिए शर्मनाक, किसी भी संसद के लिए दुर्भाग्यपूर्ण और भारत देश के लिए अपशकुन है।

दिन-दहाड़े एक पूरा राज्य ही देश के नक्शे से ग़ायब हो गया है! यह कोई जादू नहीं है कि अचंभित होकर हम इसका मजा लें। जादू के खेल में हमें पता होता है कि हम जो देश रहे हैं वह यथार्थ नहीं है, जादू है, माया है। लेकिन यहाँ जो हुआ है वह ऐसा यथार्थ है जो अपरिवर्तनीय-सा है, कुरूप है, क्रूर है, अलोकतांत्रिक है और हमारी लोकतांत्रिक राजनीति की दारिद्रय का परिचायक है।

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आपातकाल के दौरान भी लोकसभा का ऐसा अपमान नहीं हुआ था, और न तब के विपक्ष ने उसका ऐसा अपमान होने दिया था। यह लोकतांत्रिक पतन की पराकाष्ठा है। कहा जा रहा है कि लोकतंत्र बहुमत से चलता है, और बहुमत हमारे पास है। लेकिन यह बात बड़ी आसानी से छिपाई जा रही है कि 'बहुमत' शब्द में ही उसका यह मतलब निहित है कि वहाँ बहु-मत होना ही चाहिए- विभिन्न मतों का विमर्श! लोकतांत्रिक संसद की यही पहचान है। राज्यसभा और लोकसभा में उन दो दिनों में क्या मतों का कोई आदान-प्रदान हुआ? बस, एक आदमी चीख रहा था, तीन सौ से ज़्यादा लोग मेज़ें पीट रहे थे और बाक़ी पराजित, सर झुकाए बैठे थे। यह बहुमत नहीं, बहुसंख्या है। आपके पास मत नहीं, मतविहीन सर हैं।

इतिहास ने हमें कश्मीर सौंपा था इस चुनौती के साथ कि हम इसे अपने भूगोल में समाहित करें। दुनिया में ऐसा कोई उदाहरण शायद ही होगा कि जिसमें एक भरा-पूरा राज्य समझौता-पत्र पर दस्तख़त कर के किसी देश में सशर्त शरीक हुआ हो। कश्मीर ऐसे ही हमारे पास आया था और हमने उसे स्वीकार किया। अनुच्छेद 370 इसी संधि की व्यवहारिकता का नाम था। जब यह बना था तब मूल संकल्पना में भी और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की घोषणा में भी इसे एक अस्थाई व्यवस्था बताया गया था जिसे समय के साथ घिस-घिस कर कालातीत हो जाना था। ऐसा ही हो भी रहा था। इसका फ़ायदा उठाने वालों और इस कारण कश्मीर का फ़ायदा न उठा सकने वालों को छोड़ दें तो कितनों को पता था कि कोई ऐसी धारा भी है? लोकतंत्र अपने नागरिकों के साथ व्यवहार की ऐसी कला का ही नाम है।

कश्मीर ने क्या सौंपा

बहुत कठिन चुनौती थी वह, क्योंकि इतिहास ने कश्मीर ही नहीं सौंपा था हमें, साथ ही सौंपी थी मूल्यविहीन सत्ता की बेईमानी, नीतिविहीन राजनीति की लोलुपता सांप्रदायिकता की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कुचालें तथा पाकिस्तान के रास्ते साम्राज्यवादी ताक़तों की दखलंदाज़ी! कश्मीर भले स्वर्ग कहलाता हो, वह हमें स्वार्थ के नर्क में लिथड़ा मिला था। और तब हम भी क्या थे? अपना खंडित अस्तित्व संभालते हुए, एक ऐसे रक्तस्नान से गुजर रहे थे जैसा इतिहास ने पहले देखा नहीं था। भारतीय उपमहाद्वीप के अस्तित्व का वह सबसे नाजुक दौर था। एक ग़लत क़दम हमारा अस्तित्व ही लील जाती!

हम चाहते तो कश्मीर के लिए अपने दरवाजे बंद कर सकते थे। हमने वह नहीं किया। सैकड़ों रियासतों के लिए नहीं किया, जूनागढ़ और हैदराबाद के लिए नहीं किया, तो कश्मीर के लिए भी नहीं किया। वह साहस था, एक नया ही राजनीतिक प्रयोग था।

आज इतिहास हमें इतनी दूर ले आया है कि हम यह समझ नहीं पाते हैं कि जवाहरलाल-सरदार पटेल-शेख अब्दुल्ला की त्रिमूर्ति ने कैसे वह सारा संभाला, एक संतुलन बनाया और उसे एक आकार भी दिया। ऐसा करने में ग़लतियाँ भी हुईं, मतभेद भी हुए, बेईमानियाँ भी हुईं, राजनीतिक अनुमान ग़लत भी निकले लेकिन ऐसा भी हुआ कि हम कह सके कि कश्मीर हमारा अभिन्न अंग है; और जब हम ऐसा कहते थे तो कश्मीर से भी उसकी प्रतिध्वनि उठती थी। आज वहाँ बिल्कुल सन्नाटा है। कश्मीर का मन मरघट बन गया है।

भारत में विलय के साथ ही कश्मीर हमें कई स्तरों पर परेशान करता रहा है। जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री हों और उनके आदेश से उनके परम मित्र शेख अब्दुल्ला की गिरफ़्तारी हो, उनकी सरकार की बर्खास्तगी हो तो परिस्थिति कितनी नाजुक रही होगी, इसे समझा जा सकता है। यह तो भला था कि तब देश के सार्वजिनक जीवन में जयप्रकाश नारायण, विनोबा भावे, राममनोहर लोहिया जैसी सर्वमान्य हस्तियाँ सक्रिय थीं कि जो सरकार और समाज को एक साथ कठघरे में खड़ा करती रहती थीं और सरकारी मनमानी और अलगाववादी मंसूबों के पर कतरे जाते थे। आज वहाँ भी रेगिस्तान है।

कौन-किसे लूट रहा है?

कहा जा रहा है कि कुछ मुट्ठी भर लोगों ने और तीन परिवारों ने कश्मीर में सारी लूट मचा रखी थी! हो सकता है, तो उन पर मुक़दमा चलाएँ, उन्हें पकड़ कर जेल में डाल दें आप; यहाँ तो आपने सारे राज्य को जेल बना दिया! कल तक तो इन्हीं परिवारों के साथ मिलकर कांग्रेस ने, अटल बिहारी वाजपेयी ने और आपने भी सरकारें चलाई थीं! तब क्या इस लूट में आपकी साझेदारी भी चल रही थी? और कौन कह सकता है कि यह पूरा राजनीतिक-तंत्र बगैर लूट के चल रहा है? केंद्र या राज्यों की कौन-सी सरकारी परियोजना ऐसी है कि जिसकी आवंटित पूरी राशि उसी में खर्च होती है? कौन-सा राज्य है जो इस या उस माफिया के हाथ में बंधक नहीं है? अब तो माफियाओं की सरकारें बना रहे हैं हम! कोई यही बता दे कि राजनीतिक दलों की कमाई के जो आँकड़े अख़बारों में अभी ही प्रकाशित हुए हैं, उनमें ये अरबों रुपये शासक दल के पास कैसे आए? ऐसा क्यों है कि जो शासन में होता है धन की गंगोत्री उसकी तरफ़ बहने लगती है? बात कश्मीर की नहीं है, व्यवस्था की है। महात्मा गाँधी ने इसे इसलिए ही चरित्रहीन कहा था।

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जब दरवाजे खुलेंगे तब...

हम कश्मीर को इसी तरह लंबे समय तक बंद तो रख नहीं सकेंगे। दरवाजे खुलेंगे, लोग बाहर निकलेंगे। उनका ग़ुस्सा, क्षोभ सब फूटेगा। उसकी ख़बरें आपके बहुत रोकने-दबाने के बाद भी बाहर आने लगी हैं। बाहरी ताक़तें पहले से ज़्यादा ज़हरीले ढंग से लोगों को उकसाएँगी। और हमने संवाद के सारे पुल जला रखे हैं, तो क्या होगा? विपक्ष के वे सारे नेता, जो आपकी कार्रवाई से एक दिन पहले तक कश्मीरी अवाम से शांति व सद्भाव बनाए रखने की अपील कर रहे थे, आपकी जेल में बंद हैं। कुल मिला कर तसवीर खुशनुमा बनती नहीं है।

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कश्मीरियों के साथ खड़े रहने की ज़रूरत

सरकारी दल के लोग जैसी बयानबाज़ी कर रहे हैं और कश्मीर के चारागाह में उनके चरने के लिए अब क्या-क्या उपलब्ध है, इसकी जैसी बातें लिखी-पढ़ी व सुनाई जा रही हैं, क्या वे बहुत वीभत्स नहीं हैं? प्रधानमंत्री ने ठीक कहा है कि यह छाती फुलाने जैसी बात नहीं है, नाजुक दौर को पार करने की बात है। लेकिन प्रधानमंत्री के शब्दों की विश्वसनीयता बची ही कहाँ है! राज्यसभा में बिल पारित हो जाने के बाद संसद को जिस तरह रोशनी से जगमग किया गया, वह छाती फुलाने की ही बात तो थी! अगर यह लाचार हो कर की गई कार्रवाई थी तो इसका जश्न मनाने जैसा क्या था? यह जख्म को गहरा करने की योजनाबद्ध कोशिश थी। 

इसलिए भारत के लोगों पर, जो भारत को प्यार करते हैं और भारत की प्रतिष्ठा में जिन्हें अपनी जीवंत प्रतिष्ठा महसूस होती है, आज के शून्य को भरने की सीधी ज़िम्मेवारी है। संसद में जो हुआ है वह स्थायी नहीं है। कोई भी योग्य संसद उसे पलट सकती है। जो नहीं पलटा जा सकेगा वह है मन पर लगा घाव; दिल में घर कर गया अविश्वास! इसलिए इस संकट में कश्मीरियों के साथ खड़े रहने की ज़रूरत है। जो बंदूक़ और फ़ौज के बल पर घरों में असहाय बंद कर दिए गए हैं, उन्हें यह बताने की प्रबल ज़रूरत है कि देश का हृदय उनके लिए खुला हुआ है, उनके लिए धड़कता है। और सरकार को चाहिए कि वह क़ानून-व्यवस्था संभाले लेकिन देश में हर स्तर पर विमर्श व अभिव्यक्ति को आज़ाद करे। यह परिस्थिति को संभालने में मददगार होगा।

(यह बयान गाँधी शांति प्रतिष्ठान ने जारी किया है।)
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